रूमी जाफरी1 घंटे पहले
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गीतकारों और शायरों की इस कड़ी में आज मेरे हिस्से के किस्से में उस गीतकार की बात, जिसने अपनी शायरी से न केवल देश, बल्कि विदेशों के भी हर मुशायरे को लूट लिया, साथ ही फिल्मी गीतों में भी उनकी जबरदस्त शायरी सुनने को मिलती थी। वो शायर और गीतकार थे जनाब राहत इंदौरी।
मुझे अच्छी तरह याद है कि ये 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है, जब मप्र के भोपाल स्थित रवींद्र भवन में ऑल इंडिया रेडियो का मुशायरा था। मैं भी वहां मौजूद था। मुशायरे में अनाउंस हुआ कि अब आपके सामने तशरीफ ला रहे हैं इंदौर से आए एक नौजवान शायर जनाब राहत इंदौरी। और राहत भाई जैसे ही माइक पर सामने आए, वैसे ही उन्हें देखकर हॉल में बैठे कुछ लोग हंस दिए। इस पर राहत भाई ने कहा कि हाजरीन, मुझे नहीं, मेरे कलाम को देखिए और मेरा दावा है कि मेरा कलाम सुनने के बाद इसी शख्स, जो आपके सामने खड़ा है, से अगर आपको मोहब्बत न हो जाए तो मैं शायरी छोड़ दूंगा। मैं गवाह हूं उस शाम का, जब उन्होंने पढ़ना शुरू किया तो ऐसा समां बांधा कि जो उन पर हंस रहे थे, वो अब शर्मिंदा थे और वाह वाह करते थक नहीं रहे थे। इसी बात पर मुझे राहत इंदौरी का ही एक शेर याद आ रहा है –
अभी गनीमत है सब्र मेरा अभी लबालब भरा नहीं हूं वो मुझको मुर्दा समझ रहा है उससे कहो मैं मरा नहीं हूं
बात शायद 2003 की है। मेरी एक फिल्म शुरू होने वाली थी और कहानी लिखते वक्त हमने फैसला लिया था कि गाने आनंद बक्शी जी से लिखवाएंगे। मगर प्लानिंग के दौरान ही उनका स्वर्गवास हो गया। अब सबने सोचा कि किसे लिया जाएं और हम इस फैसले पर आए कि उनकी जगह राहत इंदौरी साहब को लिया जाना चाहिए। खैर, मैंने राहत भाई से कांटेक्ट करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा था। हर बार हमें यही बताया गया कि वे बाहर हैं, मुशायरे में गए हैं। करीब एक महीने के बाद मेरी राहत भाई से बात हो पाई। मैंने उनसे कहा कि आपसे रूबरू मिलकर ही आगे की चर्चा करूंगा। वो मेरे यहां आए। मैंने सोचा कि मैं जैसे ही उनसे कहूंगा कि मैं आपसे गाना लिखवा रहा हूं, वो बहुत खुश होंगे। तो मैंने कहा कि राहत भाई, आपको हमारी फिल्म में गाने लिखने हैं। इस पर उन्होंने कहा, रूमी भाई आपको पता नहीं मेरे बारे में, मैंने फिल्मों में गाने लिखना बंद कर दिया है। अब मैं गाने नहीं लिखता हूं।
मैं हैरान रह गया। मैंने पूछा कि आप ये क्या बात कर रहे हैं? तो वो बोले हां, मैंने आखिरी बार फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस के लिए गाने लिखे हैं। उसके बाद से नहीं लिख रहा हूं। मुझे बहुत हैरानी हुई और मैंने कहा कि आप फिल्मों में गाने नहीं लिखोंगे तो फिर खर्चा वर्चा, उसका क्या होगा। तो वो बहुत हंसे और मुझे देखकर बोले, रूमी मियां, आप फिल्म वाले मुझे क्या पैसे दोगे। आप लोग जो पैसे देते हैं, मुशायरों वगैरह से उससे बहुत ज्यादा कमाता लेता हूं। दरअसल, मुझे ऐसा लग रहा था कि मुशायरे अब कम हो गए हैं तो मैंने इसीलिए उनसे पूछ लिया, कैसे? तो उन्होंने मुझको बताया कि मैं एक टूर लगाता हूं अमेरिका का। वहां मेरा प्राइज फिक्स होता है। मैं शनिवार और रविवार को मुशायरे अटेंड करता हूं और वीकडेस पर वहां के लोग मुझे अपने यहां दावत पर बुलाते हैं, तोहफे भी देते हैं और कभी-कभी लिफाफा भी दे देते हैं। मैं इसी से खुश हूं, इज्जत से दुनिया घूम रहा हूं।
मैंने उनसे पूछा कि आपने अचानक से ये फैसला कैसे ले लिया कि आप फिल्मों के लिए गाने नहीं लिखेंगे? आप मुशायरों के साथ-साथ ये भी लिखते रहते। वो बोले कि रूमी मियां, एक बहुत बड़े फिल्म मेकर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर जिनका मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा, जब उन्होंने मेरा तीसरा मुखड़ा रिजेक्ट किया तो उनके घर से निकलते वक्त मैंने एक शेर कहा था कि बहुत मुश्किल है गजलों की रोटियां खाना। बहरे को भी शेर सुनाना पड़ता है। उसी दिन से मैंने ये फैसला ले लिया था कि अब मैं फिल्मों के लिए गाने नहीं लिखूंगा।
इसके बाद वो चले गए। खैर, वक्त गुजरा। अब बात आई 2011 में। मैंने फिर उन्हें फोन किया और कहा कि राहत भाई आप मेरे घर आइए, मुझे कुछ बात करनी है। और राहत भाई मेरे घर आए। मैंने फिर राहत भाई से कहा कि राहत भाई, मैं एक फिल्म शुरू कर रहा हूं जिसका टाइटल है ‘गली गली चोर है’, और मैं ये फिल्म सिर्फ लिख ही नहीं रहा हूं, बल्कि डायरेक्ट भी कर रहा हूं। फिल्म भ्रष्टाचार पर है। आप हमेशा सिस्टम और सरकार के खिलाफ लिखकर देश और लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम करते आए हों और देशभक्ति के शेर लिखकर देश प्रेम भी जगाते रहे हों तो इसके लिए तो आपको गाने लिखने ही पड़ेंगे। तो मेरी मोहब्बत में उन्होंने हां कर दी।
हकीकत यह है कि चूंकि वो हमेशा सिस्टम और सरकार के खिलाफ लिखते रहे, चाहे वो किसी भी पार्टी की सरकार हो और इसीलिए उन्हें देश का कोई भी नागरिक सम्मान या पद्म सम्मान नहीं मिला। मगर उन्हें इसका कोई अफसोस या मलाल भी नहीं था। असली सम्मान तो उन्होंने देश की जनता का दिल जीतकर हासिल किया था। इसीलिए जनता आज तक उनका और उनके कलाम का सम्मान करती है, उन्हें प्यार करती है। आज राहत इंदौरी साहब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके बेटे सतलज राहत इंदौरी कमाल के युवा शायर हैं और अपने वालिद की ही तरह महफिलों में चार चांद लगा देते हैं।
आज राहत इंदौरी जी की याद में उनका लिखा फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस का ये गाना सुनिए और गौर कीजिए कि एक अच्छा बड़ा शायर एक आइटम सांग भी लिखता है तो उसमें भी एक गहरी बात होती है। अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
देख लें, आंखों में आंखें डाल सीख लें, हर पल में जीना यार…








