4 घंटे पहले
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शीला भट्ट वरिष्ठ पत्रकार
एक मायने में भला ही हो ट्रम्प का, जिन्होंने भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले निर्यातों पर 50% का टैरिफ थोप दिया। इस गैर-जिम्मेदाराना डिप्लोमेसी का लाभ हमें यह हुआ कि हम निर्यात क्षेत्र में आए संकट की स्थिति में नए बाजार, नए देश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने के नए रास्ते ढूंढने लगे। निर्यात क्षेत्र में आई सुस्ती हटी। अब जब भारत पुरजोर तरीके से नए बाजारों की तलाश कर रहा है, तब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आज से भारत की दो दिन की यात्रा पर आ रहे हैं।
वैसे अब तक भारत और रूस के बीच 22 सालाना शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। दोनों देशों के संबंध 78 साल पुराने हैं और इनमें सर्वोच्च नेताओं के बीच हमेशा बातचीत होती रही है। लेकिन अब भारत और रूस के संबंध रंग बदल रहे हैं। खासतौर पर पुतिन की इस यात्रा की टाइमिंग का तो खासा महत्त्व है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर जिस तरह से इस संबंध को बदलना चाहते हैं, उसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध हो रहा है। अगले दो दिनों में मोदी जो संदेश अमेरिका और यूरोप को देने वाले हैं, उसका अंदाजा भी उन्हें है।
इस भेंटवार्ता का माहौल बिगाड़ने के लिए नई दिल्ली स्थित जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस के राजदूतों ने एक कॉलम लिखा है, जिसमें यह याद दिलाया है कि रूस किस तरह से शांति की परवाह किए बिना यूक्रेन को तबाह कर रहा है।
हाल के दिनों में पुतिन ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका नहीं जा पाए थे, क्योंकि यूक्रेन में युद्ध छेड़ने के लिए (वॉर क्राइम्स) उनके खिलाफ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट का वारंट है। लेकिन भारत में तो पुतिन का गर्मजोशी से स्वागत होगा। यह बात अमेरिका और यूरोप को खटक रही है।
मोदी को भी अपने आलोचकों को यह बताने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा कि भारत अपनी विदेश नीति अमेरिका के दबाव में नहीं बदलेगा। पुतिन की इस मुलाकात से ऐसे परिवर्तन भारत और रूस के संबंधों में आने वाले हैं, जो पिछले 30 सालों में नहीं हुए थे। भारत और रूस के बीच सैन्य हथियारों का बहुत बड़ा व्यापार है।
परमाणु ऊर्जा टेक्नोलॉजी में भी रूस का सहयोग भारत को मिला है। तमिलनाडु का कुडनकुलम् न्यूक्लियर पावर प्लांट एक रूसी कंपनी की मदद से ही बनाया गया है। ये हमारा सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा स्टेशन है। इस क्षेत्र में भी निवेश बढ़ने वाला है, क्योंकि भारत अपने नियमों में ढील देने वाला है।
स्पेस की दुनिया में भी रूस और भारत ने बढ़िया भागीदारी की है। लेकिन व्यापार के मामले में संबंध हमेशा फीके रहे। 2023-2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत से रूस में सिर्फ 4.26 अरब डॉलर का सामान जाता है। भारत सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को करता है, जो 100 अरब डॉलर के आसपास है। अब भारत रूसी बाजारों तक पहुंचना चाहता है और उनसे अपना कारोबार बढ़ाना चाहता है।
सबसे महत्वपूर्ण ये कि भारत व रूस के बीच इंडिया रशिया मोबिलिटी एग्रीमेंट पर दस्तखत होने वाले हैं। ट्रम्प ने भारतीय मूल के लोगों पर निशाना साधते हुए अमेरिका की इमिग्रेशन नीति पर बहुत बातें कही हैं। लेकिन भारत उससे विचलित हुए बिना वैध अप्रवासन को बढ़ावा दे रहा है। भारत चाहता है कि शिक्षित युवाओं और मजदूरों के हकों की विदेशी भूमि में रक्षा हो और उनकी कमाई को देश में भेजने की पुख्ता बैंकिंग व्यवस्था हो।
भारत के लाखों मजदूर खाड़ी के देशों की भयानक गर्मी में बसकर रोजी-रोटी कमाते हैं। उनके लिए भी एक नया विकल्प खुल रहा है, क्योंकि रूस भारत के मजदूरों को भी न्योता दे रहा है। इस वक्त साइबेरिया में करीब 3 लाख चीनी मजदूर बसे हुए है। कई ने तो रूसी औरतों से विवाह भी किया है। लेकिन रूस नहीं चाहता है कि किसी एक ही देश के लोग उसके एक प्रदेश में एकत्रित हो जाएं।
आज भारत के 1 लाख से ज्यादा लोग रूस में काम कर रहे हैं। यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसे हुए रूस को कहीं ज्यादा कुशल और अर्धकुशल कामगारों की जरूरत है। मोबिलिटी एग्रीमेंट भी उसी प्रयत्न का एक भाग है। भारत और रूस के संबंध हमेशा स्थिर, विश्वासपूर्ण और परिपक्व रहे हैं। दुनिया में बहुत ही कम ऐसे देश हैं, जिन्होंने इतनी निरंतरता के साथ द्विपक्षीय संबंधों को निभाया हो। ना ये संबंध ज्यादा भावुक हैं, ना ही अपेक्षाओं के भार से दबे हैं। आज अमेरिका भारत पर दबाव डाल रहा है कि भारत रूस से सस्ते तेल का आयात न करे।
युद्धविराम का दबाव बनाने के लिए रूस की आर्थिक स्थिति को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका द्वारा लगाए गए 25% अतिरिक्त टैरिफ के कारण भारत रूस से तेल का आयात कम करेगा, लेकिन रूस अमेरिका की ये चाल समझ रहा है। रूस का अर्थतंत्र जापान, जर्मनी या भारत से छोटा होने के बावजूद उसकी रणनीतिक अहमियत इतनी है कि ट्रम्प भी पुतिन के साथ समझौते करना चाहते हैं।
भारत का आम आदमी भी जानता है कि रूस भारत का भरोसेमंद सहयोगी रहा है। जबकि ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका अनिश्चित और गैर-भरोसेमंद देश बन गया है। जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो रूस ने भारत को सस्ता तेल दिया और भारत की इकोनॉमी उसके कारण काफी स्थिर रही है।
भारतीयों को भी अब अमेरिका का आकर्षण छोड़कर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, रूस में नई जमीन की तलाश करनी चाहिए। अमेरिका और चीन के दबदबे के बीच जरूरी है कि रूस और भारत साथ आएं। सोचें अगर चेन्नई-व्लादीवोस्तोक ईस्टर्न मैरिटाइम कॉरिडोर बनने की शुरुआत हो जाए- जैसा कि पुतिन और मोदी सोच रहे हैं- तो न केवल इन देशों, बल्कि उनके बीच बसे देशों की आर्थिक हालत में भी कैसी क्रांति आ जाएगी?
अमेरिका के बजाय रूस आज ज्यादा भरोसेमंद साथी है… आमजन भी जानता है कि रूस हमारा भरोसेमंद सहयोगी रहा है। जबकि ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका एक अनिश्चित और गैर-भरोसेमंद देश बन गया है। जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो ये रूस ही था, जिसने हमें सस्ता तेल देकर हमारी इकोनॉमी को डावांडोल होने से बचाया था।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)








