रसरंग में मायथोलॉजी:  दक्षिण भारत की ‘कावडी’ का कार्तिकेय से क्या है संबंध?
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रसरंग में मायथोलॉजी: दक्षिण भारत की ‘कावडी’ का कार्तिकेय से क्या है संबंध?

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देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले

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कर्नाटक के बदामी स्थित बदामी की गुफाओं में कार्तिकेय की प्रतिमा। ये
गुफाएं छठी सदी की मानी जाती हैं। - Dainik Bhaskar

कर्नाटक के बदामी स्थित बदामी की गुफाओं में कार्तिकेय की प्रतिमा। ये गुफाएं छठी सदी की मानी जाती हैं।

मुंबई में हिंदू पंचांग का महत्वपूर्ण श्रावण महीना गटारी अमावस्या के दिन शुरू होता है। लेकिन भारत के कई अन्य भागों में वह इससे पहले आने वाली गुरु पूर्णिमा के दिन शुरू होता है। इस दिन कई युवक (और कुछ युवतियां भी) अपने कंधों पर कांवड़ लटकाए हुए गंगा नदी के तट से अपने-अपने गांवों तक लंबी यात्रा पर निकलते हैं। कांवड़ में एक लंबे डंडे के दोनों छोर पर टोकरियां लटकी होती हैं। उत्तर भारत में त्योहारों का मौसम भी इसी दिन से शुरू होता है।

इन युवकों का उद्देश्य नंगे पैर गंगाजल लाकर उसे अमावस्या की रात को अपने गांव में स्थित शिवलिंग पर चढ़ाना होता है। यह अनिवार्य होता है कि ये मटकियां इस लंबी यात्रा के दौरान धरती को न छुएं, इसलिए युवक विश्राम करते समय कांवड़ को पेड़ों पर टांगकर रखते हैं।

कहते हैं कि अमृत पाने के लिए देवों और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया था। क्षीरसागर से अमृत निकलने से पहले हलाहल नामक विष निकला। उस विष से देवों और असुरों को हानि पहुंच सकती थी, इसलिए उन्होंने शिव से उस विष को पीने का अनुरोध किया। हलाहल पीने पर शिव के गले में जलन होने लगी। कांवड़िएं मानते हैं कि शिवलिंग पर गंगाजल डालने से शिव के गले में हुई जलन कम होती है।

अगले सप्ताह गंगा के मैदानों में शुरू होने वाली यह कांवड़ यात्रा उत्तर भारत में बहुत प्रसिद्ध है। सैकड़ों युवक ‘बम बम भोले’ के स्वर उच्चारित करते हुए दृढ़ निश्चय के साथ कांवड़ को कंधों पर उठाए हुए चलते हैं। बहुधा लाल-केसरिया ध्वजों और लटकनों से सुसज्जित कांवड़ों और उन्हें उठाए कांवड़ियों को देखने के लिए हजारों लोग महामार्गों के किनारे इकट्ठा होते हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान कतिपय कांवड़ियों की हरकतों की वजह से सारे कांवड़िएं बदनाम हुए हैं। चूंंकि कई बार सड़कों पर इनकी संख्या हजारों में पहुंच जाती है। इसलिए कभी-कभी इनकी वजह से यातायात में बाधा पहुंचती है।

किसी विलक्षण ढंग से श्रावण महीने का नाम रामायण में श्रवण नामक युवक के नाम से मिलता-जुलता है। यह कोई संयोग की बात नहीं है। श्रवण कुमार ने भी कांवड़ धारण किया था, लेकिन गंगाजल के बजाय वह अपने माता-पिता को टोकरियों में बिठाकर तीर्थयात्रा पर ले जा रहा था। उस समय वह अनजाने में राजा दशरथ के हाथों मारा गया था। श्रवण कुमार हिंदू आख्यान शास्त्र का आदर्श पुत्र है। उसने अपने उत्तरदायित्व का बोझ उठाकर अपने माता-पिता की सेवा की। ऐसा करने में उसने अपनी निजी स्वतंत्रता को त्याग दिया।

उत्तर भारत से बहुत दूर तमिलनाडु में बाल-देवता और शिव के पुत्र मुरुगन अर्थात कार्तिकेय के भक्त भी कांवड़ समान ‘कावडी’‌ नामक डंडा अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं। हालांकि कावडी‌ मोर पंखों से सुसज्जित होती है और उससे मटके नहीं टंगे होते हैं।

कहा जाता है कि एक दिन अपने पिता के साथ मतभेद के बाद कार्तिकेय क्रोधित होकर कैलाश पर्वत से दूर दक्षिण की ओर चले गए। यहां उन्हें अपना घर याद आता था। इसलिए शिव और पार्वती ने उन्हें दो पहाड़ भिजवाए। हिडिंबा नामक राक्षस ये पहाड़ कांवड़/कावडी पर टांगकर दक्षिण ले गया। उसे स्पष्ट आदेश दिया गया था कि मुरुगन तक पहुंचने से पहले वह उन पहाड़ों को नीचे न रखें।

रास्ते में पहाड़ इतने भारी हो गए कि हिडिंबा उन्हें धरती पर रखने को विवश हो गया। उसने देखा कि एक पहाड़ पर एक बालक बैठा हुआ है, जिस कारण वह इतना भारी हो गया था। हिडिंबा जान गया कि वह बालक स्वयं मुरुगन थे। जिस स्थान पर पहाड़ नीचे रखे गए, वहां अब पलनी का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है।

कांवड़ सांसारिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। पार्वती ने तपस्वी शिव को गृहस्थ बनने के लिए विवश किया था। उनके पुत्र मुरुगन उत्तर भारत में कुंवारे हैं, लेकिन दक्षिण भारत में विवाहित हैं। शिव और मुरुगन दोनों की उपासना को कांवड़ के साथ जोड़ा जाता है। यह सांसारिक जीवन में हिस्सा लेने के लिए विवश किए जाने का प्रतीक है। हलाहल उस पीड़ा का संकेत है जो किसी युवक को तब होती है जब वह सामाजिक उत्तरदायित्वों का बोझ उठाता है। विवाहित जीवन की चौखट पर खड़े युवकों के मन में यह अत्यंत व्यावहारिक संघर्ष चलता है। इस संघर्ष को कांवड़ यात्रा दर्शाती आ रही है।



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