रूमी जाफरी2 घंटे पहले
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फिल्म ‘पीपली लाइव’ के एक दृश्य में रघुबीर यादव।
मशहूर एक्टर रघुबीर यादव जी और मुझमें एक चीज समान है। मैंने बम्बई आने के बाद अपनी शुरुआत अनु भाई यानी अनु कपूर के साथ थिएटर से की और रघुबीर जी ने भी अपने कॅरियर की शुरुआत अनु भाई के पिताजी मदनलाल कपूर साहब की थिएटर कंपनी से की। कुछ दिन पहले अनु भाई की बहन सीमा कपूर, जिनको मैं गुड्डो बाजी बुलाता हूं, की आत्मकथा का विमोचन हुआ तो उसमें रघुबीर भैया ने कुछ किस्से सुनाए। आज मैं वही साझा करता हूं।
रघुबीर जी को एक्टिंग का कोई विशेष शौक नहीं था। एक्टिंग में आना नियति का फैसला था, क्योंकि उसे इस देश और कला जगत को एक अद्भुत कलाकार देना था। वे बताते हैं कि उनके नाना ने गांव में अपने बेटे यानी रघुबीर जी के मामा (लक्ष्मी नारायण यादव) की स्मृति में एक स्कूल बनवाया था- लक्ष्मी नारायण यादव विद्यालय। इसी में रघु जी भी पढ़ते थे। उन्हें साइंस दिलवा दी गई थी, जिसमें उनकी बिलकुल भी रुचि नहीं थी। हायर सेकंडरी का रिजल्ट आने से एक दिन पहले वे परेशान थे, क्योंकि जानते थे कि उनका फेल होना तय है। तो घर पर पिटाई भी होगी और शर्मिंदा भी होना पड़ेगा कि मामा के नाम पर स्कूल है और भांजा फेल हो गया ।
रघुबीर भैया बताते हैं, मैं ये सब एक पेड़ के नीचे बैठकर सोच रहा था कि इतने में मेरे गांव का एक लड़का नरेश कुमार सूरी आ गया। वो प्रोफेशनल भगोड़ा था। हर दो-चार महीने में घर से भाग जाया करता था। वो मेरे पास आया और पूछा कि क्या सोच रहे हो। मैंने कहा कि कल रिजल्ट आने वाला है और मुझे पता है कि मैं फेल हो जाऊंगा। कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं। उसने कहा, घर से भाग चलो। फिर हम दोनों भाग गए। मैंने जिंदगी में पहली बार ट्रेन देखी थी। मैं पहली बार ट्रेन में बैठा। हम लोग ललितपुर पहुंचे। हम वहां घूम रहे थे कि तभी भोपाल थिएटर कंपनी का बोर्ड दिखा। वहां पर कपूर साहब (मदनलाल कपूर) की नाटक कंपनी का नाटक चल रहा था।
नाटक का नाम था ‘नागिन’। हम दोनों अंदर चले गए। हमने देखा कि एक गंजा सा आदमी है, जो हीरो का रोल कर रहा है और उसके साथ एक खूबसूरत लड़की नाच रही है जो नागिन का रोल कर रही थी। मुझे बड़ा अजीब लगा कि इतने भद्दे से गंजे आदमी के साथ एक खूबसूरत लड़की नाच रही है। यही सोचते-सोचते हम बस स्टैंड पर आए और वहीं सो गए। सुबह सूरी अपने फूफा के पास लेकर गया, जिनका कत्थे का कारोबार था। हम उनके यहां दो तीन दिन रहे। मैं एक दिन छत पर सो रहा था और मुझे छत पर सोता ही छोड़कर सूरी फिर भाग गया। मैं वापस भोपाल थिएटर कंपनी में पहुंचा। वहां एक लड़का था किशन। मैंने उससे कहा कि मुझे कंपनी के मालिक से मिलवा दो। तो वो मुझे अंदर लेकर गया। मैंने देखा कि अंदर कपूर साहब हैं, जिन्हें हमने बाद में बाबूजी कहकर ही बुलाया। वो अंदर बैठे थे और उनके आस-पास कुछ और लोग बैठे थे। किशन बाबूजी के पास गया और बोला कि ये आपसे मिलना चाहता है।
मैंने उनसे कहा कि मुझे आप अपनी कंपनी में रख लो। उन्होंने पूछा, क्या कर लेते हो? मैंने कहा, गाना गा लेता हूं। तो वो बोले ठीक है, कुछ गाकर सुनाओ। तो मैंने गजल सुना दी- ‘बदली तेरी नजर तो नजारे बदल गए, ये चांदनी ये चांद सितारे बदल गए। लहरों से पूछ लीजिए साहिल भी है गवाह, कश्ती मेरी डुबोकर धारे बदल गए।’ मेरी गायकी सुनकर बाबूजी हंसने लगे और बोले कि तुम सुरीले तो हो मगर तुम्हारा ‘तलफ़्फ़ुज’ बहुत खराब है। मुझे तलफ़्फ़ुज का मतलब ही नहीं पता था। मैं समझा कि कोई ताल की बात कर रहे हैं। मैंने कहा कि तबले पर गाऊंगा तो ठीक हो जाएगा। तो इस पर बाबूजी और हंसे और बोले कि तलफ़्फ़ुज तबले से ठीक नहीं होता। तलफ़्फ़ुज का मतलब होता है उच्चारण। तुम्हारा उच्चारण खराब है। मैंने कहा, आप भर्ती तो कर लीजिए। मैं तलफ़्फ़ुज और उच्चारण दोनों ठीक कर लूंगा। उन्होंने मुझे ढाई रुपए महीने में अपनी कंपनी में रख लिया। फिर बाबूजी ने साथ बिठाकर मुझे उर्दू बोलना, पढ़ना और लिखना सिखाया, जिससे मैंने तलफ़्फ़ुज ठीक कर लिया। यहां से मेरी एक्टिंग की शुरुआत हुई। उस कंपनी में मुझे बाबूजी ने इतना अच्छा ट्रेन कर दिया कि आज जो भी मैं एक्टिंग में बना और सीखा हूं, उसमें उनका बड़ा हाथ है। इसी बात पर मुझे अल्ताफ हुसैन हाली का ये शेर याद आ रहा है:
फरिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना मगर इस में लगती है मेहनत जियादा ।
मैं रघु जी का एक और टैलेंट बताना चाहता हूं जो मैंने अपनी आंखों से देखा है। मेरी ही फिल्म ‘चेहरे’ में उनका जो किरदार था, वह बांसुरी बजाता था। तो जब मैंने उन्हंे रीडिंग के लिए ऑफिस बुलाया तो वो दो-तीन बांसुरी लेकर आए। उन्होंने बजाकर सुनाई तो मैंने कहा कि ये तो कमाल है। ये आपने कहां से लीं? ये तो बाजार में कहीं दिखती नहीं। वो बोले कि ये तो खुद मैंने अपने हाथों से बनाई है। मुझे यकीन नहीं हुआ तो अगले दिन वो बांस लेकर आए और मेरी आंखों के सामने बांसुरी बनाकर बजाई। जब हमारे रिकॉर्डिस्ट ऑस्कर विनर रसूल पूकुट्टी ने उनकी बांसुरी की आवाज सुनी तो उन्होंने कहा कि बैकग्राउंड म्यूिजक के समय आप बांसुरी न बजवाना, रघुबीर जी वाली बांसुरी का साउंड रखना, क्येंकि यह बहुत अलग और अनूठा है। तो फिल्म में जो बांसुरी बज रही है, वो रघुवीर जी की बजाई हुई बांसुरी का ही स्वर है। आज रघु भैया की याद में उनकी फिल्म पीपली लाइव का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
“सखी सैया तो खूब ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है।”








