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- What Is The Relation Of Buddhist Stupas And Hindu Temples With Greek Civilization?
देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले
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भारत के प्राचीनतम हिंदू मंदिरों मंे से एक एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर। इसका निर्माण आठवीं सदी में माना जाता है।
पिछले सप्ताह के लेख में हमने हिंदू धर्म में मंदिरों की उत्पत्ति पर चर्चा की थी। हमने देखा कि सिंधु घाटी सभ्यता में मंदिरों के निर्माण के कोई प्रमाण अब तक नहीं मिले हैं। फिर हमने उन दो प्रमुख विचारधाराओं को समझा, जो मंदिरों की उत्पत्ति के संबंध में आज प्रचलित हैं। अंत में हमने जाना कि हिंदू धर्म में स्थायी मंदिर वैदिक काल के बहुत बाद बनाए जाने लगे और इसमें संभवत: यूनानी प्रभाव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आइए इस लेख में उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।
यूनानियों के आने से पहले यानी लगभग 500 ईसा पूर्व तक भारत में एक बड़ा बौद्धिक बदलाव हो चुका था। बौद्ध और जैन जैसे संन्यासी धर्म वैदिक आर्यों के यज्ञ और कर्मकांड को अस्वीकार कर उसकी जगह व्यक्तिगत चिंतन और ध्यान को अधिक महत्व देने लगे थे।
भारत में मूर्तिपूजा की शुरुआत में भी बौद्ध धर्म का बड़ा योगदान रहा। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अनुयायी उनके दांत, केश और अन्य अवशेष अपने साथ ले गए। उन दिनों अवशेषों को नदी में प्रवाहित करने की प्रथा थी, लेकिन बुद्ध के अवशेषों को मिट्टी के टीलों के नीचे रखकर उनके ऊपर छतरियां बना दी गईं। इन्हें स्तूप कहा गया और लोग उनकी परिक्रमा और उपासना करने लगे। माना जाता है कि आज मंदिरों में देवता की प्रदक्षिणा करने की प्रथा इन्हीं स्तूपों की परिक्रमा से उत्पन्न हुई।
समय के साथ मिट्टी के टीले और छतरी की जगह पत्थर की संरचनाएं बनने लगीं, जिन पर विस्तृत नक्काशी की जाती थी। संभवत: यह यूनानी प्रभाव का परिणाम था। सांची का आलंकारिक स्तूप इसका प्रमुख उदाहरण है, जो बाड़े और प्रवेशद्वार से घिरा हुआ है और जिन पर विभिन्न मिथकीय जीवों की नक्काशी मिलती है। आगे चलकर बुद्ध के काल से लगभग 500 वर्ष बाद यूनानी प्रभाव के कारण स्तूपों पर बुद्ध की प्रतिमाएं भी अंकित की जाने लगीं। इसके बाद स्तूपों के चारों ओर चैत्य बनाए गए। प्रारंभिक मंदिर इन्हीं संरचनाओं पर आधारित थे।
326 ईसा पूर्व में सिकंदर के आक्रमण के बाद यूनानियों ने उत्तर-पूर्व भारत में कई राज्य स्थापित किए। इसके परिणामस्वरूप भारत यूनान, मिस्र, मेसोपोटामिया और फारस की सभ्यताओं और विचारों से परिचित हुआ। उन सभ्यताओं में पत्थर और ईंट के विशाल मंदिर, पिरामिड और महाविद्यालय बनाए जाते थे। फलस्वरूप भारत में पत्थर की प्रारंभिक प्रतिमाओं पर यूनान का प्रभाव साफ दिखाई देता है। यूनानी इमारतों में ओबिलिस्क नामक स्वतंत्र खड़े स्तंभ बनाए जाते थे। इसी से प्रभावित होकर भारत के मंदिरों में ध्वज-स्तंभ बनाए गए, जो आज भी मंदिर वास्तु का प्रमुख अंग हैं। यूनानी मंदिरों में देवता आवरणों से ढके रहते थे। यही परंपरा भारतीय मंदिरों में भी दिखाई देती है, जहां अनुष्ठानों के समय देवताओं को आवरण से ढक दिया जाता है। राजस्थान और गुजरात की हवेलियों में श्रीनाथजी के पीछे लगने वाली पिछवाई इसका उदाहरण है। यह रोचक है कि रंगमंच पर प्रयोग होने वाले पर्दे को आज भी ‘यवनिका’ कहा जाता है।
प्रारंभिक हिंदू मंदिर गुफाओं में बनाए गए। भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक मुंबई के पास एलिफेंटा की गुफाओं में स्थित है। हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि इन मंदिरों में पूजा की जाती थी, लेकिन वहां की पत्थर की मूर्तियां स्पष्ट रूप से लकड़ी की मूर्तियों की प्रतिकृतियां प्रतीत होती हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि पत्थर के मंदिर बनने से पहले लकड़ी के मंदिर बनाए जाते थे। नेपाल, केरल और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में ऐसे लकड़ी के मंदिर आज भी देखे जा सकते हैं। समय के साथ जब पत्थर के अपने आप में स्वतंत्र मंदिर बनने लगे तो एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर और चेन्नई के पास महाबलीपुरम का पंचरथ मंदिर इसके श्रेष्ठ उदाहरण बने।
6ठी से 16वीं शताब्दी के बीच पूरे भारत में पत्थर के मंदिर निर्माण की कला ने एक परिष्कृत रूप ले लिया। मंदिर की वास्तुकला और मूर्तिकला दोनों में बड़े परिवर्तन हुए। इस अवधि में मंदिरों का निर्माण ब्रह्मांडीय मानचित्र अर्थात् मंडल के आधार पर होने लगा। देवता की प्रतिमा गर्भगृह में स्थापित की जाती थी। गर्भगृह के ऊपर शिखर बनाया जाता। गिरजाघर या मस्जिद में जहां श्रद्धालु निराकार ईश्वर की उपासना करते हैं, वहीं मंदिर देवता का आलय बन गए। जैसे लोग राजा के सम्मान में राजदरबार जाते थे, वैसे ही देवता की उपासना के लिए श्रद्धालु मंदिर जाने लगे।
समय के साथ मंदिरों की प्रतिमाएं प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर अधिक सजीव और वास्तविक बन गईं। खजुराहो, कोणार्क, चिदंबरम और मदुरई के मंदिरों की प्रतिमाओं में यह सजीवता स्पष्ट दिखाई देती है। यही विशेषता उन्हें आधुनिक काल की प्रतिकृतियों से अलग करती है।
दक्षिण भारत में मंदिरों की सुरक्षा के लिए उनके चारों ओर ऊंची दीवारें बनाई जाने लगीं। इन दीवारों में भव्य प्रवेशद्वार होते और उनके ऊपर ऊंचे गोपुरम बनाए जाते। इन अलंकृत गोपुरमों ने दक्षिण भारतीय मंदिरों की एक विशिष्ट पहचान बना दी। दीवारों के भीतर अन्य देवताओं के मंदिर भी बनाए गए और इस तरह संपूर्ण मंदिर परिसर का स्वरूप विकसित हुआ। जैसे बौद्ध धर्म में चैत्य के चारों ओर विहार यानी मठ बनाए जाते थे, वैसे ही हिंदू मंदिर परिसरों के चारों ओर ब्राह्मणों के घर होते थे। श्रीरंगम और तिरुवनंतपुरम जैसे नगर इसी प्रकार विकसित होकर आज भी जीवंत हैं।








