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भास्कर सीरीज: 7 दिन… 7 रामायण अपनी-अपनी रामकथा- भाग-6 में पढ़िए- संपूर्ण योगवाशिष्ठ (महारामायण)। वशिष्ठजी और श्रीराम के संवाद वाले ग्रंथ में 32 हजार श्लोक हैं। रामायण में 24 हजार श्लोक हैं। यह 6 प्रकरणों में विभाजित है। प्रसंग-1: श्रीराम को वशिष्ठ का उपदेश एक दिन अध्ययनशाला से घर लौटे श्रीराम ने पिता दशरथ से तीर्थ यात्रा पर जाने की आज्ञा मांगी। दशरथ ने अनुमति दे दी। एक वर्ष तीर्थाटन के बाद जब वे लौटे तो बहुत दुखी रहने लगे। वशिष्ठ ने इसका कारण पूछा, तो श्रीराम ने कहा, यह जीवन निरर्थक है। बाल्यावस्था में खाना, रोना और सोना बस यही है। न खुद निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है, न क्षमता। दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर आती है युवावस्था, जिसमें काम वासना, क्रोध और अभिमान अपार दुखों का कारण बनते हैं। फिर वृद्धावस्था में शरीर जर्जर हो जाता है। अंततः मृत्यु हो जाती है। इससे बचने का आखिर क्या उपाय है? वशिष्ठ बोले- हे पुत्र! शम (संसार की वासना त्यागकर संतुष्ट रहना), संतोष, विचार और सत्संग… ये मोक्षद्वार के 4 द्वारपाल हैं। एक भी वश में आ जाए तो मनुष्य अनंत सुख को प्राप्त होता है। (प्रथम वैराग्य प्रकरण के 1-10वें सर्ग में) प्रसंग-2: वशिष्ठजी के भी 8 जन्म देख चुके सुमेरु पर्वत शिखर पर स्थित कल्पवृक्ष पर वास करने वाले काक भुशुण्डिजी को सबसे चिरंजीवी बताया गया है यानी उन्होंने कई प्रलय और कई सृष्टियां देखीं। ऐसा जानकर वशिष्ठजी उनसे मिलने पहुंचे और पूछा- आपने कई आश्चर्य देखे हैं, कृपया उन्हें कहिए। वे बोले- हे मुने! तुम ब्रह्मा के पुत्र हो। तुम्हारे 8 जन्म मुझे स्मरण हैं। समुद्र मंथन और विष्णु का कच्छपावतार 12 बार देख चुका हूं। तीन बार हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल में समेट ले गया। महर्षि वाल्मीकिजी ने 12 बार रामायण बनाई और विलय हो गई। महर्षि व्यासजी ने महाभारत दो बार बनाई और वे 7 बार अब तरित हुए। विष्णु ने हर युग में दैत्यों को मारने के लिए अवतार लिए। मुझको 12 बार राम अवतार और 16 बार कृष्णावतार का भी स्मरण है। किन्तु वे सभी भ्रममात्र हैं। कभी बंधु, मित्र, शत्रु आदि वही रहते हैं, तो कभी विपरीत हो जाते हैं। (षष्ठ निर्वाण प्रकरण के 18वें से 19वें सर्ग से) प्रसंग-3: भुशुण्डि ने मृत्यु को ऐसे जीता वशिष्ठजी ने काक भुशुण्डिजी से पूछा- आपके शरीर को मृत्यु ने किस वजह से नष्ट नहीं किया? तो वे बोले- हे मुनीश! अहंकार, काम, मोह, मद, क्रोध, लोभ, भय, तृष्णा, चिंता, ईर्ष्या, द्वेष, चंचलता और अभिमान आदि से जो घिरे रहते हैं, मृत्यु उनको मारती है। जिसके हृदय में सांसारिक वासना की यह माला नहीं पड़ी होती, उसे मृत्यु नहीं मारती। पुरानी सृष्टि जब नष्ट हो रही होती है, तब मैं आसन दृढ़ करके अपने शरीर को अचल ब्रह्मसत्ता में स्थिर कर देता हूं, अतः नई सृष्टि में मुझे फिर वही शरीर प्राप्त हो जाता है। एक चौकड़ी यानी चार युग (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग) जब एक हजार बार व्यतीत होते हैं, तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है यानी करीब 4 अरब 32 करोड़ मानव वर्ष के बराबर। यह जगत संकल्प मात्र है, जैसा संकल्प कर लें, वैसा ही प्रतीत होने लगता है। (षष्ठ निर्वाण प्रकरण के 18वें से 20वें सर्ग से) प्रसंग-4: ब्रह्मा ने सबसे पहले सूर्य रचा था श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठजी से पूछा- जगत की रचना कैसे हुई? उसे क्रम से कहिए। वशिष्ठजी बोले- पहले ब्रह्मा जब उत्पन्न हुए तब बारम्बार ब्रह्मा-ब्रह्मा… शब्द का उच्चार किया, अतः ब्रह्मा कहलाए। फिर उनके संकल्प से पहले माया उपजी, फिर तेज अग्नि का चक्रवात फूटा, जो बाद में ज्वाला का मंडल बनकर सूर्य कहलाया। जैसे-जैसे ब्रह्माजी का मन संकल्प करता रहा, वैसे-वैसे सृष्टि प्रतीत होने लगी। इसीतरह, प्रजापति, नक्षत्र, देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, गंधर्व, यक्ष, समुद्र, नदी, पर्वत आदि सम्पूर्ण जगत रचा गया। फिर ब्रह्माजी ने वेदों को उत्पन्न किया तथा जीवों के नाम, आचार, कर्मवृत्ति आदि बनाए। जगत् मर्यादा के लिए नीतिरूप स्त्री को भी रचा। मृत्यु, सुख-दुख, राग-द्वेष आदि प्रकट किए। इस प्रकार माया का विस्तार हुआ। परंतु संकल्परूप यह संसार भ्रम मात्र है। (चतुर्थ स्थिति प्रकरण के 98वें सर्ग से) रामकथा के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे रिलेटेड आर्टिकल में दी गई लिंक पर क्लिक करें…
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