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पिछले लेख में हमने मुंबई की भौगोलिक संरचना के साथ-साथ उत्तरी मुंबई में स्थित देवताओं के बारे में जाना था। आज के लेख में हम इसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। 14वीं सदी में गुजरात के सुल्तान उत्तर मुंबई के वसई पर शासन करने लगे। इस दौरान हाजी मलंग जैसे सूफी संत और अन्य गाजी इस क्षेत्र में आए। हाजी मलंग की दरगाह आज भी ठाणे-कल्याण क्षेत्र में मलंगगड नामक पहाड़ पर स्थित है। पहाड़ के नीचे स्थित पठार पर हाजी मलंग के अनुयायियों के पंच-पीरों से जुड़े तीर्थस्थल हैं। आख्यानों के अनुसार, ये पंच-पीर उड़ते हुए जादुई गलीचों पर बैठकर मक्का से भारत आए थे। इस पठार को पीर-माची कहते हैं। कई हिंदू मानते हैं कि यह स्थल मत्स्येंद्रनाथ जैसे भ्रमणकारी नाथ जोगियों से जुड़ा है, जो जोगी वसई-विरार क्षेत्र में स्थित सल्फर के गर्म पानी के झरनों में नहाने आए थे। ये झरने वज्रेश्वरी देवी जैसी योगिनियों से जुड़े हैं। 16वीं सदी में पुर्तगालियों ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया। उनके द्वारा बनाए गए सबसे प्राचीन गिरजाघर यहीं स्थित हैं। पुर्तगालियों ने उल्हास नदी के दक्षिण में स्थित मुंबई के मुख्य द्वीप को सैलसेट नाम दिया। ऐसा इसलिए कि किसी समय वहां छियासठ गांव हुआ करते थे और मराठी में छियासठ को सहा-सष्ट कहते हैं। इसी द्वीप पर गिलबर्ट हिल नामक पहाड़ भी है। यह पहाड़ करीब छह करोड़ वर्ष पहले ज्वालामुखी से निकले लावे के दबकर उभरने से बना है। इसके निकट कांदिवली के उपनगर में पाषाण युग के औजार भी पाए गए हैं। यहां के राजा व्यापार के कारण बढ़ती समृद्धि का संचालन करने के लिए शिक्षित ब्राह्मण समुदाय और प्रभु समुदाय के मुंशियों को यहां ले आए। लेकिन उनसे पहले यहां कई समुदाय रहा करते थे, जो भूमि से जुड़े काम करते थे और आज भी करते हैं। जैसे कोली, जो मछुआरे हैं। कुणबी, जो किसान हैं। आगरी, जो नमक बनाते हैं और भंडारी, जो ताड़ी इकट्ठी करते हैं। ये समुदाय स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते थे : गांव-देवी, जो गांव का प्रतीक हैं, जरी-मरी-शीतला देवी, जो बीमारियां ठीक करती हैं, वाघ-देव, जो बाघों से सुरक्षित रखते हैं और नाग-देव, जो सांपों से सुरक्षित रखते हैं। यहां आए व्यापारियों ने बोरीवली में कन्हेरी और अंधेरी में महाकाली गुफाओं सहित सौ से भी ज्यादा बौद्ध गुफाएं तराशी। फिर, लगभग छठी सदी में कलचुरी राजाओं के आगमन के साथ इस क्षेत्र में हिंदू देवता दिखाई देने लगे और उन्हें बौद्ध तीर्थस्थलों में रखा जाने लगा। जोगेश्वरी की गुफाओं में शिव और योगिनियों की प्रतिमाएं हैं। इनमें से केवल जोगेश्वरी नामक योगिनी प्रसिद्ध हैं। 9वीं और 12वीं सदियों के बीच शिलाहार राजाओं ने इस क्षेत्र पर राज किया। इसका प्रमाण हमें बोरीवली के निकट एक्सर गांव में स्थित वीरगल के रूप में मिला है। 1000 वर्ष पुराने इस पत्थर पर समुद्री युद्ध के दृश्य को तराशा गया है। ऐसे वीरगल पत्थर कोंकण के अन्य भागों में भी पाए जाते हैं।
सैलसेट द्वीप के दक्षिणी छोर पर बैंड्रा (बांद्रा) नामक उपनगर स्थित है। संभवतः बांद्रा नाम बंदरगाह के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द ‘बंदर’ से आया है। यहां मोत माउली, अर्थात मछुआरों की देवी-मां का मंदिर है। वे मानते थे कि मोती जैसी मोत माउली भी समुद्र की निवासी थी। जब यहां के निवासियों ने ईसाई धर्म अपनाया, तब यह मंदिर माउंट मेरी नामक गिरजाघर में बदल गया। संभवतः माउंट ‘मोत’ से और मेरी ‘मरी-आई’ अर्थात ‘जल-मां’ से आया है, जो ईसा मसीह को अपने हाथों में धारण करती हैं। सन 1739 में जब मराठों ने वसई पर नियंत्रण कर लिया, तब पुर्तगालियों ने इस गिरजाघर को नष्ट करके इसमें स्थित प्रतिमा को खाड़ी के उस पार माहिम के गिरजाघर ले गए। आज भी सभी धर्मों के श्रद्धालु लगातार नौ बुधवार वहां प्रार्थना करने जाते हैं। इसे नवीना कहते हैं और हिंदू व्रतों की तरह इसमें भी श्रद्धालु अपने लिए सुरक्षा और समृद्धि की मांग करते हैं। इस द्वीप के जो निवासी पुर्तगालियों द्वारा ईसाई बनाए गए, उन्हें पुर्तगाली ईसाई कहा जाने लगा। दूसरी ओर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा धर्मांतरित ईसाई ईस्ट इंडियन ईसाई कहलाते हैं। अगले सप्ताह, इस शृंखला के अंतिम लेख में हम दक्षिण मुंबई के देवताओं के बारे में जानेंगे।
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