रूमी जाफरी1 घंटे पहले
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फिल्म ‘मोहब्बतें’ के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान।
आज बात अमित जी यानी अमिताभ बच्चन की। कल उनका जन्मदिन था। तो मैं याद कर रहा था उनके साथ बिताया हुआ वक्त, एक-एक लम्हा। उनसे जुड़ी अनमोल यादें, उनसे पहली बार कब मिला, क्या-क्या बातें हुईं, सब तो इस कॉलम में नहीं लिख सकता। लेकिन जब पहली बार उन्होंने मुझे साइन किया, वो किस्सा मैं आज बताना चाहता हूं।
आज जो कॉर्पोरेट सिस्टम हमारी इंडस्ट्री में काम कर रहा है, उसका श्रेय अमित जी को जाता है। उन्होंने अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) की स्थापना की थी। उन्होंने मुझे बतौर लेखक साइन किया और डायरेक्टर थे सचिन पिलगांवकर। मैं उनके ऑफिस जुहू के अजंता होटल में पहुंचा। पहली बार मैंने फिल्म इंडस्ट्री का इतना बड़ा ऑफिस देखा, जहां सूट-बूट और टाई पहने इंडस्ट्री वाले लोग काम कर रहे थे। पहली बार वहां मैंने यूनिफॉर्म पहने हुए चपरासी और चाय परोसने वाले को दस्ताने पहने हुए देखा। पहली बार मैंने कॉन्फ्रेंस रूम देखा। मैंने पूछा, ‘इसमें क्या होगा?’ तो बताया गया, ‘यहीं सारे क्रिएटिव डिस्कशन होंगे, स्क्रिप्ट नरेशन भी यहीं होगा। सामने राइटर बैठेगा और उसके सामने सभी डिपार्टमेंट्स के हेड्स। नरेशन होगा, सब अपने-अपने पॉइंट्स नोट करेंगे, फिर डिस्कशन होगा।’
ये सब मैंने पहली बार देखा था। वरना उस दौर में तो यही होता था कि राइटर ने लिखा, डायरेक्टर को सुनाया, और शूटिंग शुरू। लेकिन ऐसा कॉर्पोरेट माहौल मैंने
पहली बार एबीसीएल के ऑफिस में देखा। मैंने अमित जी से कहा भी, ‘ये सब तामझाम की क्या ज़रूरत है?’ तो अमित जी बोले, ‘रूमी, आने वाले समय में काम इसी कॉर्पोरेट स्टाइल में होगा।’ और सच, आज पूरी इंडस्ट्री उसी तरह काम कर रही है, जिसकी शुरुआत अमित जी ने की थी।
हां, ये बात और है कि एबीसीएल इतनी कामयाब नहीं हुई। मैंने उनसे पूछा भी, ‘एबीसीएल इतनी सफल क्यों नहीं हुई?’ तो उन्होंने कहा, ‘मुझसे एक गलती हो गई। मैंने कॉर्पोरेट के बड़े-बड़े लोगों को कंपनी में रखा, जिनके पास फिल्म का अनुभव नहीं था। फिल्ममेकिंग का तजुर्बा न होने की वजह से नुकसान हुआ। फिर ‘मिस वर्ल्ड’ कराया, उसमें भी काफी नुकसान हुआ। एबीसीएल पर बहुत सारे केस हुए। मेरी बरसों की कमाई तो चली ही गई, ऊपर से बहुत सारा कर्ज भी हो गया।’
लेकिन अमित जी ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने हर तरह का कर्ज अपनी मेहनत की कमाई से चुकाया। लोग कहते हैं कि दोस्त मदद करते हैं, लेकिन जब अमित जी पर कर्ज था, उस वक्त मैं उनके बहुत करीब था, क्योंकि उस समय ‘बड़े मियां छोटे मियां’ बन रही थी। दोस्तों ने मानसिक रूप से बहुत सहारा दिया, लेकिन किसी ने आर्थिक मदद नहीं की और न ही अमित जी ने किसी से आर्थिक मदद ली। बल्कि मैं ऐसे कई मौकों का गवाह हूं, जहां अमित जी ने दूसरों का साथ दिया और आज तक देते आ रहे हैं। इस मामले में वे बहुत खुद्दार इंसान हैं।
इसी बात पर मुझे हसन नईम का एक शेर याद आता है : गर्द-ए-शोहरत को भी दामन से लिपटने न दिया, कोई एहसान जमाने का उठाया ही नहीं।
अब तो अमित जी ये बात कई इंटरव्यू में बता चुके हैं, लेकिन ये बात उन्होंने मुझे खुद बताई थी कि वे उस दौर में बहुत बेचैन रहते थे, ये सोच-सोचकर कि इतना
बड़ा कर्ज कैसे चुकाएंगे। एक दिन वे सुबह उठे और अपने ऑफिस पहुंच गए। उन्होंने खुद से पूछा, ‘मुझे ऐसा क्या आता है जिससे मैं ये कर्ज चुका सकूं?’ जवाब था, ‘मुझे एक्टिंग आती है। मैं एक्टिंग के बल पर यहां तक पहुंचा हूं और एक्टिंग के बल पर ही कर्ज चुकाऊंगा।’
फिर अमित जी यश चोपड़ा जी के पास गए। यश जी उन्हें सुबह-सुबह देखकर चौंके भी और खुश भी हुए। बोले, ‘बताओ अमित, सुबह-सुबह कैसे आना हुआ?’
अमित जी ने कहा, ‘मुझे काम करना है।’ यश जी ने कहा, ‘इससे अच्छी बात क्या होगी! मेरी एक नई फिल्म शुरू हो रही है, ‘मोहब्बतें’, उसमें तुम्हारे लिए एक शानदार रोल है।’ बस, यहीं से मोहब्बतें की शुरुआत हुई और इसी के साथ अमित जी की नई पारी भी। सारे कर्ज उतर गए और उन्होंने खुद को दोबारा फिल्म इंडस्ट्री के शीर्ष पर स्थापित कर लिया। सच कहूं तो, अमित जी से बड़ा फाइटर आज तक इस इंडस्ट्री में कोई नहीं हुआ। जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं और दुआ करता हूं कि अमित जी की उम्र इतनी लंबी हो कि आने वाली कई पीढ़ियां उन्हें देख सकें, उनके साथ काम कर सकें। इन्हीं दुआओं के साथ आज अमित जी को याद करते हुए उनकी फिल्म मजबूर का ये गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए :
आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है, ज़िंदगी भर वो सदाएं पीछा करती हैं…








