रुचिर शर्मा का कॉलम:  एआई के चलते बेरोजगारी फैलने का अंदेशा कम ही है
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रुचिर शर्मा का कॉलम: एआई के चलते बेरोजगारी फैलने का अंदेशा कम ही है

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हर तकनीकी क्रांति अपने साथ ये अंदेशे लेकर आती है कि इनोवेशन की मार नौकरियों पर पड़ेगी। इतिहास में अभी तक ये अंदेशे कभी सच साबित नहीं हुए। लेकिन एआई की बात और है। इसमें सच में ही इतनी क्षमता है कि वह अनेक कार्य मनुष्यों की तरह- या उनसे कहीं बेहतर कर सकता है। तो क्या इस बार मानव श्रम के लिए खतरा वास्तव में अलग और अधिक गंभीर है? लेकिन एआई को लेकर आज नजर आ रहे जुनून में एक तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है। पिछले चार दशकों में उन देशों की संख्या शून्य से बढ़कर 55 हो गई है, जहां कामकाजी वर्ग की आबादी घट रही है। इनमें अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। यह गिरावट अब और तेज हो रही है, क्योंकि परिवार अपेक्षा से भी कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। पिछले वर्ष चीन में जन्म लेने वाले शिशुओं की संख्या 1949 में इस पीपुल्स रिपब्लिक की स्थापना के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई है। जापान में तो यह संख्या अब 1899 के बाद सबसे कम हो गई है। दस वर्ष पहले के अनुमानों की तुलना में वैश्विक प्रजनन दर अब अनुमान से 25 वर्ष पहले ही जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए आवश्यक स्तर से नीचे जाने की राह पर है। इसके परिणामस्वरूप, विश्व की कामकाजी आयु वाली आबादी का पीक भी अनुमान से 30 वर्ष पहले आ सकता है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि एआई पहले ही प्रति श्रमिक उत्पादन बढ़ा रहा है, जिससे मानव श्रम की कुल मांग घट सकती है। लेकिन तेजी से घटती जनसंख्या के मद्देनजर एआई बड़े पैमाने पर बेरोजगारी पैदा करने के बजाय आने वाली लेबर-शॉर्टेज की समस्या को कम करने में अधिक मददगार साबित हो सकता है। ध्यान रहे कि अतीत की तकनीकी क्रांतियों ने नौकरियों नहीं, उद्योगों को समाप्त किया था। 19वीं सदी में मशीनों के उदय ने श्रमिकों को खेतों से कारखानों और फिर कारखानों से सेवा क्षेत्र की ओर धकेला था। 1910 के दशक में जब कार ने घोड़ागाड़ियों की जगह ले ली तो तांगा चलाने वालों की जगह ट्रक चालक और टैक्सी ड्राइवर आ गए। 1970 के दशक में एटीएम मशीनों ने बैंकों की अपनी लागत घटाने और अधिक शाखाएं खोलने में मदद की। 1990 के दशक से अब तक इंटरनेट ने अगर अमेरिका में लगभग 35 लाख नौकरियां खत्म कीं, तो 1.9 करोड़ नई नौकरियां भी पैदा की थीं। यकीनन, एआई इन सबसे ज्यादा उठापटक कर सकता है। एक अनुमान के अनुसार, एआई और उससे जुड़ी तकनीकों- जैसे ह्यूमनॉइड रोबोट्स के लिए वैश्विक स्तर पर अधिकतम श्रम-बाजार लगभग 400 करोड़ नौकरियों तक का हो सकता है। लेकिन फिलहाल तो एआई ऐसा नहीं कर पा रहा है। वैश्विक स्तर पर और अमेरिका जैसे एआई के क्षेत्र में अग्रणी देशों में बेरोजगारी दर कई दशकों के स्तर के आसपास ही बनी हुई है। जापान में भी रोबोट्स की तादाद तेजी से बढ़ने के बावजूद वर्षों से बेरोजगारी दर घट रही है और श्रम-बल में भागीदारी बढ़ रही है। वास्तव में हम यह तो देख पाते हैं कि इस समय कौन-सी नौकरियां खतरे में हैं, लेकिन भविष्य की कौन-सी नौकरियां सृजित होने जा रही हैं, उनकी कल्पना इतनी आसानी से नहीं कर पाते। अमेरिका में आज पैदा होने वाली नौकरियों में से लगभग एक-तिहाई ऐसी श्रेणियों की हैं, जो 25 साल पहले अस्तित्व में ही नहीं थीं। एआई कंटेंट क्रिएटर्स, प्रोडक्ट मैनेजर्स, इंजीनियर्स और सिस्टम डिजाइनर्स जैसे नए जॉब टाइटल तेजी से बढ़ रहे हैं, और वे पारंपरिक श्रेणियों में हुई नौकरियों की क्षति की भरपाई बड़ी आसानी से करते दिख रहे हैं। अगर एआई बड़े पैमाने पर बेरोजगारी पैदा करता भी है तो क्या मनुष्य चुपचाप बैठे रहेंगे? 2000 के दशक में ‘चाइना-शॉक’ ने अमेरिका के पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग 60 लाख फैक्टरी मजदूरों को विस्थापित कर दिया था और यह जनाक्रोश को भड़काने के लिए काफी साबित हुआ था। एआई से जितनी अधिक नौकरियां खतरे में पड़ेंगी, उतनी ही अधिक संभावना है कि मतदाता सरकारों से इसके प्रसार को धीमा करने की मांग करेंगे। जनसांख्यिकी एक लंबे समय से आर्थिक विकास को ड्राइव करती रही है। कोई भी अर्थव्यवस्था श्रमबल को बढ़ाए बिना तेजी से आगे नहीं बढ़ सकी है। एआई उलटे लेबर-शॉर्टेज की कमी से जूझती दुनिया को राहत दे सकता है। इसके कारण व्यापक बेरोजगारी फैलने की संभावना कम है- कम से कम बेरोकटोक तो नहीं। एआई के दौर में भी मनुष्य महत्वपूर्ण बने रहेंगे- कामगार के रूप में भी और एक राजनीतिक शक्ति के रूप में भी। एआई के कारण व्यापक बेरोजगारी फैलने की संभावना कम ही है। कम से कम बेरोकटोक तो नहीं। वास्तव में एआई के दौर में भी मनुष्य महत्वपूर्ण बने रहेंगे- कामगार के रूप में भी और एक राजनीतिक शक्ति के रूप में भी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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