शेखर गुप्ता का कॉलम:  अमेरिका में अब समाजवाद क्यों लोकप्रिय हो रहा है?
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शेखर गुप्ता का कॉलम: अमेरिका में अब समाजवाद क्यों लोकप्रिय हो रहा है?

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6 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

जोहरान ममदानी चर्चा के विषय बनने वाले हैं। दुनिया के सबसे उदार, शक्तिशाली और समृद्ध यहूदी-बहुल शहर की बागडोर उनके हाथों में आने वाली है। वे गाजा के समर्थक हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति के अपने इलाके में जबरदस्त ट्रम्प-विरोध को बुलंद करते हैं और डेमोक्रेटिक लेफ्ट की पैरोकारी करते हैं।

ट्रम्प ने उन्हें “सौ फीसदी कम्युनिस्ट पागल’ कहा है। ट्रम्प उनके उत्कर्ष के लिए डेमोक्रेटिक लेफ्ट की चार महिला नेताओं की ‘चौकड़ी’ को जिम्मेदार मानते हैं। वैसे ट्रम्प से अपमानित होने का न्यूयॉर्क में कोई बुरा नहीं मानता। लेकिन मैं ममदानी के कुछ प्रमुख चुनावी वादों की चर्चा करूंगा।

वे बसों का किराया खत्म कर देंगे (दिल्ली, कर्नाटक, तेलंगाना और इसके बाद और सारे शहर गौर करें); सब्सिडी से बनाए गए 20 लाख आवासों का किराया ‘फ्रीज’ कर देंगे (हम अपने रेंट कंट्रोल एक्ट को याद करें); सार्वजनिक आवास विकास एजेंसी (भारत के हर शहर में डीडीए, म्हाडा, बीडीए आदि हैं) के जरिए तीन साल के अंदर दो लाख और आवास बनवाएंगे; छह सप्ताह के नवजात शिशुओं से लेकर पांच साल तक के बच्चों को व्यापक बाल सुरक्षा सेवा (आंगनवाड़ी?) उपलब्ध करवाएंगे; और सरकारी किराना स्टोर खोलेंगे, जिनमें कम कीमत पर सामान मिलेंगे।

आपको अपनी राशन की दुकानों, केंद्रीय भंडारों और सहकारी सुपर मार्केट की याद है न? इन सारे कार्यक्रमों को भारतीयों की दो पीढ़ियां समाजवादी राज्य-व्यवस्था की भारी नाकामियों के रूप में याद करती हैं। जिस तरह मैं 10 साल की उम्र में अपनी मां के साथ हर चीज खरीदने के लिए राशन की दुकान के आगे लाइन में खड़ा हुआ करता था, उस तरह अगर आप भी खड़े हुए होंगे तब आप समझ जाएंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं।

इन सरकारी दुकानों में कामगार तबकों के लिए चीनी (1967 में प्रति व्यक्ति प्रति सप्ताह 200 ग्राम के हिसाब से), गेहूं से लेकर मीटर के नाप से कपड़े तक हर चीज उपलब्ध होती थी। आपने अपने शहरों में कामगार तबकों के लिए बनाए गए सरकारी आवासों को भी जरूर देखा होगा, जिन्हें कंक्रीट का स्लम कहा जाता है। हर शहर में आपको वे मिल जाएंगे। हमारी मुफ्त बस सेवाएं राज्य सरकारों की आर्थिक तंगी के कारण नाकाम हो रही हैं।

ऐसी सारी योजनाएं जो अपने देश में विफल हो गईं, उन्हें ममदानी उस शहर में दोहराना चाहते हैं जिसे लाखों भारतीयों ने मुख्यतः आर्थिक शरणार्थी के रूप में अपना नया घर बनाया है। ममदानी इतनी कम उम्र के हैं कि उन्होंने ये सारे विचार भारत से शायद ही लिए होंगे, और यह भी मुमकिन नहीं है कि उनके अभिभावकों ने इस सबका खुद बहुत अनुभव लिया होगा।

लेकिन, जिस देश ने आधुनिक विश्व को पूंजीवादी सपना दिया और जो शहर तेज कामयाबी का प्रतीक माना जाता है, वहां समाजवाद के प्रति लगाव दिलचस्पी का विषय है। इससे भी दिलचस्प है न्यूयॉर्क के युवाओं में इसके प्रति आकर्षण।

अमेरिका के प्रायः सभी बड़े शहरों में यही स्थिति है, वे सब डेमोक्रेटों के नियंत्रण में हैं। और ममदानी उस ‘दस्ते’ के भी बाएं खड़े हैं। जिस शहर को पूंजीवादी सफलता का ब्रांड-दूत होना चाहिए था, यह उसका विरोधाभास है।

या ऐसा तो नहीं है कि इस तरह की सफलता अंततः समाजवाद के लिए जमीन तैयार करती है? कि आप इतने अमीर हो गए हैं कि समाजवाद की छूट दे सकते हैं? यूरोप ने जब खूब अमीरी हासिल कर ली तब धुर वामपंथ की ओर मुड़ गया था, और अब रास्ता बदल रहा है। समृद्ध समाजों में समाजवाद प्रवासियों को आकर्षित करता है और इसके साथ नस्ली, धार्मिक विविधताएं भी लाता है।

सच कहें तो दूर देशों के जनजातीय आंतरिक संघर्षों को भी ले आता है। इसके खिलाफ प्रतिक्रिया होती है और दक्षिणपंथ लौट आता है। ऐसा स्केंडिनेविया में भी हुआ, जिसे सर्वश्रेष्ठ समाजवाद का घर माना जाता है। भारत की समस्या यह है कि बुरे विचारों ने इसका पीछा कभी नहीं छोड़ा। केवल अच्छे लोग और सर्वश्रेष्ठ दिमाग इसे छोड़कर चले गए।

सबसे शानदार, सबसे महत्वाकांक्षी, उद्यमी भारतीयों ने अमेरिका को अपना घर बना लिया। वे हमारे फर्जी समाजवाद से नहीं, तो आखिर किससे भाग रहे थे? आज जो भी भारतीय ‘डंकी रूट’ की खातिर अपना जीवन जोखिम में डालता है, वह समाजवाद से भाग रहा होता है। जांच कीजिए कि सरकार वितरणवादी जनकल्याण पर कितना खर्च कर रही है और दक्षिणपंथी मानी गई भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय समाजवादियों की रेवड़ी संस्कृति को आज किस हद तक अपना लिया है।

  • जिस देश ने विश्व को पूंजीवादी सपना दिया, वहां समाजवाद के प्रति लगाव दिलचस्पी का विषय है। इससे भी दिलचस्प है न्यूयॉर्क के युवाओं में इसके प्रति आकर्षण। अमेरिका के प्रायः सभी बड़े शहरों में यही स्थिति है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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