रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  अनुपम खेर: लकवे में भी पूरा किया था शूट
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: अनुपम खेर: लकवे में भी पूरा किया था शूट

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रूमी जाफरी5 घंटे पहले

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परसों यानी 7 मार्च को मेरे अजीज दोस्त और हिंदुस्तान के जबरदस्त कलाकार व महान अभिनेता अनुपम खेर का जन्मदिन था। तो मैंने सोचा कि इस रविवार को मेरे हिस्से के किस्से में बात अनुपम खेर साहब की ही करते हैं।

बात 1982 या 83 की है। एशियाड के कारण भोपाल में भी टीवी आ चुका था। हालांकि उस वक्त सिर्फ एक ही चैनल था दूरदर्शन। हमें टॉकीज में जाकर फिल्म देखने की सख्त मनाही थी और फिर जब घर में ही टीवी आ गया तो उसे देखने का जो नशा, जो उत्साह था, उसकी बात ही कुछ और थी। हम हर प्रोग्राम देखते थे, यहां तक कि कृषि दर्शन भी देख लेते थे। एक दिन मैंने टीवी चालू किया तो दूरदर्शन पर एक फिल्म आ रही थी, जिसका नाम था ‘वापसी’। यह एक मरीज की कहानी थी। यह शायद एक घंटे की फिल्म थी, मगर उस फिल्म की जो कहानी थी और उसमें जो एक्टर था, उसकी परफॉर्मेंस बहुत शानदार थी। जिस एक्टर ने मरीज का रोल किया था, वो इतना जबरदस्त अभिनय था कि मेरे जहन में कई दिनों तक उस परफॉर्मेंस का नशा छाया रहा। चूंकि मैं फिल्म के टाइटल पर ध्यान नहीं दे पाया था, इसलिए उस वक्त उस एक्टर का नाम भी पता नहीं चल पाया। मगर उस एक्टर का मैं मुरीद हो गया था।

कुछ वक्त गुजरा और एक दिन की बात है। मैं बाल कटवाने के लिए एक सलून में गया। वहीं बैठकर मैं अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। वहीं पर फिल्म की एक मैगजीन रखी हुई थी। मैंने मैगजीन खोली तो देखा कि उसमें उसी एक्टर का फोटो था, अपनी नई कार और महेश भट्ट के साथ। तब जाकर मुझे पता चला कि उस एक्टर का नाम अनुपम खेर है। उसमें लिखा हुआ था कि वो अपनी नई कार खरीदकर महेश भट्ट को दिखाने आए थे। उसके बाद मैं मुंबई आ गया और अन्नू भाई (अन्नू कपूर) के साथ थिएटर करना शुरू कर दिया। जुहू के एक स्कूल में हम लोग लैला मजनू प्ले की रिहर्सल कर रहे थे और अचानक मेरी नजर बाहर पड़ी तो देखा कि वहां पर खेर साहब खड़े हैं। उस प्ले में उनके कई दोस्त काम कर रहे थे। वे उन लोगों से मिलने आए थे। इस तरह मैंने पहली बार खेर साहब को देखा। मैं चलकर खिड़की के पास आया और गौर से उनका चेहरा देखता रहा। बगैर बालों का इतना खूबसूरत चेहरा मैंने इससे पहले किसी आदमी का नहीं देखा था। उनके चेहरे पर जो चमक थी, वो उसके बाद मैंने सिर्फ दिलीप साहब के चेहरे पर देखी थी। उनमें वही नूर था। इसी बात पर मुझे इफ्तिखार नसीम साहब का एक शेर याद आ रहा है:

उसके चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमां पे चांद पूरा था मगर आधा लगा

खैर, कुछ साल बाद मेरे लिखने का काम शुरू हो गया और मेरे कॅरियर की शुरुआती तीन फिल्मों में खेर साहब एक्टिंग कर रहे थे। ये फिल्में थीं – श्रीमान आशिक, वक्त हमारा है और पहला पहला प्यार। मैं कभी नहीं भूल सकता कि खेर साहब ने एक इंटरव्यू में मेरे बारे में कह दिया था, ‘जैसे खाने का स्वाद मुंह को लग जाता है, वैसे ही डायलॉग का मजा भी मुंह को लग जाता है। मुझे रूमी जाफरी के डायलॉग्स का ऐसा मजा लग गया है कि जब मैं रूमी की शूटिंग से दूसरी शूटिंग में जाता हूं और दूसरों के लिखे डायलॉग्स को बोलता हूं तो मेरे मुंह को, मेरी जबान को मजा नहीं आता।’ इतने बड़े एक्टर का ऐसा कहना तो उनका बड़प्पन ही था, मगर इससे मेरा हौसला बड़ा। जब ‘पहला पहला प्यार’ की शूटिंग चल रही थी, तब उनके सेक्रेटरी का फोन आया कि जल्दी से आकर मिलो तो हम लोग जाकर मिले। सेक्रेटरी ने बताया कि खेर साहब के आधे चेहरे को लकवा मार गया है। यह खबर सुनकर हम सब भौंचक्के रह गए। मैं खेर साहब से भी मिला और उस वक्त हमें यह बात मीडिया से छुपानी थी। सबको टेंशन था कि काम कैसे खत्म होगा और मुझे यह टेंशन थी कि खेर साहब ठीक कैसे होंगे। मैं उनकी मन:स्थिति समझ सकता था। किसी भी इंसान के चेहरे पर ऐसा हो जाए तो उस पर क्या गुजरती होगी। और फिर एक्टर का सब कुछ तो उसके चेहरे में ही है। उसके चेहरे को ही अगर लकवा मार जाए तो वो क्या करे। खेर साहब के दिल पर क्या गुजर रही होगी, यह मैं महसूस कर सकता था। मैंने उनसे कहा कि खैर साहब, आपका चेहरा इतना नूरानी चेहरा है न, इतना ग्लो करता है कि इसको नजर लग गई।

इधर, हमारे प्रोड्यूसर शाद साहब और डायरेक्टर मनमोहन सिंह बहुत परेशान थे। फिल्म का क्लाइमेक्स शूट करना था और सारी स्टारकास्ट जैसे ऋषि कपूर, तबु, कादर खान, अमरीश पुरी जी, टीकू तलसानिया जी, सबकी डेट थीं। लेकिन खेर साहब का चेहरा आधा पैरालाइज था तो काम कैसे कर सकते थे। तब मैंने दिमाग लगाकर सीन को चेंज किया और इस तरह लिखा कि उनको दाढ़ी-मूंछ लगाकर व पंडित बनाकर सीधे क्लाइमेक्स में ले आए। वो सेट पर आ गए, शूटिंग भी हो गई और किसी को पता भी नहीं चला कि खेर साहब को ऐसी बीमारी भी हुई थी।

सलाम है खेर साहब को। वो अपनी हिम्मत, अपने आत्मबल से इतनी घातक बीमारी से लड़कर बाहर आ गए और अपने आप को इंडस्ट्री में फिर से स्थापित किया, अपना काम जारी रखा। उन्होंने अपने नाटक का नाम बिलकुल सही रखा, ‘कुछ भी हो सकता है’। खेर साहब, दुआ है कि ऊपरवाला आपको 100 साल से भी लम्बी उम्र दें। इसी बात पर खेर साहब के लिए श्रीमान आशिक का एक गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।

अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं…



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