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- Rajdeep Sardesai’s Column Mercy For Some, Punishment For Others What Kind Of A ‘system’ Is This!
3 घंटे पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
कुछ सप्ताह पहले मैंने ‘माय नेम इज रहीम खान’ शीर्षक से एक वीडियो-ब्लॉग प्रसारित किया था, जिसमें बताया गया था कि आज एक भारतीय मुसलमान होने का क्या मतलब है। इसके बाद तत्काल ही मैं दक्षिणपंथियों के निशाने पर आ गया।
मुझ पर आरोप लगाया गया कि बढ़ते इस्लामिक चरमपंथ की समस्या से बचने के लिए मुस्लिम-विक्टिमहुड का झूठा चित्रण कर रहा हूं। लेकिन आज सोचने पर लगता है कि शायद मेरे उस ब्लॉग का शीर्षक ‘माय नेम इज अली खान महमूदाबाद’ होना चाहिए था।
फेसबुक पर टिप्पणी के लिए अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद की गिरफ्तारी बताती है कि हमारे राजनीतिक-तंत्र में क्या गलत है, जो भारतीय मुसलमानों को हाशिए पर धकेल रहा है। उनका अपराध यह था कि उन्होंने आॅपरेशन सिंदूर पर अपने विचार व्यक्त किए थे।
उन्होंने कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों के पाखंड पर सवाल उठाया था। उन्होंने लिखा था कि मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि बहुत से दक्षिणपंथी टिप्पणीकार कर्नल कुरैशी की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन शायद उन्हें इतने ही पुरजोर तरीके से यह मांग भी करनी चाहिए कि मॉब लिंचिंग, बुलडोजर और नफरत फैलाने वाली राजनीति के शिकार होने वाले दूसरे लोगों को भी भारतीय नागरिकों की भांति सुरक्षा मिले।
ऐसा लिखकर अली खान यह बताना चाह रहे थे कि कर्नल कुरैशी को धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक बताने और धरातल पर भारतीय मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव के बीच कितना अंतर है। क्या इस टिप्पणी को भारत की स्वायत्तता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली बातों के तौर पर देखा जा सकता है?
या क्या इसे किसी महिला की गरिमा का अपमान करने वाला कृत्य कहा जा सकता है? सरकार की आलोचना कब से इस हद तक एक अपराध हो गई कि भाजपा युवा मोर्चा के एक कार्यकर्ता सरपंच की शिकायत पर तत्काल गिरफ्तारी हो जाए या हरियाणा महिला आयोग नोटिस भेज दे?
महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया से जब एक टीवी इंटरव्यू में यह पूछा गया कि अली खान ने किसी महिला की गरिमा का हनन कैसे किया है तो उनके पास इसका कोई तार्किक स्पष्टीकरण नहीं था। यह साफ है कि अन्य ‘सरकारी’ संस्थानों की तरह महिला आयोग ने भी आधिकारिक निर्देशों पर जल्दबाजी में नोटिस भेज दिया था। इसमें दिल्ली पुलिस भी शामिल थी।
इस मामले ने कई परेशान करने वाले सवाल खड़े किए हैं। जैसे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश के लिए सत्ता का दुरुपयोग। यह इस तरह का इकलौता मामला नहीं है। चाहे किसी भी दल की सरकार हो, वह असहमति के स्वरों को दबाने के लिए इसी तरह से अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करती है।
याद करें कि कैसे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के बारे में सोशल मीडिया पर कथित रूप से एक अपमानजनक पोस्ट शेयर करने पर मराठी अभिनेत्री केतकी चिताले को 2022 में गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा था।
और कैसे द्रमुक सरकार ने तब चुप्पी साध ली थी, जब एक ‘समूह’ ने सत्ताधारी पार्टी के मुखर आलोचक और यूट्यूबर सुवुक्कू शंकर के घर में गंदगी फेंक दी थी। और कैसे कोलकाता के एक प्रोफेसर पर ममता बनर्जी का कार्टून फॉरवर्ड करने के आरोप लगाए गए थे और उन्हें गिरफ्तारी के 11 साल बाद जाकर रिहा किया गया था।
एक मायने से भारतीय राजनीतिक तंत्र ने युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन के इस कथन को अपना लिया है कि ‘बोलने की आजादी तो है, लेकिन बोलने के बाद आजादी की गारंटी नहीं है!’ हालात ऐसे बन गए हैं कि कौन कानून के दायरे में आएगा और कौन नहीं, यह भी आज पूरी तरह से सत्ता-कुलीनों की निजी धारणाओं के अधीन हो गया है। अली खान प्रकरण की तुलना मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह से करें, जिन्होंने कर्नल कुरैशी के खिलाफ अपमानजनक और साम्प्रदायिक टिप्पणी की थी।
शाह को मंत्री पद से हटाने या सार्वजनिक रूप से फटकारने के बजाय भाजपा-नेतृत्व इस पर चुप है। मंत्री ने दिखावटी माफी मांग ली है। तब हाईकोर्ट को स्वत: संज्ञान लेकर मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने पर जोर देना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट ने मंत्री की टिप्पणी को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया। कोर्ट द्वारा इस मामले में एसआईटी नियुक्त करने के बावजूद पुलिस ने दिल्ली के अली खान मामले की तरह गिरफ्तारी के लिए सक्रियता नहीं दिखाई है। किसी पर रहम और किसी को सजा- क्या यही ‘नया भारत’ है?
कौन कानून के दायरे में आएगा और कौन नहीं, यह भी आज पूरी तरह से सत्ता-कुलीनों की निजी धारणाओं के अधीन हो गया है। यकीन न हो तो अली खान प्रकरण की तुलना मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह से करके देख लें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)








