देवदत्त पट्टनायक3 घंटे पहले
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केरल के त्रिशुर जिले में स्थित चेरामन जुमा मस्जिद। इसे भारत की सबसे पुरानी मस्जिद माना जाता है
लोग अक्सर मुझे इस्लामी आख्यानशास्त्र अर्थात माइथोलॉजी पर लिखने की चुनौती देते हैं। लेकिन वे यह नहीं जानते कि विकीपीडिया पर ‘इस्लामी आख्यानशास्त्र (माइथोलॉजी)’ नामक लेख पहले से ही है। और यूनिवर्सिटियों में लोग उतनी ही सहजता से इस्लामी, ईसाई और यहूदी आख्यानशास्त्र की बात करते हैं जितनी की वे यूनानी, मिस्र और नोर्स आख्यानशास्त्र की बात करते हैं। यह ‘चुनौती’ 19वीं सदी की परिभाषाओं पर आधारित है, जिनके अनुसार आख्यान मिथ्या है और धर्म तथा विज्ञान सत्य है, न कि 21वीं सदी की परिभाषाओं पर, जिनके अनुसार आख्यान लोगों का सांस्कृतिक सत्य है, जो प्रमाणों के प्रति तटस्थ है।
आजकल अक्सर प्रयोग किया जाने वाला वाक्यांश ‘यहूदी-ईसाई’ आख्यानशास्त्र इस बात की स्वीकृति है कि दोनों की जड़ें एक हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी के नाजी लोगों (इसकी बिल्कुल बात नहीं की जाती कि वे ईसाई थे) ने यहूदियों का विध्वंस करके होलोकास्ट किया। इसके बावजूद ईसाई चर्च इस घोर कृत्य पर चुप रहा। इस चुप्पी से स्तब्ध यूरोप और अमेरिका ने यहूदियों से क्षमा मांगने और उन्हें मनाने के प्रयत्न किए। इस वाक्यांश का पहला प्रयोग तब हुआ। और आख्यानों के लिए ‘अब्राहमी’ विशेषण केवल बीस साल पहले खाड़ी युद्ध के बाद होने लगा।
20वीं सदी के अंत तक जब भी कोई यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम की एक जड़ होने की बात कर यह दिखाने का प्रयास करता कि वे मेसोपोटामिया, फारस और मिस्र के आख्यानशास्त्रों के साथ जुड़े थे तो कोलाहल मच जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। आधुनिक विश्व विज्ञान को महत्व देता है और उसमें यह मान्यता है कि हर धर्म आख्यानों के माध्यम से एक विश्वदृष्टि का निर्माण करता है। ईसाई धर्म और इस्लाम भी ऐसे ही धर्म हैं।
21वीं सदी में सभी आस्तिकता को आख्यान माना जाता है, क्योंकि हम परमात्मा की धारणा को माप नहीं सकते। यहां अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि आख्यान का अर्थ मिथ्या नहीं है। आख्यान एक सामूहिक कथा है, जिसके आधार पर लोग सहयोग करते हैं। जैसे हिंदू आख्यानशास्त्र हिंदू समुदाय को जन्म देता है, वैसे इस्लामी आख्यानशास्त्र इस्लामी समुदाय को जन्म देता है। धर्मनिरपेक्ष आख्यानशास्त्र धर्मनिरपेक्ष समुदायों को जन्म देते हैं। इस प्रकार, समुदायों के निर्माण में आख्यानशास्त्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे समुदायों को बांधे रखते हैं। यह आश्चर्यजनक है कि हम इस्लाम आख्यानों के बारे में इतना कम जानते हैं, इसके बावजूद कि विश्व की सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक केरल में है।
ऐसा क्यों? हम रामायण और महाभारत के बारे में बहुत कुछ जानते हैं। मिशनरी स्कूलों और टेन कमांडमेंट्स तथा पैशन ऑफ द क्राइस्ट जैसी हॉलीवुड फिल्मों के कारण हम बाइबल की कथाओं से भी परिचित हैं। लेकिन इस्लामी आख्यानों का क्या? साल 1992 में दूरदर्शन ने बाइबल की कहानियों पर धारावाहिक बनाया था। लेकिन कुछ समूहों ने उसका विरोध किया और सरकार ने उसका प्रसारण रोक दिया। भारतवासियों को इस्लाम के साथ परिचित कराने का मौका खो दिया गया।
इस्लाम में संगीत और नृत्य वर्जित हैं। फिर भी देशभर की फिल्मों में मुसलमान संगीतकार, नर्तक और अभिनेता काम करते हैं। 15वीं और 18वीं सदियों के बीच तुर्की के ऑटोमन, फारस के सफविद और भारत के मुगल साम्राज्यों ने इस्लामी कला को बढ़ावा देकर कुरान और हदीस की कहानियों के चित्रण को भी अनुमति दी। यह इस्लाम का उदार रूप है।
बहुत कम भारतीय 17वीं सदी में बंगाली भाषा में रचित नबी-वंश अर्थात नबियों की कहानियों के बारे में या उसी सदी में तमिल भाषा में पैगंबर के जीवन पर रचित चिर पुराणम के बारे में जानते हैं। इन कहानियों से परिचित होने पर हम 1400 वर्ष पहले भारत आई एक अलग विश्वदृष्टि के बारे में जानेंगे, एक ऐसी विश्वदृष्टि जो पुनर्जन्म पर नहीं बल्कि एक जन्म पर आधारित है, जहां पैगंबर मनुष्यों को जीने का सही तरीका समझाते हैं और जहां केवल अकीदतमंद (श्रद्धालु) और न्याय का पालन करने वाले ही जन्नत जा सकते हैं।
हिंदू और इस्लामी आख्यानशास्त्रों में कई समानताएं हैं। दोनों में संपत्ति को लेकर आपस में लड़ने वाले भाइयों का उल्लेख है। हिंदू आख्यानशास्त्र में देव और असुर, नाग और गरुड़, बाली और सुग्रीव तथा पांडवों और कौरव के बीच लड़ाई का उल्लेख है। इस्लामी आख्यानशास्त्र में काबिल और हाबिल, इसाक और इस्माइल, तथा याकूब और इसो, इन भाइयों के बीच लड़ाई का उल्लेख है। विरासत को लेकर इन लड़ाइयों से हमें याद दिलाया जाता है कि संस्कृतियों और धर्मों के बीच भेद के बावजूद हम हमारी मानवता से जुड़े हैं।








