रूमी जाफरी5 घंटे पहले
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गाने ‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे’ के दृश्य में शम्मी कपूर।
शम्मी कपूर साहब के बहुत सारे किस्से हैं। मैंने उनके साथ काफी समय बिताया है। कभी-कभी उनकी यादों के कुछ किस्से मैं आप लोगों से इस कॉलम में साझा करता रहूंगा।
एक बार मैंने उनसे पूछा, ‘शम्मी अंकल, आप तो पृथ्वीराज कपूर के घर में पैदा हुए। राज कपूर के छोटे भाई थे। आपका फिल्मी सफर तो बहुत आसान रहा होगा।’ उन्होंने मुस्कराकर कहा, ‘आसान भी था और यही चीज मुश्किल भी साबित हो रही थी।’ उन्होंने बताया कि जब उनकी पहली फिल्म ‘रेल का डिब्बा’ रिलीज हुई तो सभी आलोचकों ने लिखा, ‘शम्मी कपूर, राज कपूर को कॉपी कर रहे हैं।’ चारों तरफ यही सुनाई देता, ‘यह राज कपूर का भाई है, पृथ्वीराज कपूर का बेटा है।’
इसके बाद उनकी शादी हो गई उस दौर की सुपरस्टार गीता बाली से। तब एक और नाम जुड़ गया: ‘ये गीता बाली का पति है।’ फिल्में भी उस समय बहुत हिट नहीं हो रही थीं। लैला मजनूं, गुल-ए-बकावली, मिर्जा साहिब, शमा परवाना जैसी फिल्में चल तो रही थीं, लेकिन उनसे उनकी बड़ी पहचान या सुपरस्टार का दर्जा नहीं बन पा रहा था। फिर उनकी जिंदगी में एक मोड़ आया, जब उनकी दोस्ती निर्देशक नासिर हुसैन से हो गई। एक दिन उन्होंने अपनी उलझन उनसे साझा की। नासिर साहब ने कहा, ‘देखो शम्मी, तुम यह नहीं बदल सकते कि तुम पृथ्वीराज कपूर के बेटे हो, यह भी नहीं बदल सकते कि तुम राज कपूर के भाई हो। न ही यह कि तुम्हारी आंखें हरी हैं और रंग गोरा है। लेकिन तुम अपना लुक जरूर बदल सकते हो। मूंछें हटा दो, बाल काट लो, अपनी कोई अलग स्टाइल बना लो। ऐसी स्टाइल, जो न राज कपूर की हो और न पृथ्वीराज कपूर की।’
यह बात शम्मी कपूर के जहन में बैठ गई। नासिर साहब ने खुद उनकी मदद की। उनके लुक और स्टाइल में बदलाव किया। इसके बाद नासिर साहब के साथ उनकी फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ आई, जो सुपरहिट रही। फिर नासिर के साथ उन्होंने की ‘दिल दे के देखो’, जिसमें आशा पारेख को लॉन्च किया गया। यहीं से शम्मी कपूर की असली पहचान बनी। नासिर साहब ने कहा था, ‘हीरो को मंच से उतारकर सड़क पर लाओ। उसे दौड़ते हुए, पहाड़ों पर चिल्लाकर गाते हुए दिखाओ। हीरो अब जमाने के करीब होना चाहिए।’ यह बदलाव शम्मी पर खूब जंचा। उनकी अदाएं, गानों में मस्ती, संवादों का अंदाज, सबकुछ राज कपूर से एकदम अलग था और दर्शकों को भी खूब पसंद आया। उस दौर के नौजवान लड़के उनके फैन बन गए। उनकी उछल-कूद को कोई बदतमीजी नहीं मानता था, बल्कि आधुनिकता समझता था। और लड़कियां भी उनकी तरह मस्ती करने वाले लड़कों को छिछोरा आशिक नहीं, बल्कि आकर्षक आशिक समझने लगीं।
यहीं मुझे तहजीब हाफी का एक शेर याद आता है:
अपनी मस्ती में बहता दरिया हूं
मैं किनारा भी हूं, भंवर भी हूं
शम्मी कपूर ने एक और किस्सा सुनाया था, जो उस उम्र का था, जब इंसान बचपन और जवानी के बीच खड़ा होता है। एक दिन वे ‘बरसात’ फिल्म की शूटिंग पर पहुंचे और नरगिस जी से मिलने उनके कमरे में चले गए। देखा कि नरगिस जी उदास बैठी हैं। उन्होंने पूछा, ‘क्या हुआ?’ नरगिस जी की आंखें नम हो गईं। बोलीं, ‘शम्मी, फिल्म आवारा शुरू होने वाली है। मैं चाहती हूं कि इसमें राज साहब के साथ काम करूं। तू दुआ कर कि यही हो जाए।’ शम्मी बोले, ‘तो मैं जाकर भाईसाहब से बात कर लेता हूं।’ नरगिस जी बोलीं, ‘नहीं, प्रॉब्लम राज साहब की नहीं है। वे तो यही चाहते हैं कि मैं उनके साथ काम करूं। दिक्कत मेरे घरवालों की है। वे नहीं चाहते कि मैं राज कपूर के साथ फिल्म करूं।’ शम्मी जी ने पूछा कि आपके घरवाले ये क्यों नहीं चाहते, तो वे बोलीं, ‘क्योंकि मेहबूब साहब ये नहीं चाहते कि मैं आवारा में काम करूं। वे मुझे बेटी की तरह मानते हैं और मेरे घर वाले भी उनका बहुत सम्मान करते हैं। उन्होंने साफ कह दिया कि मैं ‘आवारा’ में काम न करूं।’ नरगिस जी ने कहा, ‘दुआ कर कि यह मसला सुलझ जाए और मैं हीरोइन बन जाऊं।’ शम्मी ने मजाक में पूछा, ‘मुझे क्या मिलेगा?’ नरगिस जी हंसते हुए बोलीं, ‘अगर मैं आवारा की हीरोइन बनी तो तुझे एक प्यारा-सा किस दूंगी।’
वक्त गुजरा। तीन-चार साल बाद जब आवारा की शूटिंग चल रही थी, शम्मी कपूर वहां पहुंचे। राज साहब और नरगिस जी शूटिंग कर रहे थे। शम्मी ने नरगिस जी को याद दिलाया, ‘आपको याद है आपने मुझसे क्या वादा किया था? आपने कहा था कि अगर आप ‘आवारा’ की हीरोइन बनीं तो मुझे किस देंगी।’ इतना सुनते ही नरगिस जी हंसते हुए भागीं और कैमरे के पीछे छिप गईं। फिर राज साहब के पीछे जा खड़ी हुईं। सभी लोग हंसने लगे। शम्मी ने कहा, ‘इन्होंने मुझसे वादा किया था।’ राज कपूर बोले, ‘बात तो सही है।’ नरगिस जी बोलीं, ‘तब की बात अलग थी। तब यह बच्चा था।’
शम्मी जी ने सोचा, हां, ये सही कह रही हैं। तब मैं 16 साल का था, अब 20 का हो गया हूं। फिर बोले, ‘कुछ तो देना पड़ेगा।’ नरगिस जी ने कहा, ‘अच्छा, बताओ क्या चाहिए?’ शम्मी ने कहा, ‘मुझे ग्रामोफोन चाहिए।’ उस जमाने में ग्रामोफोन बहुत बड़ी चीज मानी जाती थी। नरगिस जी ने तुरंत स्टूडियो से गाड़ी मंगवाई और उन्हें सीधे दुकान पर ले जाकर ग्रामोफोन दिलाया। साथ ही कई सारे रिकॉर्ड भी खरीदवाए। शम्मी कपूर बताते हैं, ‘मैंने उस समय के बेहतरीन एल्बम लिए, चाहे वेस्टर्न हों या इंडियन। रिकॉर्ड सुन-सुनकर ही मुझे म्यूजिक का सेंस आया। मेरे भीतर जो रिदम पैदा हुआ, उसमें नरगिस जी का बहुत बड़ा हाथ रहा।’
तो आज शम्मी कपूर की याद में उनकी फिल्म जंगली का यह गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए:
चाहे कोई मुझे जंगली कहे, कहने को जी कहता रहे…








