गौरव पाठक32 मिनट पहले
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आज के डिजिटल युग में एटीएम कार्ड वित्तीय लेन-देन के अनिवार्य साधन बन गए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि एटीएम कार्ड्स से काफी सुविधा मिल जाती है, लेिकन इनके जरिए धोखाधड़ी के शिकार होने की संभावना भी सबसे ज्यादा होती है। उपभोक्ताओं के लिए यह जानना जरूरी है कि अनधिकृत एटीएम निकासी की स्थिति में उनके क्या अधिकार हैं और इस संबंध में कौन-कौन से कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।
सुरक्षा सुनिश्चित करने का जिम्मा किसका? अपने ग्राहकों की धनराशि की सुरक्षा सुनिश्चित करना बैंकों का प्राथमिक दायित्व है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को एटीएम धोखाधड़ी की रोकथाम और पहचान के लिए ठोस प्रणाली लागू करने के निर्देश दे रखे हैं। इसमें एन्क्रिप्शन, सुरक्षित पिन प्रबंधन और रीयल-टाइम लेन-देन निगरानी जैसे सुरक्षा उपाय शामिल हैं। प्रवीण कुमार जैन बनाम एचडीएफसी बैंक लिमिटेड (2023) मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने फैसला दिया कि यदि बैंक निर्धारित समय सीमा के भीतर अनधिकृत लेन-देन की शिकायत पर कार्रवाई करने में विफल रहता है तो उसे ग्राहक को विवादित राशि का भुगतान करना होगा। इससे स्पष्ट है कि एटीएम धोखाधड़ी के मामलों की त्वरित जांच और समाधान की जिम्मेदारी बैंकों पर होती है।
ग्राहकों को कोई वित्तीय हानि नहीं ग्राहकों की वित्तीय सुरक्षा को लेकर आरबीआई का सर्कुलर उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि अनधिकृत लेन-देन बैंक की लापरवाही या किसी आंतरिक धोखाधड़ी के कारण हुआ है तो ग्राहक की कोई देयता नहीं होगी। यहां तक कि यदि किसी थर्ड पार्टी द्वारा सुरक्षा भंग की गई हो तो भी अगर ग्राहक तीन कार्यदिवसों के भीतर बैंक को सूचित करता है तो उसे कोई वित्तीय हानि नहीं होगी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम भगवत प्रसाद चंद्र (2024) मामले में छत्तीसगढ़ राज्य आयोग ने पाया कि बैंक ने ग्राहक के खाते को किसी अज्ञात व्यक्ति के आधार नंबर और असम्बद्ध मोबाइल नंबर से जोड़कर और बिना अनुरोध किए एटीएम कार्ड जारी करके गंभीर लापरवाही बरती। आयोग ने जिला फोरम के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बैंक को ‘सेवा में कमी’ के कारण अनधिकृत निकासी के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था।
ग्राहक बैंक को समय पर करें रिपोर्ट अगर ग्राहक धोखाधड़ी की स्थिति में कोई वित्तीय नुकसान उठाना नहीं चाहता है तो उसे किसी भी अनधिकृत लेन-देन के बारे में बैंक को तुरंत सूचित करना चाहिए। बैंक को सूचित करने में देरी से वित्तीय नुकसान की आशंका बढ़ जाती है। आरबीआई के दिशा-निर्देशों के अनुसार बैंकों को सातों दिन और चौबीसों घंटे (24×7) कई माध्यमों से ग्राहकों को अनधिकृत लेन-देन की रिपोर्ट करने की सुविधा देनी चाहिए। पंजाब नेशनल बैंक बनाम प्रीत कौर (2024) मामले में उत्तराखंड राज्य आयोग ने कहा कि बैंक को तुरंत सूचित करना और पुलिस शिकायत दर्ज कराना यह दर्शाता है कि ग्राहक की ओर से कोई लापरवाही नहीं बरती गई थी। आयोग ने बैंक को ब्याज सहित अनधिकृत निकासी की राशि वापस करने का निर्देश दिया।
साक्ष्य सुरक्षित रखना जरूरी बैंकों को विवादित लेन-देन से संबंधित एटीएम रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखना चाहिए। यदि बैंक ऐसे प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहता है तो ‘सेवा में कमी’ के मामले में उसका बचाव कमजोर हो जाता है। पंजाब नेशनल बैंक बनाम सूरज भान (2024) मामले में हरियाणा राज्य आयोग ने बैंक का मामला इस आधार पर कमजोर माना कि वह ग्राहक द्वारा एटीएम से निकासी किए जाने का प्रमाण देने के लिए अपनी ओर से सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत नहीं कर सका। ग्राहकों को भी अपनी शिकायत और बैंक के साथ हुए संपूर्ण पत्राचार की प्रति सुरक्षित रखनी चाहिए, क्योंकि उपभोक्ता शिकायत दर्ज करते समय ये सहायक हो सकते हैं।
मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा विवादित राशि के अलावा उपभोक्ता आयोगों ने अनधिकृत निकासी और बैंक की दोषपूर्ण शिकायत निवारण प्रक्रिया के कारण ग्राहकों को हुई मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए मुआवजा भी प्रदान किया है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम भगवत प्रसाद चंद्र (2024) मामले में छत्तीसगढ़ राज्य आयोग ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 39(1)(d) के तहत 20,000 रुपए मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया।
(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








