अकेलेपन ने खड़ा किया नया बाजार:  अकेले बुजुर्ग, किराये की संतान; सैर, लूडो, साथ समय बिताने के लिए हायरिंग
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अकेलेपन ने खड़ा किया नया बाजार: अकेले बुजुर्ग, किराये की संतान; सैर, लूडो, साथ समय बिताने के लिए हायरिंग

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आज लगभग हर चीज के लिए बाजार में विकल्प मौजूद है। ऐसा ही एक बाजार जालंधर में तेजी से बढ़ा है, और वो है- बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करने का। ये ऐसे लोगों के लिए हैं, जिनके अक्सर घर तो बड़े हैं लेकिन कमरे खाली। अंदर बुजुर्ग अकेले हैं। बच्चे विदेश में हैं या नौकरी में व्यस्त। ऐसी कंपनियां, जो सिर्फ केयर नहीं करतीं। साथ देती हैं। अटेंडेंट साथ बैठते हैं। ताश खेलते हैं। टीवी देखते हैं। सैर पर ले जाते हैं। दिनभर बात करते हैं। शहर में 40 कंपनियां हैं। करीब 750 अटेंडेंट्स। डिमांड अब गांवों तक पहुंच गई है। दोआबा में सबसे ज्यादा। सेवा सिर्फ शहर तक सीमित नहीं, गांवों में भी तेजी से बढ़ी है। जालंधर, अमृतसर, लुधियाना से लेकर बरनाला और फिरोजपुर तक ट्रेंड बढ़ रहा है। 5 कहानियां… जो बताती हैं कि साथ रहने से बुजुर्गों की जिंदगी आसान हो जाती है कहानी-1 पुराने किस्से, गांव, खेती, शादी की यादें, सब अटेंडेंट से, तीनों बच्चे विदेश में बस गए। बुजुर्ग दंपती अकेले रह गए। अब घर में दो अटेंडेंट हैं। सुबह वे उन्हें उठाते हैं, चाय पिलाते हैं, और दिन की शुरुआत मुस्कान से होती है। ‘बापू जी’ और ‘माता जी’ कहकर बुलाना उन्हें अपनापन देता है। अटेंडेंट के साथ लूडो, ताश और गांव, खेती, शादी-ब्याह के किस्से घर में फिर से जिंदगी भर देती हैं। रोज शाम को पार्क की सैर से अकेलापन पिघलने लगा है। कहानी-2 अटेंडेंट को बिठाकर बुजुर्ग अखबार पढ़कर सुनाते हैं, सुबह 6 बजे दिन शुरू होता है। अब यह सिर्फ दिनचर्या नहीं, एक रिश्ता है। अटेंडेंट के पास चाय, दवा, नहलाना सब काम हैं, पर इनके बीच अपनापन छिपा है। बुजुर्ग अखबार पढ़कर खबर बताते हैं, अटेंडेंट सुनता है। दोपहर में टीवी पर पुरानी फिल्में, शाम को पार्क में सैर और रात को साथ बैठकर खाना। यही सर्विस है। कहानी-3 बीमार पड़ने पर बच्चों से पहले अटेंडेंट को कॉल करने लगे एक दिन अचानक तबीयत बिगड़ी। कांपते हाथों से फोन उठाया, और पहला नंबर अटेंडेंट का मिलाया। बच्चों को खबर बाद में दी गई। वह दौड़ता हुआ आया, दवा दी, डॉक्टर बुलाया, पर सबसे ज्यादा जरूरी उसका पास बैठना था। उसने हाथ थामे रखा, डर सुना, आंसू पोंछे। अब यह रिश्ता नौकरी नहीं, अपनेपन का सहारा बन चुका है। उनके बीच खामोशी अब बात करने लगी है। कहानी-4 कैरम खेलना, रिश्तेदारों के घर या मंदिर जाते हुए अटेंडेंट साथ… दिन बहुत लंबा लगता था। कोई बात करने वाला नहीं। अब अटेंडेंट साथ है, सुबह से रात तक। साथ खाना खाते हैं, टीवी देखते हैं, कभी कैरम, कभी ताश। बुजुर्ग अपनी पुरानी फोटो उन्हें दिखाते हैं। किस्से सुनाते हैं। अटेंडेंट भी चुपचाप सुनता है। किसी शाम मंदिर तो कभी रिश्तेदार के घर, हर जगह अटेंडेंट साथ रहता है। कहानी-5 अटेंडेंट की देखभाल से चेहरे पर कैंसर के घाव भरने लगे, अटेंडेंट को कॉल आई। 80 साल के बुजुर्ग की पट्टी करनी थी। घर पहुंचे तो हालात डराने वाले थे। चेहरे पर घाव था, जिसमें कीड़े पड़ चुके थे। बुजुर्ग अकेले थे, जबकि बेटा पास ही रहता था। हालात ऐसे कि दरवाजे से खाना सरका दिया जाता था। अटेंडेंट ने तुरंत सफाई शुरू की। जांच में कैंसर निकला। इलाज शुरू हुआ, पर असली सहारा अटेंडेंट का साथ था। दिनभर देखभाल, लिक्विड डाइट। पास बैठता रहा। घाव धीरे-धीरे भरने लगा। हर कंपनी में 25-35 अटेंडेंट शुरुआत छोटी थी। कुछ केस। सीमित स्टाफ। 2017 में पहली कंपनी के पास सिर्फ 10 बुजुर्ग थे। अब 35-40 हैं। दूसरी कंपनी- 2023 में शुरू हुई। 15 से बढ़कर 40 बुजुर्ग पहुंच गए। तीसरी- 3 से 20 केस तक। चौथी- 10 से 20 तक। शहर में जालंधर समेत पूरे पंजाब में ऐसी 40 कंपनियां हैं। हर कंपनी में 25-35 अटेंडेंट्स। कुल मिलाकर करीब 750 लोग। कुछ कंपनियां नर्सिंग स्टाफ भी रखती हैं। चार्ज- ~1000 प्रतिदिन से शुरू। जरूरत के हिसाब से बढ़ता है। 24 घंटे सेवा। रोटेशन सिस्टम। यह सिर्फ सेवा नहीं- एक पूरा इकोसिस्टम बन चुका है। केयर सर्विस कंपनियों की एसो​सिएशन के प्रेसिडेंट रविंदर सिंह बताते हैं कि 2016-17 के बाद इस तरह की सर्विस बढ़ी है। एक कंपनी की संचालक अमन कहती हैं कि अटेंडेंट 24 घंटे बुजुर्गों के साथ रहते हैं। फोकस भावनात्मक जुड़ाव बनाना होता है। एक कंपनी की अटेंडेंट संदीप बताती हैं कि दिन की शुरुआत बेड टी से होती है और रात को सुलाने तक साथ रहती है। बीच में बातचीत, टीवी, गेम्स और सैर शामिल हैं।



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