शीला भट्ट का कॉलम:  दक्षिण की राजनीति पर भी नजर बनाए रखें
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शीला भट्ट का कॉलम: दक्षिण की राजनीति पर भी नजर बनाए रखें

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5 घंटे पहले

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शीला भट्ट वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar

शीला भट्ट वरिष्ठ पत्रकार

तमिलनाडु में क्षेत्रीय राजनीति का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है, जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा। जानकारों का मानना है कि दशकों बाद तमिलनाडु में त्रिकोणीय मुकाबला हो सकता है। उससे भी बड़ा अचम्भा ये है कि वहां इस बार त्रिशंकु विधानसभा की संभावनाएं भी बन रही हैं।

दक्षिण भारत के इस महत्वपूर्ण राज्य में राजनीति के मूलभूत आयाम बदल रहे हैं। इस बार के चुनाव सिर्फ हिंदी बनाम तमिल और उत्तर विरुद्ध दक्षिण के ही नहीं हैं। ये चुनाव सिर्फ तमिल संस्कृति की रक्षा वाले भी नहीं होंगे। ये तमिलनाडु के मिजाज को बदलने वाले होंगे। अभी इस बाजी में पूरे पत्ते खुले नहीं हैं। लेकिन मुकाबला बहुत दिलचस्प हो गया है।

विधानसभा की 234 सीटों में सत्तारूढ़ द्रमुक के पास 133 सीटें हैं। द्रमुक मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के खिलाफ अन्य सभी दल कुछ न कुछ ऐसा मोर्चा बांध रहे हैं कि इस बार का चुनाव उन सभी के लिए संपूर्णतः द्रमुक को हराने का चुनाव बन गया है। वैसे तो तमिलनाडु में कई साल से द्रमुक के सामने अन्नाद्रमुक मैदान में होती है।

मुकाबला इन दो द्रविड़-पार्टियों में ही होता रहा है। पर्सनैलिटी-कल्ट आधारित राजनीति तमिलनाडु की पहचान रही है। अन्नादुरै, एमजी रामचंद्रन, करुणानिधि और जयललिता जैसे महारथियों को तमिल जनता ने अवर्णनीय श्रद्धा से अपना बनाया था।

लेकिन आज तमिलनाडु में उनके बराबर का कोई स्थापित नेता नहीं है। ऐसा नेता जो अपने पक्ष से भी बड़ा हो और तमिल संस्कृति का रुआबदार संरक्षक भी हो। खासकर जयललिता के बाद अन्नाद्रमुक के पास उनके कद का कोई दिग्गज नेता नहीं रह गया है और पार्टी के सीनियर नेताओं में मतभेद बहुत बढ़ गया है। उसके कारण द्रमुक के खिलाफ बन रहे माहौल का वो सही लाभ उठा नहीं पा रही है।

भाजपा- जो द्रविड़ भूमि में अपनी जड़ें डालने की कोशिश कर रही है- के पास भी न करिश्माई नेता हैं, न द्रविड़ रणनीति समझने वाले तमिलभाषी महारथी हैं। शायद उनको ऐसा व्यक्तित्व चाहिए भी नहीं, जिसका कद पार्टी और उसकी विचारधारा से बड़ा हो।

भाजपा इस चुनाव में सिर्फ एक ही मकसद से लड़ रही है- कुछ भी हो जाए द्रमुक को हराना है। तमिलनाडु में कांग्रेस पूरी तरह से द्रमुक की छाया में ही पनपती रही है। वो लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु से नौ सीटें जीत पाई थी।

अगर द्रमुक तमिलनाडु में हारती है तो केंद्र में कांग्रेस की आज जो स्थिति है, वह उससे भी ज्यादा निर्बल हो जाएगी। द्रमुक के पास लोकसभा में 22 सांसद हैं। मोदी सरकार का वो हर मुद्दे पर पुरजोर विरोध करते हैं। आज देश में भाजपा विरोधी दो मजबूत गढ़ हैं- एक ममता बनर्जी का बंगाल में और एक स्टालिन का तमिलनाडु में।

तमिलनाडु में भाजपा का संगठन ऐसा नहीं है, जो द्रमुक की बराबरी कर सके। ये भी सही है कि 2026 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव भाजपा के नेतृत्व में लड़ा जाने वाला चुनाव भी नहीं है। इस चुनाव में अमित शाह प्रमुख रणनीतिकार हैं, जो द्रमुक के सामने एक प्रभावशाली गठजोड़ खड़ा करने में कुछ सफल हुए हैं।

अप्रैल 2025 में भाजपा और अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु चुनाव लड़ने के लिए गठबंधन बनाया था। पिछले तीन महीनों में अमित शाह और प्रभारी पीयूष गोयल ने गौंडर से लेकर वाणीयार जाति को समझा-बुझाकर एनडीए के साथ जोड़ा है।

इधर पिछले दो सालों से द्रमुक का प्रचार भी प्रमुख रूप से भाजपा की विचारधारा के खिलाफ का रहा है। स्टालिन ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने बेटे उदयनिधि को आगे किया है। आज द्रमुक की भाजपा विरोधी राजनीति के मुख्य प्रचारक उदयनिधि ही हैं।

स्टालिन कई मुसीबत से घिरे हुए हैं। गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप, बेटे उदयनिधि को अपना वारिस बनाने का संकल्प और राज्य में बिगड़ती हुई कानून-व्यवस्था द्रमुक के खिलाफ एक माहौल पैदा कर रही है। बदलती जमीनी हकीकत के कारण इस बार द्रमुक की साथी रही कांग्रेस भी हिम्मत दिखाकर द्रमुक से अलग चुनाव लड़ने का सोच रही है। पर ऐसा होने की संभावना काफी कम है।

लेकिन तमिलनाडु का चुनाव अगर अभूतपूर्व बनने जा रहा है तो उसका कारण न तो स्टालिन हैं, ना ही विपक्ष के नेता पलानीस्वामी (ईपीएस)। वास्तव में तमिल सुपरस्टार विजय ने सबको हिलाकर रख दिया है। कई सर्वे आ गए हैं, जिनमें विजय को लगभग 25% लोग पसंद कर रहे हैं। अगर ये लोग विजय की टीवीके- तमिलगा वेत्री कषगम- पार्टी को वोट भी दे देंगे तो चुनाव नतीजों का कोई भी पूर्वानुमान नहीं लगा सकता है।

कांग्रेस में तो कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सोच रहे हैं कि अगर विजय उनके साथ आने को राजी हो जाएं तो द्रमुक को 20 सीट मिलनी भी मुश्किल हो जाएगी। लेकिन विजय किसी के हाथ आसानी से आने वाले नहीं हैं। उसके पास गजब का कॉन्फिडेंस है। खूब पैसा भी है। आज के दिन में वो सबसे पॉपुलर सुपरस्टार हैं।

वो दूसरे पक्ष के नेताओं को जल्दी से मिलते नहीं हैं। घटनाओं पर जल्दी प्रतिक्रिया भी नहीं देते हैं। पूरे तमिलनाडु में लड़ाने के लिए उसके पास पर्याप्त उम्मीदवार नहीं हैं। लेकिन लोगों में बिगड़ती हुई परिस्थिति के कारण इतना गुस्सा है कि वो अपनी आशा विजय के साथ बांध रहे हैं। विजय के पीछे दलित, महिलाओं और युवा वर्ग का समर्थन है।

वास्तव में लोग दोनों द्रविड़ दलों से इतने थक चुके हैं कि जो चुनाव द्रमुक के खिलाफ का था, वो मतदान का दिन आते-आते विजय को जिताने का माहौल बना दे तो अचरज नहीं होना चाहिए। द्रमुक के नेता विजय की भरपूर टीका करते हैं कि वो भाजपा के खिलाफ कोई खास बयान नहीं देते।

सेंसर बोर्ड ने उनकी महंगी फिल्म रोक रखी है, फिर भी वो भाजपा के खिलाफ बोल नहीं पाए। इस कारण से अफवाहों का बाजार भी गर्म है कि कहीं द्रमुक के खिलाफ भाजपा खेल तो नहीं खेल रही है? जो लगातार सर्वे हो रहे हैं, वो सब को उलझन में डालने के लिए काफी हैं। जानकार लोग ये भी कहते हैं कि विजय द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों को नुकसान पहुंचाएंगे।

उस स्थिति में द्रमुक मामूली अंतर से भी चुनाव जीतने की पूरी कोशिश करेगी, क्योंकि विजय की एंट्री से द्रमुक-विरोधी वोटों का बंटवारा होने की संभावना है। वहीं भाजपा कोशिश करेगी कि तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा हो जाए, जिसमें भाजपा भी सरकार बनाने या चलाने में एनडीए के तहत कोई भूमिका अदा कर सके।

द्रविड़ राजनीति में उभर रहा है एक नया त्रिकोणीय संघर्ष वैसे तो तमिलनाडु में कई साल से द्रमुक के सामने अन्नाद्रमुक मैदान में होती है। मुकाबला इन दो द्रविड़-पार्टियों में ही होता है। लेकिन आज इनके पास लोकप्रिय नेता नहीं हैं। विजय से उन्हें कड़ी चुनौती मिल रही है। भाजपा-कांग्रेस की नजरें इन समीकरणों पर हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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