रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  सबसे पहले 5 साल की उम्र में आए थे बड़े पर्दे पर, फिल्म फेयर अवार्ड विजेता एकमात्र चाइल्ड आर्टिस्ट
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: सबसे पहले 5 साल की उम्र में आए थे बड़े पर्दे पर, फिल्म फेयर अवार्ड विजेता एकमात्र चाइल्ड आर्टिस्ट

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रूमी जाफरी6 घंटे पहले

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एक फिल्म के दृश्य में प्राण की गोद में बैठे हुए मास्टर राजू। - Dainik Bhaskar

एक फिल्म के दृश्य में प्राण की गोद में बैठे हुए मास्टर राजू।

मेरे हिस्से के किस्से में आज बात फहीम अजानी की, जिन्हें सभी मास्टर राजू के नाम से जानते हैं। आज भी मुझे याद है कि जब मैं छोटा था, तब हमारे देश में जहां भी कोई बच्चा होता था तो दो ही दुआएं मांगी जाती थीं। अगर गोद का बच्चा हो तो मर्फी बेबी की तरह हो और अगर 5-6 साल का हो तो मास्टर राजू की तरह हो।

जब मैंने राजू से फिल्म इंडस्ट्री में उनकी शुरुआत के बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि हम लोग साउथ मुंबई के रहने वाले हैं। हमारे मोहल्ले में एक जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर रहते थे, जो मेरे पिता के दोस्त थे। तो जब भी शूटिंग में बच्चों की जरूरत होती, तो मुझे भी ले जाते। वहां एक्टिंग नहीं करनी होती थी, सिर्फ बैठना, खड़े होना एक प्रजेंस होती थी। तो मैं भी जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर कई फिल्मों जैसे उपहार, अन्नदाता, बावर्ची वगैरह में काम कर चुका था। फिर गुलजार साहब फिल्म शुरू कर रहे थे ‘किताब’। उनको फिल्म के लिए एक बच्चा चाहिए था। उस समय कास्टिंग डायरेक्टर नाम की चीज तो होती नहीं थी। तो जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर बच्चे ला-लाकर दिखा रहे थे। वो मोहल्ले के सब बच्चों को लेकर गए, लेकिन उनमें से किसी का भी चयन नहीं हुअा। तो फिर वे बोले कि चलो मैं राजू को भी ले जाता हूं। मुझे वो मेरी मम्मी-पापा के साथ लेकर गए। तब मैं 5 या 6 साल का था। वहां मैंने देखा कि बहुत सारे बच्चे आए हुए थे। गुलजार साहब सभी बच्चों से बात कर रहे थे। कोई बच्चा उन्हें हीरो के बड़े-बड़े डायलॉग सुना रहा था तो कोई उनको एक्टिंग करके या डांस करके दिखा रहा था, कोई पोयम सुना रहा था।

राजू ने बताया, जब तक मेरा नंबर आया, तब तक मैं इतना थक चुका था कि रोने लगा और बोलने लगा कि घर चलो, घर चलो। सबका मूड ऑफ हो गया। गुलजार साहब भी कुछ नहीं बोले और फिर मैं घर आ गया। बाद में गुलजार साहब ने जूनियर आर्टिस्ट के सप्लायर को फोन करके कहा कि उस बच्चे को वापस लेकर आओ। मैं वापस गया तो गुलजार साहब ने मुझे प्यार से बैठाया, खिलाया और कहा कि मुझे यही बच्चा चाहिए। इस पर सब लोग हैरान रह गए क्योंकि मैंने न कोई डायलॉग बोलकर सुनाया था, न पोएट्री सुनाई थी, न डांस करके दिखाया था। सबने गुलजार साहब से पूछा कि आपने इसे कैसे सिलेक्ट कर लिया तो वे बोले कि मुझे सचमुच का बच्चा चाहिए। अब तक मैं जितने भी बच्चों से मिल रहा हूं, ऐसा लगता नहीं कि वो बच्चे हैं। वो सब बड़े-बड़े हीरो के डायलॉग सुना रहे हैं, डांस कर रहे हैं। ऐसा लगता नहीं कि वो चाइल्ड आर्टिस्ट हैं, बल्कि ऐसा लगता है जैसे कोई वयस्क आदमी है। मुझे वो बच्चा चाहिए, जो दिखने में, बोलने में बच्चा ही दिखे और इस बच्चे में वो बात है। मैंने उनसे कहा कि मुझे तो एक्टिंग आती ही नहीं तो वे बोले, कोई बात नहीं। वह मैं ट्रेन कर दूंगा। तो उन्होंने मुझे एक्टिंग सिखाई नहीं, मुझसे दोस्ती की, मुझे सेट पर ले गए, दूसरे एक्टर्स को एक्टिंग करते हुए दिखाया। हर एक चीज में मुझे अपने साथ रखते थे। मुझे ऐसा माहौल दे दिया कि एहसास ही नहीं हुआ कि मैं एक्टिंग सीख रहा हूं और मैं सीख गया। तो गुलजार साहब ऐसे गुरु थे, जिनके साये में रहकर मुझे एक्टिंग सीखने की जरूरत ही नहीं पड़ी। उनके साथ रहकर मुझमे अपने आप एक्टिंग का फन आ गया।

इसी बात पर मुझे मुनव्वर राना का एक शेर याद आ रहा है: खुद से चलकर नहीं ये तर्ज-ए-सुखन आया है पांव दाबे हैं बुजुर्गों के तो फन आया है

मेरी खुद की लिखी तीन फिल्मों ‘पायल’, ‘रंग’ और ‘साजन चले ससुराल’ में मास्टर राजू ने एक्टिंग की है। मुझे याद है ‘किताब’ फिल्म का एक सीन बड़ा मशहूर हुआ था। इसमें केष्टो मुखर्जी बच्चों को एबीसीडी पढ़ा रहे हैं। वो बच्चों को बता रहे हैं कि ए फॉर एप्पल, बी फॉर बॉल… राजू बच्चा है और उसे बाथरूम जाना है। केष्टो मुखर्जी बोलते हैं- ‘के’ फॉर तो राजू बोलता है, ‘करना है’ और पूरे थिएटर में लोग हंसने लगते थे।

मास्टर राजू ने एक ऐसा इतिहास लिखा है, जो मुझे लगता नहीं कि कोई तोड़ पाएगा। वो अकेला ऐसा एक्टर है, जिसे बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का फिल्मफेयर अवार्ड ‘किताब’ फिल्म के लिए मिला है। उस साल बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट की कैटेगरी फिल्मफेयर में थी। लेकिन न उसके पहले हुई और न उसके बाद हुई। एक ही बार चाइल्ड आर्टिस्ट की कैटेगरी फिल्मफेयर में आई और वो अवार्ड मिला मास्टर राजू को। राजू को बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर ‘चितचोर’ के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला। राजू अकेला ऐसा एक्टर है, जिसने टीवी सीरियल के बहुत सारे एपिसोड्स किए हैं। तीन हजार एपिसोड्स में तो उसने नारद मुनि की एक्टिंग की है।

मजे की बात यह है कि फहीम ने मास्टर राजू के नाम से एक्टिंग शुरू की थी। दो साल बाद बाद वो साठ साल का हो जाएगा। मगर उसके नाम के आगे से ‘मास्टर’ आज भी नहीं हटा और न कभी हटेगा। आज मास्टर राजू को याद करते हुए ‘किताब’ फिल्म ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।

अ आ इ ई, अ आ इ ई मास्टरजी की आ गई चिट्‌ठी…



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