रूमी जाफरी3 घंटे पहले
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शोले में ‘जेलर’ के अपने आइकॉनिक रोल में असरानी।
वह 20 अक्टूबर की दिवाली की शाम थी। पूरे घर और मोहल्ले में लोग त्योहार की तैयारियों में जुटे थे। तभी खबर आई कि फिल्म इंडस्ट्री का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए बुझ गया। असरानी जी नहीं रहे। उन्होंने पिछले पांच दशकों में जो काम किया, वह बेमिसाल है। वे अपने काम से फिल्म इंडस्ट्री में हमेशा जिंदा रहेंगे। उनका अपना अंदाज था। उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। उनकी शख्सियत ही ऐसी थी, जो स्क्रीन पर भी कमाल थी और स्क्रीन के अलावा पर्सनल लाइफ में भी बहुत लाजवाब इंसान थे।
जयपुर के रहने वाले असरानी जी, किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी के कहने पर पुणे के एफटीआईआई पहुंचे थे। जहां तक मुझे याद है, वे एक्टिंग की पहली बैच के छात्र रहे और बाद में वहीं पर पढ़ाने भी लगे। निर्देशकों से मिलने के लिए वे छुट्टियों में ट्रेन पकड़कर मुंबई आते। वे ऋषि मुखर्जी से भी मिला करते थे। असरानी ने बताया था, एक दिन ऋषि दा, गुलजार साहब और उनके असिस्टेंट्स एफटीआईआई आए। उन्होंने पूछा कि असरानी कहां हैं तो मैं खुश हो गया कि ये मुझे काम देने आए हैं। मैं जैसे ही उनके पास पहुंचा, उन्होंने पूछा कि जया भादुड़ी कौन हैं, क्योंकि जया जी, सत्यजीत रे की ‘महानगर’ में काम कर चुकी थीं और सत्यजीत रे ने दादा से उनकी काफी तारीफ की थी। मैं जया भादुड़ी को लेकर आया और ऋषि दा से मिलवा दिया। फिर उनसे पूछा कि दादा, मेरा रोल? तो उन्होंने कहा कि ‘हम बुलाएगा।’ बाद में उनकी चिट्ठी आई, उन्होंने बुलाया और ‘गुड्डी’ में काम दिया। ‘गुड्डी’ के साथ-साथ मुझे ‘मेरे अपने’ में भी काम मिल गया। दोनों ही 5-6 महीने की गैप से रिलीज हुई और उसके बाद मुझे काम ढूंढने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
एफटीआईआई के दिनों को याद करते हुए असरानी जी ने बताया था कि एक बार वे डायलॉग की प्रैक्टिस कर रहे थे। तभी महान अभिनेता मोतीलाल जी आए। उन्होंने कहा, ‘तुम राजेन्द्र कुमार से प्रभावित लगते हो।’ असरानी जी बोले, ‘वो जुबली स्टार हैं। उनसे कौन प्रभावित नहीं होगा। वे तो खुद दिलीप साहब से प्रभावित हैं।” इस पर मोतीलाल जी ने कहा कि अगर तुम दूसरों की नकल करोगे तो मिमिक्री आर्टिस्ट बनकर रह जाआेगे। तुम्हारी अपनी कोई पहचान नहीं बनेगी। अपने ढंग से काम करो। असरानी जी ने यह बात जीवन भर याद रखी। इसी बात पर मुझे साहिर लुधियानवी का एक शेर याद आ रहा है:
ले दे के अपने पास फकत इक नजर तो है
क्यूं देखें जिंदगी को किसी की नजर से हम
असरानी ने ऋषिकेश मुखर्जी से लेकर प्रियदर्शन, पापिया से लेकर डेविड धवन तक सबके साथ काम किया और सबके फेवरेट बन गए। मेरी लिखी पांच फिल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया। मगर मैं यहां उनके सबसे मशहूर किरदार शोले के जेलर के बारे में बताना चाहूंगा। असरानी जी मेरी फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की शूटिंग कर रहे थे। तब मैंने उनसे पूछा कि आपने ये जेलर का कैरेक्टर कैसे वर्कआउट किया था तो उन्होंने बताया कि सलीम-जावेद ने मुझे रोल सुनाया और हिटलर की तस्वीर दिखाई। फिल्म इंस्टीट्यूट में हिटलर की स्पीच सुनाई जाती थी, यह सिखाने के लिए कि कैसे आवाज की ताकत से लोग दीवाने बन जाते हैं। वो सुनी। दिमाग में चार्ली चैपलिन की ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ भी थी। वही दो प्रेरणाएं इस किरदार में उतर आईं और वह रोल इतिहास बन गया।
एक और मजेदार किस्सा असरानी जी ने मुझे सुनाया था। वे एक फिल्म कर रहे थे- द बर्निंग ट्रेन। फिल्म सिटी में उसका सेट लगा था। फिल्म इंडस्ट्री के कई एक्टर उसमें काम कर रहे थे। करीबन 50 एक्टर थे। मैं रोज सुबह-सुबह अपने बॉय के साथ पहुंच जाता। लेकिन रवि चोपड़ा जी बोलते कि आप मेकअप रूम में जाइए। जब आपका शॉट होगा तो आपको बुला लेंगे। इंतजार करते-करते शाम हो जाती और वो बोलते कि आपका काम आज नहीं, कल होगा। अगले दिन मैं फिर सलाम करके मेकअप रूम में चला जाता और फिर शाम को रवि जी वही बात बोलते कि आपका काम आज नहीं, कल होगा। तीन दिन हो गए। मेरी बारी नहीं आई। तो चौथे दिन मैं गया ही नहीं। मैंने अपने बॉय से कहा कि जाकर रवि जी से बोलना कि साहब कमरे में हैं, आराम कर रहे हैं और उन्होंने कहा है कि जब शॉट रेडी हो तो एक घंटा पहले बता देना। मैंने अपने बॉय से कह दिया था कि जैसे ही एक घंटा पहले वो बोले कि शॉट रेडी है, तू मुझको फोन कर देना। मैं तुरंत घर से निकल जाऊंगा। एक हफ्ते तक ऐसा ही चलता रहा। एक हफ्ते मैं शूटिंग पर नहीं गया और रवि चोपड़ा को पता ही नहीं चला कि मैं शूटिंग पर नहीं आ रहा हूं। फिर एक दिन रवि जी ने एक घंटे पहले बोल दिया। मेरे बॉय ने मुझे फोन किया और मैं शूटिंग पर पहुंच गया।
इसी बात पर आज असरानी जी की यादगार भूमिकाओं को याद करते हुए उनकी याद में उनकी फिल्म ‘चला मुरारी हीरो’ बनने का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए:
न जाने दिन कैसे…








