देवदत्त पट्टनायक3 घंटे पहले
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रामायण प्रकृति और संस्कृति के बीच भेद करती है। इसमें वन की निवासी शूर्पणखा के माध्यम से प्रकृति और संस्कृति के बीच के अंतर को समझाया गया है।
शूर्पणखा का पति विद्युतजिह्वा भी एक राक्षस था। रावण और विद्युतजिह्वा के बीच लड़ाई की कई कहानियां हैं। दक्षिण-पूर्वी एशियाई रामायणों के अनुसार अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान रावण ने पाया कि एक राक्षस ने पाताललोक को अपनी विशाल जीभ से ढककर उसे सुरक्षित कर रखा था। रावण ने इस बात से अनजान रहकर कि वह जीभ उसके बहनोई की है, उसने अपने बाण से जीभ को नष्ट कर दिया। इस प्रकार विद्युतजिह्वा अनजाने में मारा गया। दूसरी कहानी के अनुसार दोनों में मतभेद के कारण उनमें लड़ाई हुई और विद्युतजिह्वा मारा गया।
दक्षिण भारत की एक रोचक लोककथा के अनुसार शूर्पणखा और मंदोदरी के बीच हुए झगड़े की वजह से रावण और विद्युतजिह्वा में लड़ाई हुई। विद्युतजिह्वा ने अपनी लंबी जीभ में रावण को फंसाकर उसे निगल लिया। तब रावण ने शूर्पणखा से विद्युतजिह्वा का पेट चीरकर अपने को बचाने की भीख मांगी। शूर्पणखा अपने पति को मारना नहीं चाहती थी। तब रावण ने लालच दिया कि यदि शूर्पणखा ने उसे बचा लिया तो वह शूर्पणखा के पुत्र को लंका का राजा बना देगा। शूर्पणखा ने रावण पर विश्वास किया और अपने हाथों से अपने पति का पेट चीरकर उसे मार डाला और रावण को बचा लिया। हालांकि यह लोककथा बहुत प्रसिद्ध नहीं है।
फिर कहानी ने एक रोचक मोड़ लिया। रावण ने शूर्पणखा के विधवा होने के लिए अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए उसे दंडकारण्य में घूमने और वहां अपनी पसंद के किसी भी पुरुष से संबंध रखने की पूरी सहमति दे दी। इस दिलचस्प बात को हमें ध्यान में रखना होगा।
शूर्पणखा का प्रतिशोध
रामायण के विभिन्न वृत्तांतों में शूर्पणखा के पुत्र के भिन्न नाम हैं, जैसे शंबीरी, शंबकुमार और जांबुलकुमार। अपनी मां को मिले वचन के कारण शंबीरी को लगा कि उसे लंका का राजा बनाया जाएगा। लेकिन इंद्रजीत ने उसका भ्रम दूर करते हुए कहा कि रावण ने उसकी मां को झूठा वचन दिया था। इससे शंबीरी को बहुत बुरा लगा और उसने यह बात शूर्पणखा को बताई। तब शूर्पणखा ने विद्युतजिह्वा की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। उसे याद आया कि ब्रह्मा से मिले वर के कारण कोई पशु, पक्षी, यक्ष, देवता, असुर, विद्याधर और वानर रावण का वध नहीं कर सकता था। इसलिए वह एक ऐसे मनुष्य को ढूंढ़ने निकली जो रावण का वध कर सके। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वन में शूर्पणखा और राम का मिलन मात्र एक संयोग था। लेकिन इस लोककथा के अनुसार यह शूर्पणखा द्वारा रचा गया एक षड्यंत्र था।
इस दंतकथा को कितना महत्व देना है, मुझे नहीं पता। मैं कहानी में निहित ज्ञान और उसके उद्देश्य पर ध्यान देता हूं, न कि कहानी की सत्यता पर। इस कहानी से यथासंभव रावण का चरित्र समझाया जा रहा है। इसका महत्व हम बाद में देखेंगे।
राम और लक्ष्मण से मिलन एक दिन शूर्पणखा वन में राम से मिली। राम की सुंदरता से मोहित होकर उसने उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन राम ने उसे यह कहकर नकार दिया कि वे तो सीता से विवाहित हैं। यह सुनकर शूर्पणखा को ईर्ष्या महसूस हुई और क्रोध भी आया। फिर राम ने लक्ष्मण से मिलने को कहा। लक्ष्मण ने भी उसे नकार दिया, क्योंकि राम और सीता की सेवा करना ही उनका एकमात्र उद्देश्य था और वे भी विवाहित थे। इस प्रकार, राम और लक्ष्मण दोनों ने शूर्पणखा को सहमति नहीं दी।
लेकिन शूर्पणखा ठहरी राक्षसी, जो अपनी पशु प्रवृत्ति के पार नहीं जा पाई थी। अनुमति की धारणा उसकी समझ के बाहर थी। वह केवल हड़पने की आदी थी। वह राम को बलपूर्वक पाना चाहती थीे और इसलिए उसने सीता पर आक्रमण किया। सीता को बचाने के प्रयास में लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी।
कलह के बीज
रामायण में स्त्री के विरुद्ध यह घटना निर्णायक थी। उसके पश्चात रामायण से माधुर्य और शृंगार रस चले गए और उसमें वीभत्स तथा रौद्र रस आ गए। शूर्पणखा इस घटना से अत्यंत क्रोधित हुईं। उसके कहने पर उसके भाइयों खर और दूषण ने राम और लक्ष्मण पर वार किया। युद्ध में खर, दूषण और अन्य राक्षस मारे गए।
इसलिए शूर्पणखा ने लंका जाकर रावण को वन में हुईं घटनाओं का वर्णन दिया। उसने समझाया कि शूर्पणखा पर वार रावण पर वार के बराबर है। उसने रावण को याद दिलाया कि इन्हीं युवकों ने कई वर्ष पहले विश्वामित्र के यज्ञ के समय ताटक, मारीच और सुबाहु राक्षसों का वध किया था। इन बातों से शूर्पणखा ने रावण में भय का संचार कर उसे उकसाया भी। वह उनसे इसलिए भी घबरा गया कि ब्रह्मा से अमरत्व का वर मांगते समय मनुष्यों का उल्लेख करना भूल गया था। राम विष्णु के अवतार थे, पर रावण को इस बारे में पता नहीं था।
शूर्पणखा रावण के स्वार्थी स्वभाव से भी भली-भांति परिचित थी। जिस भाई ने अपनी बहन को विधवा बनाया था, वह उसे न्याय दिलाने के लिए क्यों लड़ाई करता? इसलिए शूर्पणखा ने एक चाल चली। उसे पता था कि रावण को सुंदर स्त्रियां अच्छी लगती थीं, इसलिए उसने रावण से सीता की सुंदरता का वर्णन किया। जैसे अपेक्षित था, वैसे ही रावण सीता की सुंदरता से मोहित हुआ। अपनी बहन को न्याय दिलाने का झूठा कारण देकर उसने सीता का अपहरण किया। इस तरह इससे हम रावण के चरित्र को समझ सकते हैं।
साभार: ‘लंकेश – रावण संग एक रोमांचक यात्रा’ (पेंगुइन स्वदेश)।