गौरव पाठक3 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

विक्रेताओं द्वारा बिलों और कैश मेमो पर ‘एक बार बेचा गया सामान वापस नहीं लिया जाएगा या बदला नहीं जाएगा’, जैसे लिखे वाक्य खुदरा क्षेत्र में सामान्य हैं। आज हम इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि यह प्रथा कानूनी रूप से कितनी वैध है और ऐसी शर्तों का सामना होने पर उपभोक्ताओं के पास उपभोक्ता संरक्षण के लिए कौन-से प्रावधान उपलब्ध हैं।
क्या है कानूनी ढांचा? उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(9) उपभोक्ताओं को कई महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करती है, जिनमें ‘वस्तुओं, उत्पादों या सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में जानकारी पाने का अधिकार’ और अनुचित व्यापार प्रथाओं से संरक्षण शामिल है। इस तरह की ‘नो रिटर्न’ जैसी मनमानी नीतियों को चुनौती देने के लिए भी यही धारा आधार बनती है।
कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के खिलाफ उपभोक्ता अदालतों ने अनेक मामलों मंे निर्णय दिए हैं कि व्यापारी ऐसी शर्त नहीं लगा सकते कि किसी भी परिस्थिति में सामान वापस नहीं लिया जाएगा और पैसे नहीं लौटाए जाएंगे। ऐसी शर्तें इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 और सेल आफ गुड एक्ट, 1930 के खिलाफ हैं। कोई भी व्यापारी यदि दोषपूर्ण सामान बेचता है तो वह उसे वापस लेने, उसकी कीमत लौटाने या उसे बदलने के लिए बाध्य है, और यह विकल्प उपभोक्ता के पास होना चाहिए। केरल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने यह निर्णय दिया है कि कैश मेमो पर ‘सामान एक बार बेचा गया तो वापस नहीं लिया जाएगा’ जैसी घोषणाएं न केवल आपत्तिजनक हैं, बल्कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत अनुचित व्यापार प्रथा के तहत भी आती हैं। गुजरात सरकार का 2014 का आदेश भी कहता है कि कैश मेमो और बिलों में ऐसी कोई शर्त नहीं होनी चाहिए कि सामान एक बार बेचने के बाद वापस नहीं लिया जाएगा या बदला नहीं जाएगा।
प्रमुख न्यायिक उदाहरण ऑटो स्किल्स बनाम युवा लेखक अभियान (1991) में महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक फर्नीचर विक्रेता की अपील को खारिज कर दिया, जिसने दोषपूर्ण फर्नीचर के लिए पैसे लौटाने से इनकार कर दिया था। विक्रेता ने दलील दी कि ‘सोफा सेट के लिए दो वर्षों की कोई गारंटी नहीं दी गई थी, इसलिए सामान वापस नहीं लिया जा सकता।’ आयोग ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा: ‘इस तर्क में कोई दम नहीं है, क्योंकि सोफा सेट बिक्री के समय ही दोषपूर्ण था। लकड़ी का कोई भी फर्नीचर मात्र पांच महीनों में खराब नहीं हो सकता।’
गुप्ता कम्युनिकेशन बनाम पुरण लाल (2017) मामले में मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक मोबाइल विक्रेता के खिलाफ निर्णय दिया, जिसने दोषपूर्ण डिवाइस की मरम्मत या उसे बदलने से इनकार कर दिया था। आयोग ने पहले के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ‘दोषपूर्ण मोबाइल बेचने वाला विक्रेता उस मोबाइल की मरम्मत करने या उसे बदलने या रिफंड करने के लिए बाध्य है।’ इसी तरह एर्नाकुलम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 2024 में दिए गए एक निर्णय में एक रिटेलर को अपनी रसीदों, इनवॉइस और बिलों से ‘एक बार बेचा गया सामान वापस नहीं लिया जाएगा या बदला नहीं जाएगा’ जैसी अवैध शर्त को हटाने के निर्देश दिए।
रिफंड बनाम एक्सचेंज पॉलिसी दोषपूर्ण सामान और उपभोक्ता की पसंद से की गई वापसी में महत्वपूर्ण अंतर होता है। जब सामान दोषपूर्ण होता है तो व्यापारी किसी भी प्रकार की कटौती जैसे मेकिंग चार्ज, सोल्डरिंग सामग्री आदि के खर्च नहीं ले सकते। पूरी राशि लौटानी होती है। हालांकि, यदि ग्राहक अपनी इच्छा से सामान बदलना चाहता है तो व्यापारी उचित शर्तें तय कर सकते हैं, लेकिन वे शर्तें एकतरफा या भ्रामक नहीं होनी चाहिए।








