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रामायण और महाभारत पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। संस्कृत में रचे गए ये महाकाव्य ब्राह्मण कथाकारों के साथ तीर्थयात्रा मार्गों से होते हुए भारत भर के राजदरबारों तक पहुंचे और वहां से जनसाधारण में फैले। लेकिन भारत में ऐसे अनेक महाकाव्य भी हैं, जो क्षेत्रीय भाषाओं में रचे गए और स्थानीय मुद्दों को उठाते हैं, जिस कारण अक्सर उनकी उपेक्षा की गई। संभव है कि कर्नाटक के निवासी राजस्थान के पाबूजी और देव नारायणजी की कथाओं से परिचित न हों। इसी तरह ओडिशा के शहरी निवासियों ने ओडिशा के जनजातीय गौर समुदाय के पशुपालक कोटराबाइना के महाकाव्य के बारे में न सुना हो। तमिलनाडु के मदुरई वीरन की कथा भी इसी श्रेणी की एक महत्वपूर्ण कहानी है। वीरन एक अत्यंत सुंदर और बलशाली युवक था। एक दिन वर्षा ऋतु में वह अपने पिता के कहने पर वहां के सरदार के ताड़ पत्र से बने घर की रक्षा करने गया। वहीं उसकी मुलाकात सरदार की बेटी से हुई और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे। वे जानते थे कि उनका सामाजिक स्तर अलग है और इसलिए उनके परिवार इस संबंध को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। इसी कारण वे घर से भाग गए। स्वाभाविक रूप से लड़की के पिता, उसके मामा और उनके सिपाहियों ने उनका पीछा किया। वीरन ने अकेले ही सब से युद्ध कर उन्हें पराजित किया और दोनों प्रेमी शहर की ओर भाग निकले। शहर में वीरन ने चोरों और लुटेरों से लड़कर मवेशियों की रक्षा की। शीघ्र ही वह अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध हो गया। व्यापारी, किसान और चरवाहे अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए उसकी सहायता लेने लगे। अंततः नायक वंश के राजा ने अपने नगरों को चोरों से सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी उसे सौंप दी। एक दिन मदुरई में वीरन ने राजसी नर्तकी को देखा और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे। जब राजा को इस संबंध का पता चला तो उसे ईर्ष्या हुई। दरबारियों ने भी राजा को यह कहकर उकसाया कि चोरों को पकड़ने में हो रही देरी का कारण यह है कि वीरन राजा को गद्दी से हटाने की साजिश कर रहा है। राजा ने इन बातों पर विश्वास कर वीरन को पकड़वा लिया और उसे कठोर दंड दिया। उसके हाथ और पैर काट दिए गए, ताकि अत्यधिक रक्तस्राव से उसकी मृत्यु हो जाए। उसकी दोनों प्रेमिकाएं यह दुर्दशा सहन न कर सकीं और उन्होंने मदुरई की मीनाक्षी देवी से वीरन को बचाने की प्रार्थना की। देवी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर वीरन के कटे अंगों का पुनर्निर्माण किया। किंतु वीरन चाहता था कि उसकी मृत्यु एक योद्धा के अनुरूप हो। इसलिए उसने स्वयं अपना शिरच्छेदन कर लिया। उसकी दोनों प्रेमिकाओं ने चिता में कूदकर उसके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया। इस कथा के अन्य भी कई वृत्तांत प्रचलित हैं। वीरन की कथा के प्रत्येक वृत्तांत में उसके जीवन के किसी न किसी पक्ष को उजागर किया गया है। इनमें सबसे स्पष्ट पक्ष प्रेमियों के बीच जाति और वर्ग का भेद है। किसी परंपरागत समाज में उत्थान तभी संभव माना जाता है, जब पुण्य अर्जित किया जाए और वह पुण्य विवाह के माध्यम से सुदृढ़ हो। नगर की रक्षा कर वीरन ने जो पुण्य कमाया, उसका लाभ उसे तभी मिला जब उसने उच्च जाति की स्त्री से विवाह किया। कुछ कथाओं के अनुसार वीरन वास्तव में एक राजकुमार था, जिसे उसके पिता को बाल्यावस्था में त्यागना पड़ा था। एक निर्धन निःसंतान दंपती ने उसे गोद ले लिया था, ठीक उसी प्रकार जैसे महाभारत में कर्ण के साथ हुआ। कुछ अन्य कथाओं में वीरन को देवता माना गया है। इस दृष्टि से सरदार की बेटी के प्रति उसका प्रेम कोई अपराध नहीं बल्कि उसका राजसी या दैवीय अधिकार था और उसने कोई धार्मिक नियम नहीं तोड़ा था। यह कथा समुदाय के अनुसार रूप बदलती है। महिलाओं को सुनाई जाने वाली कथाओं में वीरन ने सरदार की बेटी और नर्तकी के प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया, जबकि पुरुषों को सुनाई जाने वाली कथाओं में इन स्त्रियों ने पहले वीरन के प्रति अपना प्रेम प्रकट किया। अंत में ईर्ष्या का प्रसंग महत्वपूर्ण है। राजा को इस बात से ईर्ष्या हुई कि राजसी नर्तकी ने उसे छोड़कर एक युवक को चुना। इससे स्पष्ट होता है कि भले ही हम यह मानते हों कि लोगों की पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए, पर व्यवहार में हमारा आचरण अक्सर इन मान्यताओं से भिन्न होता है। यह कथा अत्यंत कुशलता से समाज में वर्गीकरण, सीमाओं और मानवीय व्यवहार की जटिलताओं को समझाती है। मदुरई वीरन की मूर्तियां दक्षिण भारत में देवी मंदिरों के निकट, विशेष रूप से भव्य मीनाक्षी अम्मन मंदिर के आसपास, संरक्षक देवता के रूप में स्थापित हैं। उन्हें भोजन अर्पित किया जाता है, यहां तक कि सिगरेट भी चढ़ाई जाती है, ताकि उनकी भूख शांत की जा सके। श्रद्धालु उन्हें मिट्टी के बने घोड़े भी अर्पित करते हैं, इस विश्वास के साथ कि मदुरई वीरन उनकी रक्षा करेंगे और उन्हें समृद्धि प्रदान करेंगे। उत्तराखंड के गोलू देवता, राजस्थान के देव नारायणजी और बंगाल के धर्मा ठाकुर सहित भारत के अन्य लोक नायक और संरक्षक देवताओं को भी इसी प्रकार के अर्पण दिए जाते हैं। इन सभी कथाओं में वीर पुरुषों ने हिंसा और प्रेम के माध्यम से जाति और वर्ग की सीमाओं का उल्लंघन किया, किंतु अंततः वे देवताओं या राजाओं के पुत्र सिद्ध हुए।
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