रूमी जाफरी4 घंटे पहले
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संजय दत्त अपनी मां नरगिस के साथ
प्रीमियर पर खाली रखी थी नरगिस की सीट
मेरे हिस्से के किस्से में आज बात संजय दत्त और उनके कुछ यादगार पलों की। संजय के साथ मेरी 35 साल की दोस्ती रही है। उनके साथ की बहुत सारी घटनाओं का मैं गवाह रहा हूं। तो मैंने सोचा कि आज मैं संजय दत्त की जिंदगी से जुड़े कुछ हिस्से अपने पाठकों से साझा करता हूं। वैसे तो ज्यादातर किस्से संजय दत्त पर बनी फिल्म ‘संजू’ में आपमें से कई लोग देख ही चुके होंगे, मगर आज मैं आपको कुछ और नई बातें बताने जा रहा हूं। कल 3 मई को संजय दत्त की मां नरगिस जी की बरसी थी और 6 मई को संजय दत्त की पहली फिल्म ‘रॉकी’ रिलीज हुई थी। वैसे तो हर बच्चा अपनी मां और मां अपने बच्चे से बेपनाह प्यार करती है, मगर नरगिस जी का प्यार कुछ अलग ही था, बेमिसाल था। वो प्यार से संजय को बाबा बुलाती थीं।
संजू ने मुझे बताया था कि रात को दत्त साहब बंगले के लॉन में बैठकर बातें करते थे और सिगरेट पीते थे। पर सिगरेट बुझाते नहीं थे। बची हुई जो सिगरेट हाथ में रह जाती थी, उसे पीछे की तरफ जोर से फेंक दिया करते थे। वो जाकर कभी घास में, कभी पौधों में तो तभी कुर्सी-टेबल के नीचे गिर जाती थी। जैसा कि सब जानते हैं कि संजू बाबा बचपन से ही बहुत नटखट रहे। और कहते हैं न कि हर बच्चा अपने पिता को कॉपी करने की कोशिश करता है। तो संजू जो उस समय बहुत छोटे थे, कभी-कभी दत्त साहब की फेंकी हुई सिगरेट चोरी से उठाकर उससे एक-दो कश मार लिया करते थे। एक दिन दत्त साहब बैठकर यश जोहर जी से बातें कर रहे थे। बात करते-करते उन्होंने अपनी सिगरेट उठाकर पीछे फेंक दी। संजू आए और छुपकर पीने लगे। यश जोहर साहब ने देख लिया। उन्होंने दत्त साहब को दिखाया कि वो देखो, संजू बाबा क्या कर रहे हैं। दत्त साहब ने संजू को सिगरेट के साथ पकड़ लिया। इसके बाद उन्हें बोर्डिंग भेज दिया गया।
संजू ने बताया कि जब वे लोग मुझे लेकर बोर्डिंग पहुंचे तो मुझे लगा कि हिल स्टेशन है, खूबसूरत जगह है और मैं घूमने आया हूं। तब मुझे नहीं पता था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। मुझे मेरी मम्मी छोड़कर गईं और दरवाजा बंद हो गया। रात हुई और मुझे घर की और मां की याद आई। मैं रोने लगा और बोलने लगा कि मुझे मां के पास जाना है। मैं भागकर उस दरवाजे के पास गया और अपने छोटे-छोटे हाथों से दरवाजा पीटने लगा, क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा था कि दरवाजे के उस पार मां खड़ी हैं, क्योंकि मां की आखिरी झलक मैंने दरवाजे के उस पार ही देखी थी। मुझे ऐसा लग रहा था कि दरवाजा खुलेगा और मां वहीं सामने खड़ी मिलेंगी। ये सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। मैं रातों को उठकर दरवाजे के पास भागता और मां-मां चिल्लाता। कुछ समय लगा मुझे ये बात समझने में कि मां दरवाजे के उस पार नहीं हैं। इसी बात पर मुझे मुनव्वर राना का एक शेर याद आ रहा है-
चलती फिरती हुईं आंखों से अजां देखी है
मैंने जन्नत तो नहीं देखी है मां देखी है
खैर, जब संजू जवान हुए तो उस समय तक नरगिस जी को कैंसर हो गया था। उन्हें इलाज के लिए अमेरिका ले जाया गया और यहां दत्त साहब ने संजू को बतौर हीरो लॉन्च कर दिया। फिल्म पूरी हो गई और नरगिस जी को वापस भारत लाकर ब्रीच कैंडी में एडमिट करवाया गया। हर मां चाहती हैं कि उसका बेटा उसकी आंखों के सामने ही लॉन्च हो जाए, स्थापित हो जाए। संजू की पहली फिल्म ‘रॉकी’ कम्पलीट हो चुकी थी और नरगिस जी की बहुत ख्वाहिश थी कि संजू की फिल्म देखें, संजू को स्टार बनते हुए देखें। उन्होंने जिद पकड़ ली थी कि मैं प्रीमियर में आकर देखूंगी। तो दत्त साहब ने सब इंतजाम कर लिया था। सबसे आगे की सीट उनके लिए रिजर्व कर दी गई। हॉस्पिटल में व्हीलचेयर, एम्बुलेंस आदि सब व्यवस्थाएं तैयार कर ली गईं कि कैसे लोग नरगिस जी को वहां से लेकर निकलेंगे और फिर दत्त साहब के साथ फ्रंट सीट पर बैठाएंगे। लेकिन ऊपरवाले ने एक मां के साथ भी और एक बेटे के साथ भी इंसाफ नहीं किया और 3 तारीख को नरगिस जी चल बसीं। न वो संजय दत्त की पहली फिल्म रॉकी देख पाईं और न ही संजय दत्त को स्टार बनता देख पाईं। मगर दत्त साहब ने जो सीट नरगिस जी के लिए रिजर्व रखी थी, वो सीट खाली रखी और पूरा प्रीमियर अटेंड किया। उन्होंने कहा था कि मुझे ऐसा एहसास हो रहा था कि वो सीट खाली नहीं है, उस पर संजू की मां बैठी फिल्म देख रही हैं और संजू को आशीर्वाद दे रही हैं। तो आज संजय दत्त के लिए उनकी पहली फिल्म ‘रॉकी’ का ये गीत सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
दोस्तों को सलाम, दुश्मनों को सलाम, रॉकी मेरा नाम…








