देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

तेलंगाना में हर साल मनाए जाने वाले ‘बोनालु’ त्योहार में कलश यात्रा निकालतीं महिलाएं।
तेलुगु भाषी क्षेत्र पर जारी इस शृंखला के अंतिम लेख में हम इस क्षेत्र पर इस्लाम के प्रभाव के बारे में जानेंगे।
14वीं सदी में दिल्ली सल्तनत के दक्षिण भारत पहुंचने के बाद सूफी धर्म-प्रचारक भी यहां आए। इसी काल में विजयनगर साम्राज्य ने बहमनी सुल्तानों का विरोध किया। कपास महामार्गों पर नियंत्रण पाने के लिए दोनों के बीच संघर्ष हुआ। विजयनगर साम्राज्य कर्नाटक में केंद्रित था और उसके राजा प्रारंभ में शिव के विरूपाक्ष रूप की पूजा करते थे, जिनका मंदिर विजयनगर में स्थित था। लेकिन 16वीं सदी में जब दक्कन के सुल्तानों ने मिलकर विजयनगर को लूटा, तब विजयनगर के राजाओं को अपनी राजधानी दक्षिण की ओर स्थानांतरित करनी पड़ी। तभी से वे तिरुपति स्थित वेंकटेश्वर बालाजी की भी पूजा करने लगे। इसका उल्लेख सरकारी दस्तावेजों में मिलता है।
इसी समय से तेलंगाना पर मुसलमान शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा। 14वीं सदी में बहमनी सुल्तानों का, 16वीं सदी से कुतुबशाही सुल्तानों का और 18वीं सदी से निजामों का वहां शासन रहा। ये सभी गोलकोंडा की खदानों से मिले हीरों के कारण अत्यंत समृद्ध बने। ये खदानें इतनी प्रसिद्ध थीं कि अरब की लोककथाओं में जिस सिंदबाद नामक नाविक का उल्लेख मिलता है, वह भी हीरों की खोज में भारत आया था।
आंध्र प्रदेश के तिरुपति बालाजी के मुकुट को भी गोलकोंडा के हीरों से सजाया गया। मान्यता है कि जब भृगु ऋषि विष्णु से मिलने वैकुंठ पहुंचे, तब उन्होंने विष्णु को शयन करते हुए पाया। इससे अपमानित होकर उन्होंने विष्णु के सीने पर लात मारी। विष्णु ने विरोध करने के बजाय उलटा भृगु ऋषि से क्षमा मांगी। यह देखकर लक्ष्मी क्रोधित हो गईं और धरती पर चली आईं। विष्णु भी उनके पीछे-पीछे पृथ्वी पर आए। तिरुमलई के सात पहाड़ों को देखकर उन्हें आदि शेष के फणों की याद आई और इसलिए वे वहीं बालाजी के रूप में वास करने लगे।
तिरुपति में रहने के लिए बालाजी को वहां की राजकुमारी पद्मावती से विवाह करना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने कुबेर से ऋण लिया। मान्यता है कि बालाजी अपने श्रद्धालुओं की सहायता से यह ऋण चुकाते हैं। ऐसा विश्वास है कि जो श्रद्धालु उन्हें सोना और अपने केश दान करते हैं, वे भाग्यशाली बनते हैं। इसी मान्यता और विजयनगर राजाओं के संरक्षण के कारण तिरुपति बालाजी मंदिर भारत का सबसे समृद्ध मंदिर बन गया।
तेलंगाना में हिंदू धर्म का इतिहास कुतुबशाही सुल्तानों के दरबारियों मदन्ना और अक्कन्ना के उल्लेख के बिना अधूरा है। हालांकि दोनों भाई गैर-मुसलमान प्रजा से जजिया कर वसूलते थे, लेकिन उन्होंने बड़ी समझदारी से उस कर का उपयोग संपूर्ण प्रजा के लिए सुविधाएं निर्मित करने में किया। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी। उसी समय रूढ़िवादी मुसलमान अपने सुल्तान के गैर-मुसलमानों के प्रति उदार रवैये से नाराज भी थे। इसलिए उन्होंने औरंगजेब को उनके राज्य पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। शांति बनाए रखने के लिए मदन्ना और अक्कन्ना मुगल बादशाह को शुल्क देने के लिए तैयार हो गए, लेकिन औरंगजेब संपूर्ण भारत पर राज करना चाहता था। इसलिए, दोनों भाइयों का शिरच्छेदन कर दिया गया और उनकी कहानी देशभर में प्रसिद्ध हो गई।
उनके भांजे गोपन्ना श्रीवैष्णव पंथ के एक विख्यात भक्त कवि थे, जिन्होंने भद्राचलम में सीता रामचंद्रस्वामी मंदिर के निर्माण में सहायता की। अपने मामाओं की तरह वे भी कुतुबशाही राज्य में अधिकारी थे। जब उन्होंने राज्य के धन से राम मंदिर की मरम्मत करवाई, तब उन पर धन के दुरुपयोग का आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया गया। इसी दौरान औरंगजेब ने तेलंगाना पर आक्रमण किया। जब कुतुबशाही सुल्तानों को पता चला कि गोपन्ना को बंदी बनाए जाने से औरंगजेब उनसे नाराज है, तब उन्होंने गोपन्ना को मुक्त कर दिया। शांति बनाए रखने के लिए हैदराबाद के राजा द्वारा भद्राचलम मंदिर को मोती भेजने की परंपरा शुरू हुई।
तेलंगाना में वर्षाऋतु की शुरुआत से पहले मनाया जाने वाला बोनालु त्योहार अत्यंत लोकप्रिय है। ‘बोनालु’ शब्द भोग के लिए प्रयुक्त तेलुगु शब्द से बना है। इस त्योहार में महिलाएं लंबी शोभायात्राओं में मैसम्मा, पोचम्मा, येल्लम्मा और पेद्दम्मा जैसी काली देवी के क्षेत्रीय रूपों के मंदिरों तक सिर पर भोजन से भरे मटके लेकर जाती हैं।
इस अनुष्ठान के माध्यम से देवियों को शांत किया जाता है, ताकि भूमि बीमारियों से सुरक्षित रह सके। मान्यता है कि इन महिलाओं के शरीर में देवी की आत्मा प्रवेश करती है और देवी का भाई तथा रक्षक माने जाने वाले जंगली पोट-राजू उन्हें देवी तक मार्ग दिखाते हैं। यह परंपरा हमें इस भूमि के प्राचीन और देशज विश्वासों की याद दिलाती है। ये बुनियादी विश्वास आज भले ही गौण समझे जाते हों, लेकिन इस्लाम, जैन और बौद्ध धर्म तथा ब्राह्मणों के आगमन से पहले यही यहां की प्रमुख आस्थाएं थीं।









