रूमी जाफरी4 घंटे पहले
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एक समारोह में जॉनी वॉकर के साथ नूर जहां।
मशहूर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर मेहबूब खान की ‘अनमोल घड़ी’ एक बड़ी ‘अनमोल’ मूवी रही है। साल 1946 में रिलीज हुई यह फिल्म सुपर-डुपर हिट हुई थी। इसी फिल्म में नूर जहां ने भी काम किया था। तो आज मेरे हिस्से के किस्से में नूर जहां की बात करते हैं। लेकिन उन नूर जहां की बात नहीं, जो बंटवारे के बाद पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान चली गई थीं। दरअसल, यहां मैं बात कर रहा हूं उन नूर जहां की जो पुरानी हीरोइन शकीला की छोटी बहन थीं और बाद में जिन्होंने जॉनी वॉकर से शादी रचाई थी।
‘अनमोल घड़ी’ मूवी जब कम्प्लीट हो गई तो उसके बाद मेहबूब खान के सामने टाइटल बनाने के लिए पूरी लिस्ट रखी गई। जब उन्होंेने उस लिस्ट पर नजरें दौड़ाईं तो उन्हें एहसास हुआ कि इस फिल्म में एक नहीं, बल्कि दो-दो नूर जहां हैं। एक जवान नूर जहां और एक बच्ची नूर जहां। इस मूवी में बड़ा इत्तेफाक देखिए कि नूर जहां के बचपन का रोल भी छोटी नूर जहां ही कर रही थीं। तो अब समस्या यह थी कि क्या किया जाए।
मेहबूब खान ने तय किया कि जवान नूर जहां का नाम तो बदल नहीं सकते, क्योंकि इस समय तक तो वे एक स्थापित हीरोइन हो चुकी थी। उनका बड़ा नाम हो चुका था। तो उन्होंने सोचा कि फिर बच्ची नूर जहां का नाम ही बदल देते हैं। इस बालिका नूर जहां का नाम बदलकर ‘नूर महल’ कर दिया गया। इसीलिए उनका नाम अनमोल घड़ी मूवी में नूर महल ही आता है। उन्होंने बाद में भी बाल कलाकार की हैसियत से कई फिल्में कीं। उन सभी फिल्मों मंे उनका नाम ‘बेबी नूर’ रखा गया।
नूर के जवान होने तक उनकी बड़ी बहन यानी शकीला स्टार बन चुकी थीं। उनकी एक फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ की शूटिंग चल रही थी, तो एक दिन शूटिंग पर छोटी बहन नूर यानी कि नूर जहां भी उनके साथ चली गईं। वहीं उनकी मुलाकात जॉनी वॉकर साहब से हो गई। फिर इत्तेफाक हुआ या क्या हुआ ये तो नहीं मालूम, मगर गुरुदत्त जो उस वक्त ‘आर-पार’ बना रहे थे, उन्होंने उसमें जॉनी वॉकर के सामने नूर को कास्ट कर लिया। उसी फिल्म की शूटिंग के दौरान जॉनी वॉकर और नूर को एक-दूसरे को समझने का मौका मिला। दोनों करीब आए, दोनों में प्यार हुआ और फिर दोनों ने शादी कर ली। जॉनी वॉकर की मोहब्बत में नूर ने एक ही फिल्म की और फिर उसके बाद अपने एक्टिंग करियर को अलविदा कह दिया। इसी बात पर मुझे मशहूर शायर मिर्जा गालिब का एक शेर याद आ रहा है:
इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘गालिब’ कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
इस तरह नूर जहां ने एक ही फिल्म ‘आर-पार’ की, जो 1954 में रिलीज हुई थी। यह उनकी अपनी पहली भी फिल्म थी और आखिरी भी फिल्म रही। इसी में उन्होंने अपनी बड़ी बहन और अपने शोहर के साथ काम किया।
एक और दिलचस्प बात यह है कि छोटी बहन की वजह से बड़ी बहन को ब्रेक मिला। दरअसल, हुआ यूं था कि नूर जब बाल कलाकार थीं, तो उनके साथ शूटिंग पर शकीला चली गईं, जहां पर उनको डायरेक्टर और प्रोड्यूसर ए. आर. कारदाद ने देख लिया और फिर उन्हें अपनी फिल्म ‘दास्तान’ में हीरोइन ले लिया।
आम तौर पर शकीला के बारे में यह धारणा बनी हुई है कि वो ईरान में रहने वाली अफगानिस्तान की प्रिंसेस थीं। कोई कहता कि वे रॉयल फॅमिली से थीं। किसी का यह कहता था कि ये अरब की रॉयल फॅमिली से हैं। ये तमाम धारणाएं और तमाम अटकलें सरासर गलत हैं। मैं उनके परिवार को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। उनके बेटे नासिर से भी ये मैंने कन्फर्म किया है। नूर जी और शकीला जी, दोनों बॉम्बे की थीं और दोनों का जन्म भी यहीं हुआ था। दोनों यहीं पलकर बड़ी हुईं। दोनों की पूरी शिक्षा-दीक्षा भी यहीं बॉम्बे में ही हुई।
दरअसल, शकीला की कुछ हिट फिल्में जैसे सिंदबाद द सेलर, शहंशाह, राज महल, लैला और खास तौर पर अली बाबा और चालीस चोर, हातिम ताई, अल हिलाल, जब ये सुपर-डुपर हिट हुईं, तो इनके बारे में ये कहा जाने लगा कि इनका चेहरा तो अरबी चेहरा है या इनका चेहरा तो ईरानी चेहरा है। ये ईरान की रॉयल फैमिली से हैं, ये अरब की रॉयल फॅमिली से हैं, वगैरह-वगैरह। क्योंकि लोगो में ये धारणा बन गई थी कि इनका चेहरा तो वहां का है। और फिर 1960-61 में वो हिंदुस्तान छोड़कर लंदन चली गईं, तो लोग ये बात करने लगे कि वो अरब की प्रिंसेस थीं और वहीं लौटकर चली गईं। जबकि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं है। शकीला जी और नूर जी दोनों खालिस हिंदुस्तानी थीं और मुंबई की थीं।
तो आज नूर जहां और जॉनी वॉकर की याद में उन दोनों पर फिल्माया गया उनकी ही फिल्म ‘आर पार’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
अरे न न न तौबा तौबा मैं न प्यार करुंगी कभी किसी से तौबा तौबा…








