एन. रघुरामन का कॉलम:  जब इंसान जिम्मेदारी निभाने में विफल हो तो तकनीक ही समाधान है
टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: जब इंसान जिम्मेदारी निभाने में विफल हो तो तकनीक ही समाधान है

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • N. Raghuraman’s Column: When Humans Fail To Fulfill Their Responsibilities, Technology Is The Solution

7 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

चूंकि नए साल का पहला दिन हफ्ते के बीच में पड़ा, ऐसे में अधिकतर जगहों पर भीड़भाड़ के बजाय डाइनिंग-केंद्रित कारोबार देखने को मिला। लेकिन इस तथ्य के बावजूद पुणे पुलिस का रिकॉर्ड बताता है कि शहर में नव वर्ष पर शराब पीकर गाड़ी चलाने के 448 मामले दर्ज हुए।

जबकि पिछले साल यह संख्या 310 थी। यानी 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी। जाहिर है, पुलिस चेकपॉइंट बढ़ाती है तो मामले ज्यादा सामने आते हैं। कई अन्य शहरों में भी ऐसी बढ़ोतरी हुई होगी। लेकिन नशे में ड्राइविंग के कुल मामलों, हादसों और मौतों का राष्ट्रीय स्तर का आधिकारिक डेटा इतनी जल्दी मिलना मुश्किल है।

पुणे उदाहरण मात्र है। भारत ही नहीं, शायद पूरी दुनिया इसी समस्या से जूझ रही है। लोगों की गैर-जिम्मेदारी को लेकर बढ़ती चिंता ने इस क्षेत्र में वर्षों के ठहराव के बाद टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री को फिर से समाधान तलाशने के लिए प्रेरित किया है। इस साल हम “ब्रेथ-बेस्ड’ और “टच-बेस्ड सेंसर’ जैसी नई तकनीकें देख सकते हैं, ताकि नशेड़ी ड्राइवरों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों को कम किया जा सके।

सोच रहे हैं यह काम कैसे करता है? यह तकनीक ड्राइवर की सांस को ड्राइवर साइड के दरवाजे, डैशबोर्ड या स्टीयरिंग पर लगे सेंसर तक खींचती है। जैसे ही वह सहज तौर पर सांस लेता है तो सेंसर सांस में मौजूद अल्कोहल की मात्रा पहचान लेता है। यह पारंपरिक ब्रेथ एनालाइजर से अलग है, जिसमें ड्राइवर को जोर की सांस छोड़नी पड़ती है।

फिर निर्धारित सेटिंग पर निर्भर करता है कि शायद कार स्टार्ट ही न हो। स्टार्ट हो जाए और एसी की सुविधा मिल जाए, तो ड्राइवर गियर स्टिक आगे ना बढ़ा पाए। ताकि ड्राइवर को एसी का आराम तो मिले, लेकिन वह तब तक गाड़ी न चला पाए, जब तक मशीन अल्कोहल की अनुमत सीमा की पहचान न कर ले।

क्या तकनीक से गलती हो सकती है? सौ फीसदी। आम तौर पर लोग अभी तकनीक पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। जबकि ड्राइवरों को डर है कि ये डिटेक्शन सिस्टम कार पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण कर लेंगे। कानून के अनुपालन से जुड़े आलोचक फॉल्स पॉजिटिव की आशंका भी जता रहे हैं।

हाल ही में मैं न्यूयॉर्क से कनाडा सड़क मार्ग से गया। हम 60 मील प्रति घंटे (एमपीएच) की तय सीमा पर चल रहे थे। अमेरिका में 65 एमपीएच तक पुलिस अनदेखा करती है। 65 पार होते ही कार्रवाई करती है। लेकिन मेरी बहन की तरह बहुत कम लोग जानते हैं कि 67 एमपीएच तक भी पुलिस नहीं रोकती, क्योंकि 2 एमपीएच का टेक्नोलॉजी फॉल्ट बेनेफिट मिल जाता है।

यही फॉल्स अलार्म एकमात्र चीज है, जो निर्माताओं को वाहन में यह तकनीक लगाने से रोक रहा है। इन्श्योरेंस लॉबी इसका जोरदार समर्थन कर रही है, क्योंकि इससे अकेले अमेरिका में हर साल करीब 10 हजार जानें बच सकती हैं और कंपनियों को भी पैसे की बड़ी बचत होगी। लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह तकनीक अभी इतनी तैयार नहीं कि निर्दोष ड्राइवरों को परेशान न करे। फिर अभी यह गाइडलाइन भी तय नहीं कि यदि सिस्टम पॉजिटिव रिजल्ट देता है तो आगे क्या होगा? शायद कार स्टार्ट न हो, लेकिन क्या सिस्टम सीधे पुलिस को कॉल भी करेगा? फिलहाल तो कोई नहीं जानता।

तकनीक अभी परीक्षण और सुधार के दौर में है। इसे बना रही कंपनियां मजबूती से मानती हैं कि फिलहाल काल्पनिक फॉल्स-पॉजिटिव रेट का अनुमान लगाना बेहद जल्दबाजी होगी। डेवलपर्स का तर्क है कि ऑटोमोबाइल में एक भी ऐसा सेफ्टी सिस्टम नहीं है, जिसे उतनी सटीकता से परखा जाता हो, जितना ध्यान आलोचक ड्रंक-ड्राइविंग को लेकर दे रहे हैं। हाल ही में स्वीडिश कार निर्माता वोल्वो कार ने एक वैकल्पिक तरीका अपनाया है। इसमें स्टीयरिंग व्हील के सेंसर ड्राइवर की आंखों, हेड मूवमेंट और ड्राइविंग पैटर्न का विश्लेषण करते हैं, ताकि नशा, उनींदा होने या अन्य अक्षमताओं को पहचाना जा सके।

फंडा यह है कि कोई पसंद करे या न करे, लेकिन बढ़ती गैर-जिम्मेदारी के चलते कार निर्माता और कानून लागू करने वाले ऐसी तकनीक की मदद लेने जा रहे हैं, जो गैर-जिम्मेदार ड्राइवरों के प्रति कतई दया नहीं करेंगी। 2026 में इसके लिए तैयार रहिए।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *