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राम वन गमन पथ यात्रा, भाग-4 : चित्रकूट से नासिक: लोणार में देश का एकमात्र मंदिर, जहां वनवासी राम आशीर्वाद की मुद्रा में

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राम पथ के इस पड़ाव में हम घने जंगल, ऊंचे पहाड़ और नदियों की जन्मस्थली से रूबरू हुए। चित्रकूट के अमरावती आश्रम, विराध कुंड, सिद्धा पहाड़ होते हुए अमरकंटक के नर्मदा उद्गम स्थल मंदिर, रामटेक, वराह मंदिर, लोणार सरोवर और राम गया मंदिर के दर्शन करते हुए करीब 600 किमी का सफर तय कर हम नासिक पहुंच गए। चित्रकूट के टिकरिया-जमुनिहाई में है अमरावती आश्रम। बिना किसी स्थानीय व्यक्ति के यहां पहुंचना बेहद मुश्किल है। किस्मत से हमें एक बाइक सवार मिल गया, जिसकी मदद से हम 3 किमी की पत्थर भरी ऊबड़-खाबड़ सड़क और फिर डेढ़ किमी के पैदल रास्ते के बाद यहां पहुंच पाए। महर्षि अत्रि के कहने पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण एक रात्रि यहां रुके थे। यहां श्रीराम के पूर्वज राजा अम्बरीष की तपोभूमि थी। पुजारी प्रेम तिवारी महाराज ने हमें ये जानकारियां दीं। यहां से करीब 5 किमी है- विराध कुंड। स्थानीय निवासी विवेक त्रिपाठी ने हमें इसका रास्ता दिखाया। हम करीब 2 किमी अंदर घने जंगलों के बीच गए, जहां लगभग 30 हजार वर्ग फुट में फैला विशाल विराध कुंड पेड़ों के बीच छिपा है। गहरा इतना, मानो पाताल तक जा रहा हो।
जंगल में हम 70 वर्षीय किशन से मिले, जो कई बरसों से यहां पशु चराते रहे हैं। वे बताते हैं- ‘श्रीराम-लक्ष्मण ने यहां सीता का हरण करने वाले विराध राक्षस के हाथ काट डाले थे। उसे मारना संभव नहीं था, इसलिए श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- एक बड़ा गड्‌ढा खोदो, हम इसे उसी में जिंदा जला देंगे। तभी उसका रूप बदल गया। उसने बताया, मैं तुंबुरु गंधर्व हूं, कुबेर के शाप से राक्षस बन गया था।’ यहां से 20 किमी पर है सिद्धा पहाड़। यहां जब श्रीराम ने ऋषि-मुनियों की अस्थियों का पहाड़ देखा तो उनके आंसू आ गए। उन्होंने संकल्प लिया कि धरती को राक्षसों से मुक्त कर दूंगा। यहां 150 सीढ़ियां हैं, जिनकी हालत देखकर लगता है कि बरसों से कोई नहीं आया। चोटी पर धनुष-बाण लिए श्रीराम की मूर्ति है। फिर हम 300 किमी दूर अमरकंटक स्थित नर्मदा उद्गम स्थल मंदिर पहुंचे। यहां के पुजारी वंदे भारत महाराज बताते हैं- ‘त्रेतायुग में नर्मदा नदी उत्तर भारत और दक्षिण भारत को बांटती थी। श्रीराम बिना इससे गुजरे दक्षिण भारत में पहुंच ही नहीं सकते।’ इस मंदिर के बीचोबीच एक कुंड है, जिसमें नीचे से जलधारा फूटी है। इसे नर्मदा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। अमरकंटक से रामटेक होते हुए हम 784 किमी दूर लोणार सराेवर पहुंचे। अरण्यकांड में पंचअप्सरा सरोवर नाम से इसका जिक्र है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण जब यहां से गुजरे तो उन्हें ध्वनियां सुनाई दीं, जो इसी सरोवर से आ रही थीं। दरअसल, मार्कण्डेय ऋषि की तपस्या भंग करने आई 5 अप्सराएं यहां रहती थीं। इसी सरोवर के रास्ते में 15 मंदिर हैं। इन्हीं में देश का एकमात्र राममंदिर भी है, जहां वनवासी श्रीराम आशीर्वाद की मुद्रा में हैं। यहां से हम करीब 317 किमी का सफर करके नासिक तक पहुंच गए। वराह मंदिर… नीचे से निकलना शुभ मानते हैं
अमरकंटक से करीब 400 किमी की यात्रा करके हम रामटेक पहुंचे। यहां भी श्रीराम ने सिद्धा पहाड़ वाले अपने संकल्प को दोहराया था। इसलिए इस स्थान का नाम रामटेक पड़ा। टेक यानी संकल्प। मंदिर में प्रवेश से पहले वराह मंदिर है। जहां विष्णु के वराह अवतार की विशाल पत्थर की मूर्ति है। पुजारी पंडित जयनारायण तिवारी बताते हैं- ‘इसके पेट के नीचे से निकलने को शुभ माना जाता है।’ रामटेक पहली जगह है, जहां लक्ष्मण का मंदिर आगे है और श्रीराम का पीछे।



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