रसरंग में मायथोलॉजी:  इतिहास में व्यापारियों का कैसा रहा योगदान, इन कथाओं से जानें
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रसरंग में मायथोलॉजी: इतिहास में व्यापारियों का कैसा रहा योगदान, इन कथाओं से जानें

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देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले

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महाराजा अग्रसेन जी की 5100 वीं जयंती के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने 1976 में एक डाक टिकट जारी किया था। - Dainik Bhaskar

महाराजा अग्रसेन जी की 5100 वीं जयंती के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने 1976 में एक डाक टिकट जारी किया था।

अधिकांश ऐतिहासिक कहानियों में राजाओं और उनके द्वारा लड़े गए युद्धों का वर्णन मिलता है। इसका कारण यह है कि इतिहास एक औपचारिक विषय के रूप में 19वीं सदी में विकसित हुआ, जब उस समय के राजा अपने पूर्वजों के पराक्रमों के बारे में जानने के इच्छुक थे। इसलिए इतिहासकारों ने भी साम्राज्यों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। यदि उस समय यूरोप में व्यापारी वर्ग का वर्चस्व होता तो शायद हमें उनकी कहानियों के माध्यम से व्यापारिक इतिहास की अधिक जानकारी मिलती। लेकिन अब इतिहासकार यह समझ रहे हैं कि इतिहास में राजाओं के अलावा भी बहुत कुछ जानने और समझने योग्य है। इसी कारण व्यापारी वर्ग की कहानियां भी अब सामने आने लगी हैं।

यही बात आख्यानों पर भी लागू होती है, जो राजा, पुजारी और ऋषियों की कहानियों पर केंद्रित हैं, न कि व्यापारियों पर। लेकिन यदि हम व्यापारी वर्ग पर ध्यान दें तो पाएंगे कि विशेष रूप से स्थानीय लोकसाहित्य में इस वर्ग से जुड़ी कई रोचक कहानियां मिलती हैं।

एक लोककथा, जो बहुत प्रसिद्ध नहीं है, अग्रवाल समुदाय से संबंधित है। एक बार महाराजा अग्रसेन ने व्यापारियों का एक नगर बसाया और विभिन्न स्थानों के वरिष्ठ व्यवसायियों को उसमें बसने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने यह नियम बनाया कि नगर का प्रत्येक परिवार हर नए व्यापारी को एक ईंट और एक स्वर्ण सिक्का देगा, ताकि उसे बसने के लिए प्रोत्साहन मिले। इस प्रकार प्रत्येक व्यापारी के पास ईंटें और सिक्के एकत्र हो जाते थे, जिनसे वह अपना घर बनाकर व्यवसाय शुरू कर सकता था। यदि उसका व्यवसाय सफल होता तो वह नगरवासियों के प्रति सदैव कृतज्ञ रहता। इसी प्रकार राजा अग्रसेन द्वारा स्थापित नगर में विश्वभर से लोग रहने आए।

केरल के लोकसाहित्य में उप्पुकोट्टन नामक व्यापारी का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः यहूदी या मुसलमान था। वह इतना निपुण था कि नमक बनाने वालों को नमक और रूई कातने वालों को रूई तक बेच सकता था। यह कथा ‘पराई पेट्टा पंथिरुकुलम’ नामक कथा संग्रह में मिलती है, जिसमें एक ब्राह्मण पिता और एक दलित माता की बारह संतानों की विशेषताओं का वर्णन है। इन संतानों का पालन-पोषण विभिन्न समुदायों ने किया था। इस प्रकार यह कथा संग्रह जाति आधारित वर्गीकरण की धारणा को चुनौती देता है।

बौद्ध जातक कथाओं में भी व्यापारियों की अनेक कहानियां मिलती हैं। ‘अपण्ण जातक’ में एक होशियार व्यापारी का वर्णन है, जिसने रेगिस्तान की लंबी यात्रा के लिए पर्याप्त पानी साथ लिया। उसने ऐसा अपने प्रतिद्वंद्वी के मना करने के बावजूद किया, जो चाहता था कि वह प्यास से मर जाए। ‘वन्नुपत्थ जातक’ में व्यापारी अनेक बाधाओं के बावजूद पानी ढूंढ लेता है। ‘सेरिवाणिज्य जातक’ में अनैतिक व्यापारियों का उल्लेख है, जो वस्तुओं का दाम घटाकर अनुचित लाभ कमाते थे। ‘तांदुलनलि जातक’ में वस्तुओं का मूल्य मांग और आपूर्ति के अनुसार तय करने की सलाह दी गई है, न कि राजा के अत्यधिक लाभ के लिए। तमिल में रचे गए बौद्ध महाकाव्यों के अनुसार, राजा व्यापारियों से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उनकी पत्नियों की पायलों में हीरे जड़े होते थे, जबकि रानियों की पायलों में केवल मोती होते थे।

बाइबल में भी व्यापारियों की कथाएं मिलती हैं। न्यू टेस्टामेंट की प्रसिद्ध ‘पैराबल ऑफ टैलेंट्स’ में एक व्यक्ति ने अपने तीन दासों को कुछ धन दिया। वह इस बात से प्रसन्न था कि दो दासों ने उस धन का निवेश करके उसे अधिक लाभ लौटाया, जबकि तीसरे दास ने धन को सुरक्षित रखकर उतना ही वापस लौटाया, जिससे उसका स्वामी नाराज हुआ और उसकी प्रशंसा नहीं की।

अरेबियन नाइट्स के प्रसिद्ध कहानी-संग्रह में ‘सिंदबाद के साहसी कारनामे’ जैसी व्यापारिक कथाएं हैं। सिंदबाद एक निडर व्यापारी था, जिसने जहाजों से दूर देशों की यात्राएं कीं, व्यापार किया और अत्यंत धनी बन गया। बाद में उसने अपनी कहानी एक गरीब सिंदबाद को सुनाई, जो अपनी किस्मत को लेकर निराश था। अमीर सिंदबाद ने उसे सलाह दी कि वह भी दूर देशों में जोखिम उठाएं, क्योंकि इसी से वह समृद्ध होकर भविष्य में सुखी जीवन जी सकेगा। इस प्रकार सिंदबाद की कहानियां अरब व्यापारियों पर आधारित थीं, जिन्होंने अरब सागर पार कर विश्वभर में व्यापार किया और जिन स्थानों तक वे पहुंचे, उन्हें समृद्ध बनाया।

आज के इतिहासकार प्रायः उन राजाओं की कथाओं को प्रमुखता देते हैं, जिन्होंने स्तूपों का निर्माण कराया, परंतु उन व्यापारियों को नजरअंदाज करते हैं जिन्होंने बौद्ध गुफा-मंदिरों का निर्माण कराया, गुजरात के गिरनार पर्वत पर जैन मंदिरों का निर्माण कराया और संभवतः हड़प्पा के नगर बसाए। स्पष्ट रूप से अब समय आ गया है कि इतिहास और आख्यानों के पुराने दृष्टिकोण को बदला जाए और उन सभी समुदायों को उसमें शामिल किया जाए, जिन्होंने सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में समान योगदान दिया है।

– devdutthindi@gmail.com



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