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तेलुगु भाषी क्षेत्र वहां से शुरू होता है, जहां कर्नाटक की काली मिट्टी लाल रंग में बदलने लगती है। महाराष्ट्र में उद्गम लेने वाली गोदावरी और कृष्णा नदियां इसी क्षेत्र से होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। ‘तेलुगु’ शब्द दक्षिण के लिए प्रयुक्त आदि द्रविड़ शब्द ‘तेन’ से निकला माना जाता है। तेलुगु भाषा का उद्भव लगभग 2,000 वर्ष पहले विस्तारित आदि द्रविड़ भाषा परिवार से हुआ, लेकिन उसे औपचारिक स्वरूप करीब 1,000 वर्ष पहले मिला, जब पूर्व चालुक्य साम्राज्य से तेलुगु भाषी राज्य का निर्माण करने वाले काकतीय राजवंश का शासन था। ‘आंध्र महाभारतम’ तेलुगु साहित्य की पहली महान रचना मानी जाती है। इसमें संपत्ति को लेकर भाइयों के बीच संघर्ष और अंततः राज्य विभाजन का वर्णन मिलता है। पूर्व आंध्र प्रदेश, जो स्वतंत्र भारत का भाषा के आधार पर गठित पहला राज्य था, अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विभाजित हो चुका है। इस विभाजन के पीछे केवल आधुनिक राजनीतिक और आर्थिक कारण ही नहीं, बल्कि कई सांस्कृतिक कारण भी रहे हैं। आइए इन्हें समझते हैं। पहला कारण भूगोल से जुड़ा है। ऊंचाई पर स्थित तेलंगाना की भूमि अपेक्षाकृत शुष्क है। इसलिए इस पहाड़ी क्षेत्र में खदानों के साथ ज्वार और बाजरे की खेती अधिक दिखाई देती है। दूसरी ओर, आंध्र प्रदेश का क्षेत्र अपेक्षाकृत निचला है। यहां गोदावरी और कृष्णा नदियां समुद्र में मिलती हैं, जिससे भूमि अत्यंत उपजाऊ बनती है और इसलिए यहां मुख्य रूप से धान की खेती होती है। दूसरा कारण भाषा से संबंधित है। आंध्र प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय के प्रभाव से संस्कृतनिष्ठ तेलुगु का विकास हुआ। वहीं तेलंगाना में अपेक्षाकृत कम संस्कृतनिष्ठ ‘जानु तेनुगु’ बोली जाती थी। बाद में इस भाषा पर अरब और फारसी का प्रभाव पड़ा, जिससे दक्खनी उर्दू का जन्म हुआ। तीसरा कारण धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है। हालांकि दोनों क्षेत्रों में बौद्ध और जैन गुफाएं मिलती हैं, लेकिन तेलंगाना में शैव पूजा का अधिक समतावादी रूप ‘लामुदिगलम’ विकसित हुआ। इसके विपरीत, आंध्र प्रदेश में विष्णु पूजा प्रचलित रही। बाद में तेलंगाना पर मुस्लिम शासकों का प्रभाव बढ़ा, जबकि आंध्र क्षेत्र पर विजयनगर के हिंदू राजाओं का शासन स्थापित हुआ। आंध्र प्रदेश का रायलसीमा क्षेत्र, जिसका अर्थ है ‘राजसी सीमा’, इन दोनों क्षेत्रों के बीच स्थित है। इस शुष्क भूमि में पानी की कमी के कारण अनेक टंकियां बनाई गईं। निजामों ने इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण छोड़कर इसे अंग्रेजों को सौंप दिया था। उनसे पहले विजयनगर के राजाओं ने यहां की पहाड़ियों पर कई प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ स्थापित किए थे, जैसे तिरुमला में विष्णु को समर्पित तिरुपति बालाजी मंदिर, श्रीशैलम में शिव मल्लिकार्जुन मंदिर और अहोबिलम में नरसिंह मंदिर। संस्कृत रामायण में केवल गोदावरी नदी का उल्लेख मिलता है। पुरातत्वविदों के अनुसार, जब 1,000 ईस्वी पूर्व से 300 ईस्वी पूर्व के बीच गंगा के मैदानों में वैदिक संस्कृति विकसित हो रही थी, तब तेलुगु भाषी क्षेत्र लौह युग से गुजर रहा था। उस समय योद्धाओं को उनके हथियारों सहित गड्ढों में दफनाया जाता था और कब्रों को बड़े पत्थरों से ढक दिया जाता था। इसे मेगालिथिक संस्कृति कहा जाता है। जहां गंगा के मैदानों में उस काल के स्लेटी और काले रंग के बर्तन मिले हैं, वहीं तेलंगाना और आंध्र क्षेत्रों में लाल तथा काले रंग के बर्तन पाए गए हैं। इस क्षेत्र के प्रारंभिक देवता पेड़-पौधों और पशुओं से जुड़े हुए थे। सर्प को नाग के रूप में, कूबड़ वाले बैल को नंदी और बसव के रूप में तथा भैंस को महिष के रूप में पूजा जाता था। इसी काल से देवी की मिट्टी की मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। प्रारंभिक देवियों को कमल के तालाबों में धान, फूल और तोते धारण किए हुए दर्शाया गया है। लज्जागौरी और तेलुगु तल्लि जैसी छवियां इन्हीं परंपराओं से विकसित हुईं। लोकप्रिय बथुकम्मा पर्व भी इसी सांस्कृतिक धारा से निकला, जिसमें वर्षा ऋतु के अंत का संकेत देने के लिए लोग फूलों से सजे गमले धारण करते हैं। आख्यानों के अनुसार, आर्य संस्कृति का दक्षिण की ओर विस्तार अगस्त्य ऋषि के माध्यम से हुआ। कहा जाता है कि विंध्य पर्वत पार करने के बाद अगस्त्य ऋषि कभी उत्तर भारत नहीं लौटे। हालांकि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो दक्षिण में सांस्कृतिक विस्तार मुख्य रूप से बौद्ध और जैन साधुओं के प्रवास के कारण हुआ। बौद्ध साधु गोदावरी नदी को ‘तेली वाह’ अर्थात श्वेत प्रवाह और कृष्णा नदी को ‘अंधक’ कहा करते थे। इस प्रकार पश्चिमी घाटों से पूर्व की ओर बहने वाली ये दोनों नदियां उत्तर भारत की गंगा और यमुना के समान मानी गईं। कुछ विद्वानों का मानना है कि ‘तेली वाह’ से ‘तेलंगाना’ और ‘अंधक’ से ‘आंध्र’ नाम विकसित हुए। आंध्र ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में उल्लिखित एक घुमंतू समुदाय का नाम भी है। अगले सप्ताह हम तेलुगु भाषी क्षेत्र पर जैन और बौद्ध धर्म के प्रभाव तथा वहां हिंदू धर्म और भक्ति परंपरा के उद्भव के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।
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