देवदत्त पट्टनायक1 घंटे पहले
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थाईलैंड के सामुत प्राकन प्रांत में स्थित एरावान संग्रहालय। यहां एरावान को ब्रह्म देवता की सवारी माना जाता है।
पिछले सप्ताह हमने जाना था कि बैंकॉक में ब्रह्म देवता की पूजा किस तरह होती है। इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आज हम समझेंगे कि हिंदू धर्म थाईलैंड कैसे पहुंचा और वहां जाकर उसने किस तरह का रूप ग्रहण किया।
बैंकॉक के एरावान, जहां कि ब्रह्म देव को स्थापित किया गया था, आने वाले श्रद्धालु जल्दी ही समझ गए कि ये ब्रह्म देवता अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं। इसलिए वे नियमित रूप से यहां आकर अपने निजी या व्यावसायिक जीवन की समस्याओं के समाधान की प्रार्थना करने लगे। श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती संख्या के कारण हर कुछ घंटों में चढ़ावे को हटाकर नए आने वाले चढ़ावे के लिए जगह बनाई जाती है।
समय-समय पर आसपास के होटल और अस्पताल यहां स्थित लकड़ी के किसी विशाल गजराज की मूर्ति को अपने परिसर में रखने की इच्छा प्रकट करते हैं। उन्हें खुशी-खुशी अनुमति दी जाती है, क्योंकि यह तय माना जाता है कि एरावान से ले जाए गए गज का पूरा सम्मान होगा और उसे प्रतिदिन गेंदे के फूलों की मालाएं अर्पित की जाएंगी। श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होने पर वे यहां आकर दो, चार, छह या आठ नर्तकियों से देवता की प्रशंसा में गीत गवाते हैं।
हर दिन ताइवान, सिंगापुर और हॉन्ग कॉन्ग से सैकड़ों पर्यटक बैंकॉक घूमते हुए इस तीर्थस्थान पर आते हैं और अपने व्यवसाय में सौभाग्य की कामना करते हैं। श्रद्धालु यहां आकर केवल वही मांगते हैं, जिसकी उन्हें सच में आवश्यकता होती है, न कि वह जो लोभवश चाहा जाता है। एक आख्यानशास्त्री के रूप में मुझे सबसे रोचक यह लगा कि यह तीर्थस्थान और इसके आसपास विकसित हुई संस्कृति मिथोपोएसिस अर्थात समय और स्थान के साथ प्रथाओं और मान्यताओं के बदलने का कैसा एक आदर्श उदाहरण पेश करती है।
बौद्ध धर्म की तरह हिंदू धर्म या ब्राह्मणवाद (जिसे थाई लोग ब्रह्मा का धर्म मानते हैं) भी लगभग हजार वर्ष पहले थाईलैंड पहुंचा। भारत के पूर्वी तट पर स्थित चोल और गंग राजवंशों के संरक्षण में भारतीय व्यापारी और शिल्पकार अक्सर दक्षिणपूर्व एशिया की यात्राएं करते थे। इसके बाद मध्यकाल में समुद्री यात्राओं पर प्रतिबंध लग गए, क्योंकि यह मान्यता प्रचलित हो गई कि समुद्र यात्रा से जाति के विशेषाधिकार नष्ट हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, भारत का समुद्री व्यापार पहले अरब और फिर यूरोपीय व्यापारियों के हाथों में चला गया।
समय के साथ व्यापारी और शिल्पकार सुवर्णभूमि यानी थाईलैंड तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य क्षेत्रों में बसने लगे और उनके साथ हिंदू देवता भी इस भूमि तक पहुंच गए। विष्णु वहां के राजपरिवारों के प्रिय देवता बन गए। यह परंपरा आज भी दिखाई देती है। ब्रह्मा पुजारी वर्ग के प्रिय देवता बने। और गर्भधारण की कामना रखने वाली महिलाओं ने शिव की आराधना शुरू की।
अगली कई सदियों में थाईलैंड का हिंदू धर्म एक स्वतंत्र रूप में विकसित हो गया। कुछ प्रथाएं, जिनका भारत में पालन समाप्त हो चुका था, थाईलैंड में बनी रहीं, जैसे मंदिरों की नर्तकियां। देवताओं की पहचान और रूप यहां एक-दूसरे में घुलते-मिलते गए। फलस्वरूप मुझे बैंकॉक के ब्रह्मा कई मायनों में पुराणों के इंद्र जैसे लगे- नृत्यप्रिय, गजराज पर सवार, वर्षा और सौभाग्य प्रदान करने वाले। भारत में ये दोनों देवता अब प्राय: लोकप्रिय कथाओं का हिस्सा नहीं रहे, पर थान ताओ महाप्रोम के रूप में ये परंपराएं यहां जीवित हैं। बैंकॉक में ब्रह्मा हंस की जगह एरावान यानी कई सिर वाले गजराज पर सवार दिखते हैं।
कई विद्वान इस बात पर बहस करते हैं कि क्या थाईलैंड का हिंदू धर्म वास्तव में हिंदू धर्म है या उसका एक बदला हुआ रूप मात्र। यह बहस इस धारणा पर आधारित है कि हिंदू धर्म का कोई एक ‘मूल’ रूप है। लेकिन आखिर वह मूल रूप है क्या? क्या वह वैदिक परंपरा है? क्या वह ब्राह्मणवाद है? क्या वह पौराणिक हिंदू धर्म है जिसमें देवताओं की मूर्तियां पूजी जाती हैं? क्या वह भक्ति परंपरा का हिंदू धर्म है? क्या मंदिरों की मूर्तिपूजा को ही मूल मानें? या फिर ‘निराकार’ हिंदू धर्म, जिसने 19वीं सदी में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज जैसी संस्थाओं को जन्म दिया?
सच्चाई यही है कि धर्म भी समय और स्थान के साथ बदलते हैं और लोग अपनी जरूरत तथा अनुभव के अनुसार उनमें परिवर्तन करते रहते हैं। इसलिए धर्म का जो भी रूप किसी समय, किसी स्थान और किसी समुदाय में अस्तित्व में है, अमूमन वह वहीं के लिए प्रासंगिक और वैध होता है।








