राजदीप सरदेसाई का कॉलम:  कांग्रेस में थरूर जैसे नेताओं के लिए अवसर क्यों नहीं हैं?
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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: कांग्रेस में थरूर जैसे नेताओं के लिए अवसर क्यों नहीं हैं?

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7 घंटे पहले

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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar

राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

शशि थरूर ने मलयालम भाषा के एक पॉडकास्ट पर हाल ही में कहा कि अगर कांग्रेस को मेरी सेवाओं की जरूरत नहीं है, तो मेरे पास बहुत सारे दूसरे विकल्प हैं। मीडिया के उन्मादी शोर के इस दौर में एक ट्वीट या 20 सेकंड का एक साफ-सुथरा भी साउंडबाइट भी बड़े विवादों को जन्म दे सकता है। वैसे भी शशि थरूर पहली बार सवालों के घेरे में नहीं आए हैं।

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक थरूर ने सक्रिय राजनीति के विकल्प के रूप में किताबें लिखने, लेक्चर्स देने आदि की बात कही, लेकिन मान लिया गया कि कांग्रेस के एक और नेता पार्टी बदलने की तैयारी कर रहे हैं। जबकि वे तो वास्तव में केरल के मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अपनी दावेदारी पेश कर रहे थे।

हाल के वर्षों में कांग्रेस छोड़ने वाले हाई प्रोफाइल नेताओं की सूची काफी लंबी है। उनमें से अधिकांश भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हो गए हैं, जो बताता है कि राजनीति में सत्ता-सुख से अधिक लुभावनी कोई चीज नहीं। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और मिलिंद देवड़ा जैसे नेताओं की पहुंच तो कांग्रेस के प्रथम परिवार तक थी, फिर भी उन्होंने अलग होने का फैसला किया।

हिमंत बिस्वा सरमा और कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे अन्य वरिष्ठ नेता तब पार्टी छोड़ गए, जब उन्होंने खुद को पार्टी की अंदरूनी राजनीति का शिकार होते पाया। ऐसे गुमनाम पार्टी कार्यकर्ताओं की तो कोई गिनती ही नहीं, जिन्होंने एक मजबूत कप्तान के अभाव में डूबते जहाज को छोड़ दिया है।

लेकिन थरूर का मामला थोड़ा अलग है। अव्वल तो वे एक स्टीरियोटाइप कांग्रेसी नेता के ढांचे में फिट नहीं बैठते। किसी वंशवादी नेता, गांधी परिवार के पारिवारिक मित्र या कांग्रेस में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने वाले के बजाय सौम्य, स्पष्टवादी और संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक थरूर भारतीय राजनीति में एक विलुप्त होती प्रजाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे एक सेल्फ-मेड मेधावी व्यक्ति हैं, जिनके करियर में विद्वत्ता, कड़ी मेहनत और कौशल का सर्वोत्तम मिश्रण रहा है।

जब थरूर ने पहले-पहल संयुक्त राष्ट्र की नौकरशाही से चुनावी राजनीति की हलचलों में कदम रखा था, तो कहा गया कि वे जल्द ही असफल हो जाएंगे। अपनी नफीस अंग्रेजी, सधे हुए उच्चारण, अनूठी शब्दावली और निजी जीवन के विवरणों के चलते वे भारत के रूढ़िवादी राजनीतिक परिवेश के लिए अनुपयुक्त मान लिए गए थे।

और इसके बावजूद थरूर तिरुवनंतपुरम से चार बार सांसद चुने गए और राजनीति के मैदान में टिके रहे। एक ऐसी सीट पर यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, जहां वामपंथियों का ठोस आधार है और जहां भाजपा लगातार अपना दबदबा बढ़ा रही है। उन्होंने कई बार अपनी क्षमता से ज्यादा प्रदर्शन करने की भी कोशिश की, खासतौर पर जब उन्होंने 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा।

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक आउटसाइडर होने के बावजूद वे राजनीति में सफल हुए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए थरूर की दावेदारी की लड़ाई पूरी तरह से गैर-बराबरी के मैदान पर लड़ी गई थी और कुछ पार्टी अधिकारियों ने तो कांग्रेस प्रतिनिधियों को उनके अभियान से दूर रहने की हिदायत भी दी थी। इसके बावजूद उन्हें 1000 से ज्यदा वोट मिले, जो बताता है कि पार्टी के भीतर उनकी अपील उम्मीद से ज्यादा थी।

थरूर के साथ यह भी समस्या रही है कि उन्हें आसानी से किसी ‘खेमे’ में नहीं रखा जा सकता है। एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी होने के नाते वे कांग्रेस की मंडलियों के बजाय साहित्य उत्सवों में अधिक सहज लगते हैं। अपनी नितांत व्यक्तिवादी शैली के चलते वे जब भी मोदी सरकार के किसी विचार का समर्थन करते हैं, तो उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है।

आज की राजनीति में असुरक्षाएं इतनी गहरा चुकी हैं कि किसी के लिए तनिक भी विपरीत राय रखने की जगह कम होती जा रही है। लेकिन एक अच्छी लोकतांत्रिक पार्टी को चाटुकारों के इको-चैम्बर में तब्दील नहीं होना चाहिए। मजे की बात यह है कि थरूर की इनोवेटिव शैली ही उन्हें उन वोटरों के लिए आकर्षक बनाती है, जो एक सकारात्मक विकल्प की ओर देखना चाहते हैं।

किसी पार्टी को चाटुकारों के इको-चैम्बर में तब्दील नहीं होना चाहिए। मजे की बात यह है कि शशि थरूर की इनोवेटिव शैली ही उन्हें उन वोटरों के लिए आकर्षक बनाती है, जो किसी सकारात्मक विकल्प की ओर देखना चाहते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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