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- Virag Gupta’s Column: Long Debates And Complicated Decisions Increase The Burden Of Litigation
5 घंटे पहले
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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक
नए साल पर सुधारों का पहला ताकतवर संदेश सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह मेडिकल इमरजेंसी से मरीजों को इलाज की सुविधा होती है, उसी तरह अदालतों के दरवाजे भी न्याय के लिए हमेशा खुले रहने चाहिए। ताकतवर लोग महंगे और बड़े वकीलों के दम पर प्रतिकूल मामलों में लंबी, जटिल बहस और अनुकूल मामलों में जल्द सुनवाई पर जोर देते हैं।
इस मर्ज को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश में नियमित मामलों में वकीलों की बहस के लिए समय-सीमा तय करने की बात कही गई है। विधि आयोग ने 2009 में 230वीं रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से चर्चा की थी। उसके अनुसार देश में सरकारी कामकाज में गिरावट का असर न्यायपालिका में भी दिखने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने कहा था कि जजों को पूरा समय न्यायिक कार्यों में ही लगाना चाहिए। लेकिन लम्बित मामलों के बढ़ते आंकड़े मर्ज के बदतर होने की गवाही दे रहे हैं। 2009 में 2.74 करोड़ मामले लम्बित थे, जिनकी संख्या अब दोगुनी है।
संसद और विधानसभा में हुल्लड़बाजी हो तो कानून निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होती है। नौकरशाही का समय मीटिंग और रिपोर्ट में बीते तो प्रशासन शिथिल होता है। शिक्षकों की ड्यूटी वोटर लिस्ट दुरुस्त करने, मिड-डे मील बनाने और कुत्तों की गणना करने में लग जाए तो बच्चों के शैक्षणिक स्तर पर बुरा असर पड़ता है।
पुलिस का समय वीआईपी ड्यूटी, कोर्ट में हाजिरी और आरोप पत्र का पुलिंदा बनाने में नष्ट हो तो अपराध बढ़ने के साथ जांच में देरी होती है। इसी तरह वकीलों की बड़ी बहस और जजों के भारी-भरकम फैसलों से भी मुकदमों का बोझ बढ़ता है। विधि आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोगों की धूल खाती रिपोर्टों पर अमल के बजाय सतही चिंतन और भाषणों के बढ़ते चलन से जनता का सिस्टम पर भरोसा डगमगाता है।
भारत में शिक्षा के साथ कानून निर्माण में भी मैकाले की बड़ी भूमिका थी, जिसकी साम्राज्यवादी विरासत को दुरुस्त करने की बात इन दिनों की जा रही है। विधि आयोग ने मैकाले के कथन को दोहराते हुए कहा था कि अनुशासित और सुनिश्चित परिणामों वाली न्यायिक व्यवस्था से सही और जल्द न्याय मिल सकता है।
अमेरिका में प्रत्येक पक्ष के वकील को अधिकतम 30 मिनट सुनवाई का मौका मिलता है। विधि आयोग ने भी बहस के लिए अधिकतम डेढ़ घंटा समय तय करने की अनुशंसा की थी। तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कौल ने कहा था कि दुनिया के किसी भी प्रगतिशील देश में वकीलों को असीमित बहस की इजाजत नहीं मिलती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पहल के अनुसार भी नियमित मामलों की सुनवाई के पहले अधिकतम 5 पेज का संक्षिप्त नोट और बहस की समय-सीमा सूचित करना जरूरी है।
किंतु आवारा कुत्तों के मामले की सुनवाई के दौरान जब वकीलों ने बहस की समय-सीमा तय करने की बात की तो 3 जजों की पीठ ने उसे नकार दिया। संवैधानिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट के सभी जज बराबर हैं लेकिन चीफ जस्टिस का दर्जा अग्रणी है। चीफ जस्टिस कॉलेजियम के साथ मास्टर ऑफ रोस्टर और सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक मुखिया भी माने जाते हैं। इसलिए सर्कुलर के अनुसार न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट बल्कि बेहतर परंपरा के तौर पर हाईकोर्टों के सभी जजों को भी बहस के लिए समय-सीमा और फैसलों के सीमित पेज की प्रक्रिया पर व्यावहारिक अमल करना चाहिए।
अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में छोटे और तर्कसंगत फैसले देने की परम्परा है। भारत में केशवानंद भारती मामले में 1973 में 700 पेज, 2018 में आधार कानून के मामले में 1448 पेज और 2019 में अयोध्या विवाद में 1045 पेज का फैसला आया था। आपातकाल के दौरान एडीएम जबलपुर मामले में असहमति का ऐतिहासिक फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज एचआर खन्ना ने रिटायरमेंट के बाद कहा था कि जजों को साहित्यिक उपमाओं और लम्बे फैसलों से थीसिस लिखने के बजाय तर्क आधारित कानून सम्मत छोटे फैसले देने चाहिए। सभी अदालतों के जज और वकील, न्यायिक अनुशासन का कड़ाई से पालन करें तो लोगों को जल्द न्याय मिलेगा और मुकदमों के बोझ से देश को मुक्ति मिलेगी।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में छोटे निर्णय देने की परम्परा है। जबकि भारत में केशवानंद भारती मामले में 1973 में 700 पेज, 2018 में आधार कानून के मामले में 1448 पेज और 2019 में अयोध्या विवाद में 1045 पेज का फैसला आया था। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








