रसरंग में मायथोलॉजी:  आर्यावर्त का ‘भारतवर्ष’ के रूप में किस तरह हुआ विस्तार?
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रसरंग में मायथोलॉजी: आर्यावर्त का ‘भारतवर्ष’ के रूप में किस तरह हुआ विस्तार?

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ऋग्वेद का अंतिम संकलन लगभग 1000 ईसा पूर्व में किया गया माना जाता है। इसमें कुरु कुल के सदस्यों के लिए ‘भरत’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस कुल के सदस्य सिंधु नदी की द्रोणी से लेकर गंगा के पश्चिमी तट तक फैले क्षेत्र पर नियंत्रण रखते थे। यह भूभाग आज पंजाब और हरियाणा कहलाता है। इस दृष्टि से भरत कुल के राजाओं को हिंदुस्तान के प्रारंभिक राजाओं में गिना जाता है। इन राजाओं ने गंगा के मैदानी क्षेत्रों में वैदिक संस्कृति की स्थापना और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग एक हजार वर्ष बाद, यानी 100 ईसा पूर्व के आसपास, ओडिशा में जैन राजा खारवेल के शिलालेख में गंगा के मैदानी क्षेत्र को ‘भारतवर्ष’ कहा गया है। यह उल्लेख बताता है कि तब तक यह नाम एक भौगोलिक-सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्थापित हो चुका था। लगभग इसी कालखंड में भरत राजाओं की कथा को ऋषि व्यास द्वारा एक संस्कृत महाकाव्य के रूप में संकलित किया गया। आरंभ में यह ग्रंथ ‘जय’ और बाद में ‘महाभारत’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महाभारत में ययाति, शांतनु, पुरु, कुरु और भरत जैसे राजाओं की कथाएं वर्णित हैं। चूंकि इन राजाओं का उल्लेख पहले ऋग्वेद में भी मिलता है, इसलिए यह मानना स्वाभाविक लगता है कि महाभारत में वैदिक विचारों का विस्तृत रूप प्रस्तुत किया गया होगा। किंतु वास्तव में स्थिति इससे भिन्न दिखाई देती है। इस नए महाकाव्य में भरत को शकुंतला और दुष्यंत का पुत्र बताया गया है। शकुंतला, मेनका और विश्वामित्र की पुत्री हैं। यहां मेनका एक अप्सरा हैं और विश्वामित्र सूर्यवंशी माने जाते हैं। दूसरी ओर दुष्यंत चंद्रवंशी हैं। इस प्रकार राजा भरत में हिंदुस्तान के दो महान राजवंशों (सूर्यवंश और चंद्रवंश) का संगम दिखाया गया है।
महाभारत में यह भी वर्णन है कि संसार में धर्म के नष्ट होने का भय उत्पन्न हो गया था और उसे पुनःस्थापित करने के लिए विष्णु का अवतार हुआ। हालांकि इस महाकाव्य में जिस ‘विश्व’ की बात की गई है, वह वस्तुतः उत्तर भारत तक ही सीमित था। लगभग 500 ईस्वी में रचित विष्णु पुराण में भरत नामक एक अन्य व्यक्ति का उल्लेख मिलता है, जो राजा ऋषभनाथ के पुत्र थे। ऋषभनाथ के तपस्वी बनने के पश्चात भरत ने राजपद संभाला था। ऋषभनाथ जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं। विष्णु पुराण में उनका उल्लेख इस बात का संकेत देता है कि उन्हें पौराणिक परंपरा के अंतर्गत समाहित करने का प्रयास किया गया। बौद्ध धर्म की तरह जैन धर्म का उद्भव भी गंगा के निचले मैदानी क्षेत्रों में, गंडकी नदी के पूर्व में हुआ। जैन धर्म में जीवन में संयम और तपस्या को विशेष महत्व दिया गया है। जैन विचारों का प्रारंभ से ही मौखिक रूप में प्रसारण होता रहा, जिसके कारण उनके अनेक विचार समय के साथ लुप्त हो गए। लगभग 1500 वर्ष पूर्व, यानी उसी काल में जब विष्णु पुराण की रचना हुई, तब कुछ जैन विचारों को लिखित रूप दिया गया। जैन ग्रंथों के अनुसार भरत, ऋषभनाथ के पुत्र और हिंदुस्तान के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट थे। उन्होंने अपने निन्यानवे भाइयों को पराजित कर मेरु पर्वत पर अपना नाम उकेरा। किंतु उनका अहंकार तब टूट गया, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मेरु पर्वत पर उनसे पहले भी अनेक नाम उकेरे गए थे, अर्थात उनसे पूर्व भी कई लोगों ने विश्व को वश में किया था। ऐसे में प्रश्न उठता है कि वो भरत कौन हैं, जिनके नाम पर हिंदुस्तान को भारतवर्ष कहा जाता है? क्या वे वेदों में वर्णित राजा हैं, महाभारत के पात्र हैं या जैन ग्रंथों में उल्लिखित चक्रवर्ती सम्राट हैं? इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि किसी भी राजा ने कभी भी संपूर्ण हिंदुस्तान पर प्रत्यक्ष रूप से शासन नहीं किया, चाहे इतिहास की पुस्तकों में बने नक्शे कुछ और संकेत क्यों न देते हों।
लगभग 2300 वर्ष पूर्व सम्राट अशोक ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण में केवल तुंगभद्रा नदी तक के व्यापार मार्गों पर ही नियंत्रण स्थापित किया था। अकबर का शासन भी मुख्यतः उत्तर भारत तक सीमित रहा। अंग्रेजों का शासन भी भारत के केवल आधे हिस्से पर था, जबकि शेष क्षेत्र सैकड़ों रियासतों के अधीन थे। हिमालय से लेकर महासागर तक फैले एक अखंड भारत की धारणा मूलतः राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रही है। इसका पहला स्पष्ट उल्लेख लगभग 1800 वर्ष पूर्व रचित मनुस्मृति में मिलता है। ब्राह्मणों के भारतभर में फैलने के साथ संपूर्ण उपमहाद्वीप एक साझा सांस्कृतिक ढांचे में जुड़ता चला गया। ब्राह्मणों ने राजसभाओं में उपस्थित रहकर राजाओं को शासन संबंधी परामर्श दिए। साथ ही उन्होंने संस्कृत को राजसभा की भाषा के रूप में प्रोत्साहित किया तथा रामायण और महाभारत के माध्यम से आदर्श राजत्व की अवधारणाएं प्रस्तुत कीं। इस प्रकार ‘हिंदू राष्ट्र’ की धारणा राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अवधारणा के रूप में विकसित हुई।



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