रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  बोरी में हाथ डाला तो निकला था अजगर!
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: बोरी में हाथ डाला तो निकला था अजगर!

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रूमी जाफरी4 घंटे पहले

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बीती 25 अक्टूबर की दोपहर मैं जिंदगी में कभी नहीं भूल सकता। कुछ जरूरी काम करने के लिए मैंने सोचा कि एक घंटे तक कोई डिस्टर्ब न करे, इसलिए अपना मोबाइल बंद कर दिया था। जब लगभग 4:30 बजे मैंने मोबाइल ऑन किया तो हनी इरानी जी, शशि रंजन, डेविड धवन साहब और बहुत सारे लोगों के मिस कॉल्स थे। मैं घबरा गया। इतने लोगों ने एक साथ कॉल किए थे, जरूर कुछ गड़बड़ थी। मैंने हनी इरानी जी को फोन लगाया तो उन्होंने बताया कि सतीश शाह नहीं रहे। उन्होंने कहा, ‘मैं उनके घर पहुंच गई हूं, तुम सब दोस्तों को खबर कर दो।’ सुनकर मैं सन्न रह गया। फिर डेविड साहब और शशि रंजन से बात हुई। शशि भी रास्ते में थे, वो भी सतीश भाई के घर जा रहे थे।

तब से लेकर आज तक मैंने कई बार कलम उठाई कि सतीश भाई पर कुछ लिखूं, लेकिन हर बार पेन वापस रख देता था, क्योंकि यकीन ही नहीं होता था कि वो अब नहीं हैं, वो इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं। इन शब्दों को लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। जब भी लिखने बैठता, उनके साथ बिताए हुए पल, उनकी मुस्कान, उनके संवाद, सब आंखों के सामने घूमने लगते। उनकी पहली मुलाकात से लेकर मेरी फिल्मों में किए गए उनके किरदार तक, सब याद आने लगते।

मेरे उनके साथ तीन रिश्ते थे। पहला, मैं भोपाली हूं और सतीश भाई मुझसे कम भोपाली नहीं थे। उनकी पत्नी ने बताया था कि जब उनकी शादी हुई तो हर लड़की का सपना होता है कि हसबैंड उसे हनीमून पर स्विट्जरलैंड, यूरोप, कश्मीर या दुबई ले जाए, लेकिन सतीश मुझे लेकर भोपाल गए थे। इतनी मोहब्बत थी उन्हें भोपाल से। जितने रिश्ते मेरे वहां हैं, उतने ही या शायद उससे ज्यादा सतीश भाई के थे। 26 तारीख को जब मैं उनके अंतिम संस्कार के लिए जा रहा था तो उनके दो भोपाली पारिवारिक दोस्त संजीव सरन और शेरी भाई (जो सलमान खान की सगी बुआ के बेटे हैं), मुझे लेने आए। रास्ते भर वो सतीश भाई के भोपाल के, अपने फार्महाउस और पुराने किस्से सुनाते रहे, पुरानी तस्वीरें दिखाते रहे। शेरी भाई ने बताया कि उनका और सतीश भाई का रिश्ता 1960 से रहा है, जब सतीश भाई 14-15 साल के थे।

दूसरा रिश्ता एफटीआईआई से जुड़ा था। उनके सबसे करीबी साथी डेविड धवन, शशि रंजन, राकेश बेदी मेरे भी घनिष्ठ मित्र बन गए थे। तीसरा रिश्ता एक राइटर और एक एक्टर का था। सतीश भाई ने मेरी कई फिल्मों में काम किया। ‘साजन चले ससुराल’ में मैंने उन्हें निगेटिव रोल दिया था। उन्होंने कहा था, ‘लोग मुझे सिर्फ कॉमेडी में देखते हैं, निगेटिव रोल में नहीं।’ उन्होंने बताया कि जब वो एफटीआईआई से निकले तो लोगों ने कहा, ‘तुम इंडस्ट्री में फिट नहीं होते- न हीरो लगते हो, न विलन, न कॉमेडियन। करोगे क्या?’ उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘उस फ्रस्ट्रेशन को मैंने ‘ये जो है जिंदगी’ में हर तरह का रोल करके निकाल दिया। लेकिन अब सब मुझे सिर्फ कॉमेडी में देखते हैं। तूने मुझे निगेटिव रोल दिया है।’ मैंने कहा, ‘सतीश भाई, मैंने आपको विलन बनाया है, लेकिन वो भी एक कॉमिक विलन है, जो एंटरटेन करेगा।’

फिर मेरी ही फिल्म ‘मुझसे शादी करोगी’ में उन्होंने सिक्योरिटी ऑफिसर का रोल किया। सलमान जब भी उन्हें कोई मुश्किल काम देते, वो सदमे में आ जाते। हम दोनों सोच रहे थे कि इसमें कुछ नया रिएक्शन कैसे करें। तब सतीश भाई बोले, ‘मैं कटे पेड़ की तरह गिर जाऊं तो कैसा रहेगा?’ डेविड साहब बोले, ‘नहीं-नहीं, मत गिरना, तेरा वजन ज्यादा है, तुझे चोट लग जाएगी, हड्‌डी-वड्‌डी टूट जाएगी।’ तो सतीश भाई बोले, ‘तुम जानते नहीं, गिरने की एक ट्रिक है।’ और अचानक वो जमीन पर कटे पेड़ की तरह गिर गए। मैं घबरा गया, लेकिन वो हंसते हुए बोले, ‘देखा, कुछ नहीं हुआ।’ ‘चलते चलते’ में उनका किरदार बहुत यादगार रहा। ‘जुड़वां’ में अनुपम और सतीश भाई की जोड़ी ने खूब हंसाया, लेकिन अंत में सतीश भाई के किरदार की मौत पर थिएटर में बैठे लोगों की आंखों में आंसू आ गए- ‘हंसाने वाला रुलाकर चला गया।’ और आज भी वही हुआ- हमारा सतीश शाह हमें हंसाते-हंसाते रुला गए। इसी बात पर मुझे क़ैसर उल जाफरी का एक शेर याद आता है:

मरने पर भी लौ देती थी दीवाने के दिल की आग पथराई थीं आंखें लेकिन फूल सा चेहरा जर्द न था।

शशि रंजन और डेविड साहब ने एक और किस्सा बताया था। बात 1987 की बात है। सतीश शाह ने हमें खाने पर बुलाया। खाना खा लिया तो उन्होंने बोरी की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘इसमें हाथ डालकर जरा आम निकाल लो।’ हमने जैसे ही हाथ डाला तो उसमें बहुत बड़ा अजगर था। हम चीखते हुए बाहर भागे। दरअसल, सतीश भाई ने उस अजगर को पाला हुआ था। वो अपनी कार में शीशा खोलकर अजगर का मुंह बाहर निकालते और शरीर अंदर रखते। सिग्नल पर लोग देखकर हैरान रह जाते। लोग जहां डॉगी लेकर घूमते हैं, वो उस जमाने में अपना अजगर लेकर घूमते थे।’ आज सतीश भाई की याद में बस इतना कहना है कि उनकी फिल्म ‘मुझसे शादी करोगे’ से ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए:

जीने के हैं चार दिन, बाकी हैं बेकार दिन…



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