टिपण्णी

रुचिर शर्मा का कॉलम: एआई ‘बूम’ बढ़ते कर्ज के बोझ से ‘बबल’ साबित न हो जाए

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अमेरिका के बढ़ते कर्ज को लेकर 1970 के दशक से ही चेतावनियां दी जा रही हैं, लेकिन कोई भी चेतावनी सच साबित नहीं हुई। अलबत्ता अब बेलगाम बढ़ता कर्ज मायने रखने लगा है। पिछले महीने इसने दुनिया भर में सरकारी बॉन्ड की बिकवाली शुरू करा दी। और इसका पहला ठोस असर यह हो सकता है कि अमेरिकी बॉन्ड पर बढ़ती ब्याज दरें एआई की तेजी पर ब्रेक लगा दें। इतिहास में झांककर देखें तो पाएंगे कि हर बड़े इकोनॉमिक-बबल का अंत तभी हुआ ​था, जब उसके केंद्र में मौजूद कंपनियों के लिए कर्ज की लागत काफी बढ़ गई थी। इसमें 1800 के दशक में सामने आए रेलवे-संकट भी शामिल हैं। पिछली सदी में, केंद्रीय बैंकिंग के दौर में सभी बड़े बुलबुले तब फूटे, जब केंद्रीय बैंकों ने अपनी अल्पकालिक उधारी दरों में तेज बढ़ोतरी की। पर इस बार स्थिति अलग है। आम तौर पर बाजार में उन्माद के दौरान कंपनियां तेजी से लोकप्रिय हो रहे निवेश के क्षेत्र में और पैसा लगाने के लिए भारी कर्ज लेना शुरू कर देती हैं। तेजी के माहौल से महंगाई बढ़ती है, ब्याज दरें ऊपर जाती हैं और बुलबुला फूट जाता है। इसके बाद सरकारें सामने आती हैं और प्रभावित कंपनियों के कर्ज की जिम्मेदारी अपने पर लेते हुए कमजोर पड़ चुकी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए खुद कर्ज लेती हैं। हाल के दशकों में सरकार की भूमिका बदलकर अच्छे आर्थिक दौर में भी लगातार प्रोत्साहन देने की हो गई है। 2008 के काफी समय बाद तक भी सरकार तेजी से कर्ज बढ़ाती रही। इस दशक में अमेरिका का बजट घाटा जीडीपी के करीब 6 प्रतिशत रहा है- जो इससे पहले के दशकों के औसत से दोगुने से भी अधिक है। इस अवधि में कंपनियों ने बहुत अधिक नया कर्ज लेने से परहेज किया। केवल पिछले एक साल में टेक्नोलॉजी की बड़ी हाइपरस्केलर कंपनियों ने भारी कर्ज जुटाना शुरू किया है, ताकि बड़े पैमाने पर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार की फाइनेंसिंग की जा सके। अधिक कर्ज लेने का असर सरकारी खातों पर पड़ा है। और समस्याएं वहीं से शुरू होती हैं। एक गंभीर चेतावनी सार्वजनिक कर्ज पर दिए जाने वाले ब्याज से मिलती है, जो पिछले पांच वर्षों में दोगुने से भी अधिक बढ़कर जीडीपी के 3 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है। यह अमेरिका के लिए एक नया रिकॉर्ड है और किसी भी बड़ी विकसित अर्थव्यवस्था में ब्याज भुगतान के उच्चतम स्तर तक हुई सबसे तेज वृद्धि है। सरकारी वित्त को लेकर बढ़ती चिंता- ऊर्जा की तेजी से बढ़ती कीमतों समेत अन्य फैक्टरों के साथ मिलकर- दुनियाभर में सरकारी बॉन्ड की यील्ड को ऊपर ले गई है। ऊंची ब्याज दरों का यह माहौल एआई कंपनियों की उधारी लागत भी बढ़ा रहा है। एआई बूम में एक बुलबुले के कई लक्षण मौजूद हैं। ब्याज दरें उस स्तर तक पहुंचने तक यह बुलबुला फूलता रहेगा, जहां कर्ज लेना बेहद महंगा हो जाए। मेरी रिसर्च बताती है कि दस-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड लंबी अवधि की उधारी लागत के लिए वैश्विक बेंचमार्क है और फिलहाल 4.8 प्रतिशत पर है। जब यह 5 प्रतिशत के स्तर को पार कर जाएगी, तो एआई बुलबुला फूट सकता है। यह सख्त मौद्रिक दौर की शुरुआत का संकेत होगा, जिसमें एआई की बड़ी परियोजनाओं के लिए पैसा जुटाना कठिन हो जाएगा। जब बड़ी टेक कंपनियों को पूंजी के लिए ऐसी सरकार से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी, जो अपने बॉन्ड पर 5 प्रतिशत से अधिक यील्ड दे रही हो, तो कई कंपनियां कर्ज बाजार से बाहर हो सकती हैं। इस साल एआई के इस्तेमाल से अनुमानित सालाना राजस्व करीब 200 अरब डॉलर है, जबकि कंपनियां डेटा सेंटर और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर पर 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च कर रही हैं। इस अंतर को पाटने के लिए कंपनियां नए बॉन्ड और इक्विटी जारी करने पर निर्भर हो रही हैं। अंदेशा है कि अमेरिका पर बढ़ते कर्ज का बोझ उसकी महाशक्ति की हैसियत को कमजोर कर सकता है और दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर का ताज छीन सकता है। लेकिन अमेरिका के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भी कर्ज के मोर्चे पर ऐसी ही समस्याओं से जूझ रहे हैं। फिलहाल, जिस बात पर नजर रखने की जरूरत है, वह है दस-वर्षीय ट्रेजरी की यील्ड कितनी तेजी से 5% के पार जाती है और इससे एआई बूम पर कितना खतरा पैदा होता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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