रूमी जाफरी2 घंटे पहले
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सुभाष घई अपनी पत्नी मुक्ता घई के साथ (फाइल फोटो)।
कल यानी 24 अक्टूबर को सुभाष घई जी और रिहाना जी, यानी मुक्ता भाभी, की शादी की सालगिरह थी। इस मौके पर मुझे सुभाष जी की शादी का एक बड़ा दिलचस्प किस्सा याद आया। यह किस्सा मैंने मुक्ता भाभी के पिता अख्तर फारूकी साहब से सुना था। बाद में जावेद अख्तर साहब और खुद सुभाष जी से भी कई बार सुना। सोचा, आपसे साझा करूं। आपको भी मजा आएगा।
सुभाष जी और रिहाना जी की मुलाकात पुणे में हुई थी, जब सुभाष जी फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में पढ़ रहे थे। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और साथ जीवन बिताने का फैसला कर लिया। लेकिन वे चाहते थे कि यह रिश्ता मां-बाप की रजामंदी और आशीर्वाद से आगे बढ़े। रिहाना जी ने अपने अब्बा अख्तर फारूकी साहब को सुभाष जी के बारे में बताया और उनसे गुजारिश की कि वे एक बार उनसे मिल लें। अख्तर फारूकी साहब उन दिनों कमाल अमरोही साहब के यहां प्रोडक्शन का काम देखते थे। जावेद अख्तर साहब भी वहीं असिस्टेंट डायरेक्टर थे। अख्तर साहब ने जावेद साहब से कहा, ‘जावेद, मैं अपनी बेटी के लिए लड़का देखने जा रहा हूं। तुम भी मेरे साथ चलो। तुम उसकी उम्र के हो, उससे बात करना और उसे थोड़ा ऑब्जर्व करना।’
जावेद साहब तैयार हो गए। उन्होंने पूछा, ‘कहां चलना है? लड़के का घर कहां है?’ अख्तर साहब ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर जावेद साहब हैरान रह गए। मुलाकात लड़के के घर पर नहीं, बल्कि डांडा इलाके के एक ‘आंटी के अड्डे’ पर तय हुई थी। मुंबई में उन दिनों ऐसे कुछ पारंपरिक घर हुआ करते थे, जहां मेहमाननवाजी का अपना ही अंदाज था। वहां लोगों को घर के आंगन में बिठाया जाता, खाने-पीने का इंतजाम होता और स्थानीय पकवानों से खातिरदारी की जाती। जावेद साहब को लगा कि यह तो और भी अच्छा है। खुलकर बातें होंगी, खाना-पीना होगा और लड़के को समझने का मौका भी मिलेगा।
दोनों वहां पहुंचे। सुभाष जी से बातचीत शुरू हुई। अख्तर साहब ने तो बातें कम कीं, जावेद साहब और सुभाष जी खूब बतियाए। बातचीत के साथ खाना-पीना भी चलता रहा। दोनों ने खूब खाया-पिया और महफिल कब खत्म हुई, इसका किसी को ठीक से याद नहीं! दोनों को बस इतना याद था कि अगली सुबह जब आंख खुली तो जावेद साहब और सुभाष जी एक ही बिस्तर पर सो रहे थे। दोनों उठे और खूब हंसे। इसके बाद जावेद साहब ने अख्तर साहब से कहा, ‘आपकी बेटी के लिए इससे अच्छा लड़का नहीं मिल सकता।’ अख्तर साहब ने कहा कि उन्होंने भी रात को ही सुभाष जी को पसंद कर लिया था। उन्हें सुभाष जी की यही बात पसंद आई कि वे जैसे हैं, वैसे ही सामने आते हैं। उनमें कोई बनावट नहीं है।
इसी बात पर मुझे बशीर बद्र का एक शेर याद आता है :
मिरी आंखों में आंसू की तरह इक रात आ जाओ
तकल्लुफ़ से, बनावट से, अदा से चोट लगती है।
अब एक दूसरा किस्सा, जो सीधे मुझसे जुड़ा है। मेरी शादी की सालगिरह भी 24 अक्टूबर को ही होती है। इस तरह मैं अपनी सालगिरह सुभाष जी के साथ साझा करता हूं। बात 2002-03 की बात है। मेरी शादी को चार-पांच साल ही हुए थे और उन दिनों मैं सुभाष जी के साथ एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहा था। सालगिरह वाले दिन भी मैं काम के लिए निकलने लगा, तो मेरी पत्नी हनान ने कहा, ‘आज हमारी एनिवर्सरी है। आज तो मत जाओ। लंच पर चलते हैं।’ मैंने कहा, ‘रात को डिनर पर चलेंगे। तुम मुंबई में जहां कहोगी, मैं तुम्हें वहां ले जाऊंगा।’ यह कहकर मैं सुभाष जी के यहां काम पर पहुंच गया।
शाम को जब मैंने घर जाने की बात कही तो सुभाष जी बोले, ‘तुम घर जाओ और हनान को लेकर मेरे यहां आओ। आज मेरी भी वेडिंग एनिवर्सरी है। घर पर कुछ खास लोगों के लिए डिनर रखा है।’ मैंने कहा, ‘सुभाष जी, मैंने हनान से डिनर पर ले जाने का वादा किया है।’ तो वह बोले, ‘डिनर पर ही तो जा रहे हो! मेरे यहां आ जाओ।’
मैं घर पहुंचा और हनान को बताया कि हमें सुभाष जी के यहां जाना है। वह बोलीं, ‘तुमने अकेले डिनर पर ले जाने का वादा किया था और अब पार्टी में जाने की हां कर दी!’ मैंने उन्हें समझाया कि सुभाष जी ने इतने प्यार से बुलाया है। आखिरकार वो राजी हो गई। मैंने सुभाष जी को फोन करके पूछा कि कहां आना है। उन्होंने कहा, ‘घर पर नहीं आना। सन एंड सैंड होटल पहुंचो। वहां एक सुइट बुक है। रिसेप्शन पर उसका नंबर पता चल जाएगा।’
हम होटल पहुंचे। रिसेप्शन पर सुइट का नंबर पूछा। एक कर्मचारी हमें वहां तक छोड़ने आया। हम सोच रहे थे कि दरवाजा खुलेगा तो अंदर बहुत सारे लोग होंगे और पार्टी चल रही होगी। लेकिन दरवाजा खुला, हम अंदर गए और कर्मचारी चला गया। सामने एक बड़ा-सा सुइट था, जो पूरी तरह फूलों से सजा हुआ था। वहां एक खूबसूरत बुके रखा था, एक गिफ्ट था और एक केक, जिस पर लिखा था – ‘हैप्पी वेडिंग एनिवर्सरी!’ हम लोग ये देख के इमोशनल हो गए। उसी वक्त सुभाष जी का फोन आया। उन्होंने हमें शादी की सालगिरह की बधाई दी। मैंने कहा, ‘सेम टू यू, सर! मेरे पास शब्द नहीं हैं कि आपका शुक्रिया कैसे अदा करूं। आपके इस तोहफे ने मुझे और हनान को बहुत इमोशनल कर दिया है।’
उस दिन एक बार फिर महसूस हुआ कि सुभाष जी को यूं ही हिंदी सिनेमा का शोमैन नहीं कहा जाता। आज सुभाष जी और रिहाना जी के लिए सुभाष जी की ही फिल्म ‘परदेश’ का यह एक खूबसूरत गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए :
दो दिल मिल रहे हैं, मगर चुपके चुपके…








