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पिछले हफ्ते इस कॉलम में मैंने राज बब्बर की बात की थी। मैंने बताया था कि फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के प्रीमियर के लिए दिल्ली आए प्रकाश मेहरा साहब ने कैसे राज भाई को बॉम्बे बुलवा लिया था। अब पढ़िए आगे का किस्सा। मुंबई पहुंचकर राज बब्बर, प्रकाश मेहरा द्वारा दिए गए पते पर पहुंचे। वह जुहू में एक शानदार होटल था, जिसका नाम था किंग्स होटल। नीचे प्रकाश मेहरा जी का ऑफिस था। बकौल राज, मैं कार से उतरा और होटल को देखकर मन ही मन सोचा कि प्रकाश जी मुझे इसी होटल में ठहराएंगे। जब प्रकाश जी से बात हुई तो उन्होंने बताया, ‘मैं नमक हलाल फिल्म शुरू कर रहा हूं। विनोद खन्ना को ले रहा था, लेकिन वो संन्यास लेकर ओशो के आश्रम जा रहे हैं। इसलिए वो रोल मैं तुम्हें देना चाहता हूं।’ मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन मैंने फिर पूछा, ‘मेरे रहने का इंतजाम कहां है?’ उन्होंने कहा, ‘यहीं किया है।’ और अपने आदमी से बोले, ‘इन्हें इनका कमरा दिखा दो।’ ऑफिस का आदमी मुझे एडिटिंग रूम में ले गया। वहां एक छोटा सा कमरा था। उसने कहा, ‘यहीं तुम्हारे रहने का इंतजाम किया है।’ एडिटिंग रूम को देखकर राज साहब के होटल के भव्य कमरे वाली उम्मीद तो टूट गई, लेकिन फिर भी वे खुश थे कि इतनी बड़ी फिल्म के साथ उन्हें मुम्बई में रहने की जगह मिल गई थी। उन्हें लगा कि यहां से वे अपना रास्ता अपने दम पर बना लेंगे। मगर ऊपरवाले ने शायद तय कर रखा था कि राज बब्बर को सफलता इतनी आसानी से नहीं देनी है। राज भाई बताते हैं, एक दिन प्रकाश जी ने मुझे बुलाया और कहा कि वे किसी कारण से उन्हें ‘नमक हलाल’ में नहीं ले पाएंगे। उनकी बात सुनकर मुझे बुरा तो जरूर लगा, लेकिन मैं निराश नहीं हुआ। जब प्रकाश जी ने मुझे फिल्म से हटाने की बात कही, तब मैंने उनसे सिर्फ इतना कहा, ‘ठीक है, लेकिन आपसे मेरी एक रिक्वेस्ट है। भले ही मुझे फिल्म से निकाल दीजिए, मगर इस कमरे से मत निकालिए। मैं 1 जनवरी को यहां आया था और अगली 1 जनवरी को यह कमरा खाली कर दूंगा।’ वे राजी हो गए। इसी बात पर निदा फ़ाज़ली का एक शेर याद आ रहा है : कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन
फिर इस के ब’अद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर इसके बाद फिर संघर्ष शुरू हुआ। छोटी-छोटी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल करने शुरू कर दिए। उससे थोड़ी बहुत आमदनी भी होने लगी। एक बार बी.आर. चोपड़ा साहब ने खुद मुझे बुलाया और कहा, ‘मैं एक फिल्म बना रहा हूं। जीनत अमान से बात हो गई है। वह दो नए लड़कों के साथ काम करने को तैयार हैं।’ उन्होंने मुझे कहानी सुनानी शुरू की। कहानी सुनते-सुनते पता नहीं क्यों, एक एक्टर के तौर पर मेरा ध्यान बार-बार उसी किरदार की तरफ जा रहा था, जो नेगेटिव रोल था। मन में यही आ रहा था कि अगर ‘रमेश’ का रोल मिल जाए तो मजा आ जाए। नरेशन खत्म होने के बाद चोपड़ा साहब ने मुझसे वही रोल करने को कहा, जो मैं करना चाहता था। इस तरह मुझे ‘इंसाफ का तराजू’ मिल गई।
राज भाई ने मुझे ‘इंसाफ का तराजू’ का भी एक किस्सा सुनाया था। बकौल राज भाई, मैं दिल्ली में अपनी फैमिली के साथ फिल्म देखने गया। मैं आम पब्लिक के बीच बैठकर फिल्म देख रहा था। उसमें रेप वाले सीन को देखकर पब्लिक ने मुझे इतनी गालियां देनी शुरू कर दीं कि मां की आंखों में आंसू आ गए। इस पर मां ने मुझसे कहा, ‘बेटा, हम दो रोटी कम खा लेंगे, लेकिन तुम पैसे कमाने के लिए ऐसा काम मत करो।’ लेकिन एक एक्टर के तौर पर मुझे उसमें कोई बुराई नजर नहीं आई, क्योंकि इससे यह पता चल रहा था कि मैं अपनी परफॉर्मेंस में कामयाब हो गया था।
उसके बाद आई 31 दिसंबर 1979 की रात, यानी 1980 की पहली जनवरी। प्रकाश मेहरा साहब ने अपने बंगले पर पार्टी रखी थी। राज भाई को भी बुलाया गया। पार्टी के बाद राज भाई ने जेब से चाबी निकाली और शुक्रिया अदा करते हुए उनसे कहा, ‘मैंने आपसे वादा किया था कि एक साल बाद एक जनवरी को आपका कमरा खाली कर दूंगा। यह रही आपके कमरे की चाबी।’ राजेंद्र कुमार के भाई वीरेंद्र कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म में साइन किया था और रहने के लिए फ्लैट भी दे दिया था। इसलिए राज भाई पहली तारीख से वहां शिफ्ट हो गए। फिर उनके कॅरियर की गाड़ी ऐसी चली कि दोबारा कभी रुकी नहीं।
अब इससे जुड़ा इत्तेफाक भी सुनिए। कुछ दिन पहले मेरे दोस्त अशोक पंडित की बर्थडे पार्टी थी। पार्टी जुहू के एक बड़े रेस्टॉरेंट और पब में रखी गई थी। जब मैं वहां पहुंचा और गाड़ी पार्क की तो हैरान रह गया। यह किंग्स होटल के नीचे प्रकाश मेहरा के ऑफिस वाली जगह थी, जहां अब रेस्टॉरेंट और पब बन चुका था। मैं अंदर गया और राजपाल यादव को यह किस्सा सुनाया। तभी आमिर खान आ गए। मैंने उन्हें भी बताया कि यह वही जगह है, जहां से मुकद्दर का सिकंदर, लावारिस जैसी फिल्में बनी हैं। फिर मैंने उन्हें राज भाई वाला पूरा किस्सा सुनाया। आमिर को इस पर यकीन ही नहीं हुआ। तभी संयोग से राज बब्बर अपनी बेटी जूही और दामाद अनूप के साथ वहां पहुंच गए। फिर राज भाई ने खुद कहा, ‘रूमी ने जो किस्सा सुनाया, वह बिल्कुल सच है।’ आज राज भाई को याद करते हुए उनकी फिल्म ‘प्रेम गीत’ का यह गीत सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए:
‘होंठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो…’
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