देवदत्त पट्टनायक4 घंटे पहले
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आठवीं सदी में निर्मित कामदेव की प्रतिमा, जो मप्र के विदिशा संग्रहालय में मौजूद है। शिवजी की तीसरी आंख के सबसे पहले शिकार कामदेव ही बने थे। वही से शिव ‘विनाशक’ कहलाए।
शिव के ललाट के केंद्र में स्थित उनकी तीसरी आंख ने हमेशा से ही लोगों को मोहित किया है। कई लोग मानते हैं कि इसी आंख के कारण शिव को ‘विनाशक’ कहा जाता है। यह मान्यता भी है कि शिव क्रोधित होने पर यह आंख खोलते हैं, जैसे जब उन्हें उनकी पत्नी सती की मृत्यु का पता चला था।
लेकिन शिव की कथाओं को ध्यानपूर्वक पढ़ने से कुछ अलग ही पता चलता है। सती के पिता दक्ष ने शिव को छोड़ उनके अन्य सभी जमाइयों को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया था। सती शिव के साथ किया गया यह अपमान सहन नहीं कर पाईं। इसलिए उन्होंने यज्ञ वेदी में छलांग लगाकर खुद को भस्म कर लिया। जब शिव को यह मालूम चला, तब उन्होंने क्रोध और विलाप दोनों अनुभव किए। वे वीरभद्र में बदल गए और यज्ञ शाला में उपस्थित सभी का विनाश कर दिया। दक्ष का वध करने पर उनका क्रोध शांत हुआ।
फिर वे सती के पार्थिव शरीर को लिए उनका विलाप करते हुए संसार भर में घूमने लगे। उनका विलाप केवल तब थमा, जब देवताओं ने सती के पार्थिव देह को कई टुकड़ों में चीर दिया। तपस्वी होने के कारण शिव सांसारिक विश्व को त्यागकर हिमालय के पहाड़ों पर लौट गए और अपने क्रोध तथा पीड़ा से मुक्त हो गए। लेकिन रोचक बात यह है कि प्रेम और प्रतिशोध से भरी इस कहानी में शिव की तीसरी आंख का कोई उल्लेख नहीं है।
सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उन्होंने शिव को देखकर उनका ध्यान आकर्षित करने के बहुत प्रयास किए। लेकिन शिव पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। इससे सती सहित देवगण भी उतावले हो गए, क्योंकि वे चाहते थे कि शिव का विवाह हो। तब देवों ने कामदेव से मदद मांगी। कामदेव ने ईख का बना धनुष उठाया और मधुमक्खियों से बनी प्रत्यंचा खींचकर फूलों से बने इच्छा के बाण शिव की ओर छोड़े। लेकिन इसका शिव पर अलग ही प्रभाव हुआ। उन्होंने पार्वती के प्रति अपनी इच्छा व्यक्त करने के बजाय अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को जलाकर राख कर दिया। और तबसे शिव को विनाशक कहा जाने लगा। यह इसलिए कि कामदेव के वध से शिव ने न केवल इच्छा को नष्ट किया, बल्कि संपूर्ण विश्व को जीवित रखने वाले सिद्धांत को भी नष्ट कर दिया। इच्छा के न होते हुए न कोई निषेचन होगा और न ही कोई प्रजनन होगा। इस प्रकार, जीवन नहीं होगा और विश्व बंजर बन जाएगा।
देवता समझ गए कि शिव वासना से प्रभावित नहीं होंगे। इसलिए उन्होंने पार्वती से मदद मांगी। पार्वती स्वयं शक्ति थी, शिव की स्त्रैण प्रतिरूप, जो उन्हें पूर्ण बनाती थी। यदि शिव कामदेव को नकारते थे तो पार्वती कामदेव को स्वीकारकर उन्हें मनाती थीं। पार्वती ने निश्चय किया कि वे शिव को संन्यासी से गृहस्थ में बदलेंगी ताकि वे विश्व में कामवासना और इच्छा का महत्व समझ सकें।
पार्वती ने स्थिर बैठकर अपनी आंखें बंद कर लीं और इतनी एकाग्रता से शिव के बारे में सोचने लगीं कि शिव उन्हें वरदान देने को विवश हो गए। पार्वती ने शिव से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की और शिव को मानना पड़ा। इस प्रकार शक्ति ने याचना के माध्यम से अपनी इच्छा पूरी करने का निश्चय प्रदर्शित किया और इच्छा के विनाशक शिव को भी उनकी इच्छा पूरी करनी पड़ी।
शिव और शक्ति का विवाह एक महत्वपूर्ण घटना है, क्योंकि उससे इच्छा को नकारने वाले शिव इच्छा को मनाने वाली शक्ति के साथ जुड़ जाते हैं। इस प्रकार उर्वरता और भौतिकवाद को नकारने वाले मठवासी संप्रदाय को स्वीकार करना पड़ता है कि सांसारिक विश्व में उर्वरता और भौतिक वस्तुओं का होना भी महत्वपूर्ण है। उससे संतुलन बना रहता है।
शिव की तीसरी आंख इच्छा को नकारने की प्रतीक है। शिव इच्छा को इसलिए नकारते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि इच्छा के क्या परिणाम हो सकते हैं – वांछित वस्तु या व्यक्ति (सती) के चले जाने पर बहुत पीड़ा और क्रोध का अनुभव होता है। इस प्रकार, इच्छा से न केवल सकारात्मक भावनाएं बल्कि नकारात्मक भावनाएं भी उत्पन्न होती हैं। इसलिए, शिव कैलाश पर्वत पर इच्छा से दूर आनंदित रहते हैं।








