देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

तिब्बती रामायण में वर्णित एक दृश्य की कल्पना एक पेंटिंग में इस तरह से की गई।
बीसवीं सदी की शुरुआत में चीन के शिनजियांग क्षेत्र में रेशम मार्ग के पूर्वी छोर पर स्थित मोगाओ गुफाओं में पुरातत्वविदों को छह अधूरी पांडुलिपियां प्राप्त हुई थीं, जिनमें रामायण के कुछ अंश थे। विशेषज्ञों के अनुसार ये पांडुलिपियां लगभग आठवीं सदी में तिब्बती भाषा के एक प्रारंभिक रूप में लिखी गई थीं। इनमें बौद्ध रामायण का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता और इनके कई कथानक वाल्मीकि रामायण से अलग हैं। ये रामायण की उस पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो भक्ति काल की रचनाओं से पहले की है और जो दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया के राजाओं के बीच लोकप्रिय थी। आइए, तिब्बती रामायण के कुछ विशिष्ट प्रसंगों को जानते हैं। तिब्बती रामायण के अनुसार, दशरथ ने अर्हतों की आराधना की थी। प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें पुत्र-प्राप्ति के लिए एक फूल प्रदान किया, जिसे उनकी महारानी ने अपनी कनिष्ठ रानी के साथ साझा किया। फूल के प्रभाव से कनिष्ठ रानी ने पहले राम को जन्म दिया और कुछ ही दिनों बाद महारानी ने लक्ष्मण को जन्म दिया। दशरथ इस दुविधा में थे कि किसे उत्तराधिकारी बनाया जाए और इसी बीच उनका निधन हो गया। अंततः कनिष्ठ रानी के पुत्र राम को राजा बनाया गया, लेकिन राम ने सिंहासन महारानी के पुत्र लक्ष्मण को सौंप दिया। लक्ष्मण ने भी राजा बनने से इनकार कर दिया और राम की पादुका सिंहासन पर रखकर स्वयं मंत्री बन गए। इस वृत्तांत में भरत, शत्रुघ्न और वनवास का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
जैन रामायण की तरह यहां भी सीता को रावण की पुत्री बताया गया है। ज्योतिषियों की सलाह पर रावण ने सीता के जन्म लेते ही उन्हें तांबे के एक पात्र में रखकर समुद्र में फेंक दिया। बाद में नहर की खुदाई कर रहे एक किसान को वह पात्र मिला और उसने सीता का पालन-पोषण किया। आगे चलकर राम और सीता का विवाह हुआ। अन्य रामायणों की तरह तिब्बती वृत्तांत में भी राम और सीता का वियोग रावण की बहन को ठुकराने के कारण होता है, लेकिन यहां उसका नाम शूर्पणखा नहीं, बल्कि फूरफला है। इसके अलावा सुनहरे मृग के शिकार से जुड़ा प्रसंग भी मिलता है। राम की पुकार सुनकर सीता ने लक्ष्मण से उन्हें बचाने को कहा। लक्ष्मण के इनकार पर सीता ने उन्हें उकसाने के लिए यह आरोप लगाया कि वे जानबूझकर राम की सहायता नहीं करना चाहते।
सीता का अपहरण करने के लिए रावण ने सीता के पैरों के नीचे की धरती को ही उठा लिया। इस तरह उनका अपहरण किया, जैसा कि तमिल रामायण में भी वर्णित है। रावण को भय था कि यदि वह सीता को उनकी अनुमति के बिना स्पर्श करेगा तो वह जलकर नष्ट हो जाएगा। सीता की खोज में भटकते हुए राम एक ऐसी नदी के किनारे पहुंचे, जिसका पानी गहरे रंग का था। उन्हें पता चला कि यह रंग बाली द्वारा घायल किए गए सुग्रीव के रक्त के कारण है। तिब्बती रामायण में बाली का वध भी अनोखे ढंग से होता है। सुग्रीव ने अपनी पूंछ पर एक दर्पण बांधकर बाली से दोबारा युद्ध किया, जिससे राम यह सुनिश्चित कर सके कि कौन बाली हैं और कौन सुग्रीव। फिर राम ने बाली का वध किया। इसके बदले सुग्रीव ने सीता की खोज में राम की सहायता की। वाल्मीकि रामायण की तरह यहां भी हनुमान की भेंट गुफा में स्वयंप्रभा और समुद्र तट पर संपाति से होती है।
तिब्बती रामायण की एक विशेषता यह है कि इसमें पत्र-व्यवहार का उल्लेख मिलता है। राम ने पत्रों के माध्यम से सुग्रीव से लंका पर शीघ्र आक्रमण करने का आग्रह किया। हनुमान के सीता की खोज पर निकलते समय राम ने पत्र के जरिए सीता को संदेश भेजा और सीता ने भी हनुमान के हाथों राम को पत्र भिजवाया। सुग्रीव की मृत्यु के बाद जब हनुमान उनके राज्य का संचालन करने लगे तो राम ने उन्हें नियमित पत्र न लिखने पर टोका भी। युद्ध के दौरान रावण अदृश्य हो गया। तब राम ने उन्हें क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अपने शरीर का कम से कम एक भाग प्रकट करने की चुनौती दी। रावण ने केवल अपने दाहिने पैर की एक अंगुली दिखाई। उसी के आधार पर राम ने अनुमान लगाया कि रावण के दस सिर किस दिशा में स्थित हैं और सही सिर पर निशाना साधकर उसका वध किया। पहाड़ी लघुचित्र परंपरा के अनुसार, रावण का पहला सिर अश्व या गर्दभ का था और उसके प्राण उसी में छिपे थे।
तिब्बती रामायण में यह भी बताया गया है कि जब राम ने सीता की पवित्रता पर संदेह कर उन्हें महल से बाहर कर दिया, तब हनुमान ने सीता की निर्दोषिता सिद्ध की। इसके बाद राम और सीता का पुनर्मिलन हुआ और वे सुखपूर्वक साथ रहने लगे।








