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डाइट चार्ट बनाना आसान है, लेकिन उसे निभाना तब मुश्किल हो जाता है, जब मीठा खाने की तलब हावी होने लगती है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मीठा खाने की यह इच्छा कोई कमजोरी नहीं, बल्कि शरीर के संकेतों का नतीजा है। विज्ञान के कुछ सरल नियमों को अपनाकर आप इस लत को हमेशा के लिए छोड़ सकते हैं। नींद की कमी सीधे तौर पर आपकी खाने की पसंद को प्रभावित करती है। साइकोलॉजिस्ट अयान मर्चेंट के अनुसार, जब हम ठीक से नहीं सोते, तो शरीर तुरंत ऊर्जा पाने के लिए मीठे की मांग करता है। यही कारण है कि कम नींद की वजह से भी कई बार मीठे पकवान खाने का मन अधिक करता है। रिसर्च के अनुसार, अनिद्रा का इलाज कराने वाले लोगों में मीठा और नमकीन खाने की तलब में भारी कमी देखी गई है। ‘शुगर फ्री’ और आर्टिफिशियल स्वीटनर से बचें चीनी के विकल्प के तौर पर मिलने वाले आर्टिफिशियल स्वीटनर भी शरीर के लिए सुरक्षित नहीं हैं। वैज्ञानिकों के बीच आम सहमति है कि इनके नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं। ये अक्सर प्रोटीन पाउडर या डाइट ड्रिंक्स में छिपे होते हैं, इसलिए लेबल पढ़ना न भूलें। ब्लड शुगर को ‘रोलर कोस्टर’ न बनने दें जब हम बिना फाइबर या प्रोटीन के सिर्फ मीठा या कार्बोहाइड्रेट (जैसे सफेद चावल, मैदा) खाते हैं, तो खून में ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ता है और फिर उतनी ही तेजी से नीचे गिरता है। शुगर के स्तर में अचानक गिरावट दिमाग को संकेत देती है कि उसे और मीठा चाहिए। समाधान: न्यूट्रिशनिस्ट एलिसन एसेरा के मुताबिक, कार्ब्स के साथ प्रोटीन व फाइबर लें। ये शुगर के पचने की गति धीमा कर देते हैं, जिससे ब्लड शुगर स्थिर रहता है। दिमाग की ‘गलत ट्रेनिंग’ को बदलने से होगा फायदा यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डाना स्मॉल कहती हैं कि हमारा दिमाग मीठा खाने पर ‘रिवॉर्ड सिग्नल’ भेजता है, जो धीरे-धीरे एक लत बन जाता है। फूड कंपनियां भी सुंदर पैकेजिंग और खास तरह की आवाज (जैसे कोल्ड ड्रिंक की बोतल खुलने की आवाज) से हमारे दिमाग को इसके लिए ‘कंडीशन’ करती हैं। समाधान: सबसे पहले अपने वर्क-डेस्क या किचन से मीठे स्नैक्स हटा दें।
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