रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  जैकी श्रॉफ : जब किचन में करते रहे मदद
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: जैकी श्रॉफ : जब किचन में करते रहे मदद

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पिछले हफ्ते मैंने जैकी श्रॉफ पर एक कॉलम लिखा था, जिसे बहुत सारे लोगों ने पसंद किया। मुझे ढेर सारे मैसेज और मेल भी आए। आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया। इसी बीच सुभाष घई जी का फोन भी आया। उन्होंने कहा कि रूमी, रात को घर पर डिनर है, तुम्हें आना है। मैंने कहा, आप बुलाएं और हम न आएं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। खैर, संडे यानी 1 फरवरी की रात मैं सुभाष जी के घर पहुंचा। जैसे ही घर में दाखिल हुआ, बहुत सारे दोस्त मिले। फिर सुभाष जी मुझे बालकनी में ले गए और बोले, इनसे मिलो। सामने देखा तो जैकी श्रॉफ खड़े थे। जैकी दादा। मैं हैरान रह गया। तभी सुभाष जी बोले, आज जैकी का बर्थडे है। तो मैंने सोचा कि खास दोस्तों को बुलाकर एक डिनर करते हैं। मैंने दादा को मुबारकबाद दी और कहा कि आज आपके ऊपर मैंने कॉलम लिखा है। उन्हें कॉलम दिखाया तो वो बहुत खुश हुए। मैंने कहा, अफसोस इस बात का है कि मैं यह भूल गया कि आज आपका बर्थडे है, वरना कॉलम में आपको मुबारकबाद जरूर देता। इसका एक ही तरीका है कि अगले कॉलम में अपनी इस गलती के लिए माफी मांग लूं। वैसे भी कई लोगों ने लिखकर भेजा है कि आप जैकी के बारे में कुछ और पुरानी बातें बताइए। तो आज मैं जैकी श्रॉफ से जुड़े कुछ और पुराने किस्से साझा करना चाहता हूं। जैकी श्रॉफ ने बताया कि बहुत कम लोगों को पता है कि मुझे मेरी मां जेरी लुईस बुलाती थीं। और मेरे पिता, जो खुद एक बहुत बड़े एस्ट्रोलॉजर थे, कहते थे कि तेरा पब्लिक और मीडिया में बहुत बड़ा नाम होगा। मैं ग्यारहवीं में फेल हो गया था और यही सोचता रहता था कि मेरा नाम कैसे होगा। मैंने टाइपिंग सीखी, क्योंकि उस वक्त टाइपिंग की वजह से नौकरी मिल जाया करती थी। मैंने सोचा, नौकरी कर लूंगा। मगर मां और बाप के दिल से निकली हुई बात को ऊपरवाले को तो सुननी ही थी। मां कहती थीं, जेरी लुईस एक्टर, तो मैं एक्टर बना। पिता कहते थे कि तेरा नाम मीडिया और पब्लिक में होगा, तो हो गया। आज मैं जो कुछ भी हूं, उनकी दुआओं का नतीजा है। इसी बात पर मुझे मुनव्वर राना का एक शेर याद आ रहा है :
घेर लेने को जब भी बलाएं आ गईं,
ढाल बनकर मां की दुआएं आ गईं। यह बात सब जानते हैं कि जैकी श्रॉफ साउथ मुंबई की जिस सोसाइटी में रहते थे, वहां कॉमन टॉयलेट था। तीस लोगों पर एक टॉयलेट होता था। सुबह लाइन लगती थी। लेकिन बड़ी बात यह है कि हीरो और सुपरस्टार बनने के बाद भी जैकी श्रॉफ ने तीन-चार साल तक वह सोसाइटी नहीं छोड़ी। सारे प्रोड्यूसर, राइटर, डायरेक्टर को वहीं बुलाकर मिलते थे। सादगी इसे कहते हैं। बात उनके बर्थडे से शुरू हुई थी, तो एक और बर्थडे का किस्सा सुनाकर यह कॉलम खत्म करना चाहूंगा। बात 5 दिसंबर 1996 की है। मेरे बड़े भाई जो भोपाल में रहते हैं, उनके बेटे जोहब का पहला बर्थडे था। मैं उस वक्त बेंगलुरु में ‘दीवाना मस्ताना’ की शूटिंग कर रहा था। बहुत व्यस्त था। मुझे लगा कि अगर मैं नहीं जाऊंगा, तो घरवाले बुरा मानेंगे। तो मैंने कहा कि जोहब को लेकर मुंबई आ जाओ। उसकी पहली बर्थडे पार्टी मैं अपने घर पर मनाऊंगा। वे लोग आ गए और मैंने अपने सारे खास दोस्तों को इनवाइट कर दिया। उस पार्टी में ऋषि कपूर, रणधीर कपूर, राहुल रवैल, ऐश्वर्या राय, जैकी श्रॉफ, सईद जाफरी, शक्ति कपूर और बहुत सारे लोग थे। सारे मेहमान ड्राइंग रूम में बैठकर पार्टी एन्जॉय कर रहे थे, लेकिन जैकी श्रॉफ मुझसे मिलकर थोड़ी देर बैठे और फिर किचन में चले गए। क्योंकि बार-बार लोग कुछ न कुछ ऑर्डर कर रहे थे और जैकी पूरे वक्त किचन से बाहर ही नहीं आए। स्टाफ की मदद करते रहे। कोई कबाब मांगता, तो किचन से आवाज आती – चल भिड़ू, कबाब लगा। मैं ट्रे पकड़ता हूं। जल्दी गरम कर, जाकर दे आ। कोई पानी मांगता, तो फौरन बोलते – चल भिड़ू, मैं ग्लास में पानी डालता हूं, तू दे कर आ। मैं बार-बार किचन में जाऊं, मेरी वाइफ जाए, ऐश्वर्या जाए। सब लोग उन्हें कहते, आओ हॉल में चलो। और वो सबको एक ही जवाब देते – भिड़ू, तुम लोग पार्टी एन्जॉय करो। मैं इन लोगों का हाथ बंटा रहा हूं। ये इधर अकेले पड़े हैं। मेरा पूरा स्टाफ – कुक, उसके हेल्पर, मेरे सर्वेंट, भोपाल से आए रिश्तेदार, सब जैकी के साथ किचन में खड़े होकर फोटो खिंचवाते रहे। आज भी वे लोग वो तस्वीरें अपने पास संभालकर रखते हैं और कहते हैं, इतनी सादगी वाला इंसान हमने आज तक नहीं देखा। जैकी श्रॉफ की याद में ‘काश’ फिल्म का यह गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए… ओ यारा, तू प्यारों से है प्यारा…



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