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- Shekhar Gupta Column | India Bangladesh Pakistan Diplomacy & Strategy
4 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
भारत का बिल्कुल करीबी पड़ोसी बांग्लादेश दो साल पहले की तुलना में आज ज्यादा तनावपूर्ण दिखता है। इसका असर यह हुआ है कि पड़ोस में संकट या संबंधों में खटास हमारी घरेलू राजनीति का केंद्रीय हिस्सा बन गई है। इसके अपने नुकसान हैं।
नेपाल के साथ संबंधों में स्थिरता आई है, श्रीलंका और मालदीव के साथ संबंध बहुत अच्छे हो गए हैं, भूटान के साथ तो रिश्ता हमेशा से मजबूत रहा ही है। लेकिन पाकिस्तान में मुनीर का सितारा बुलंद होने से उससे रिश्ते खराब ही हुए हैं।
शेख हसीना के पतन और तारिक रहमान के गद्दीनशीन होने के बाद से बांग्लादेश भी नई चुनौती के रूप में उभरा है। रहमान को मिले बड़े बहुमत के साथ कई बड़े विरोधाभास जुड़े हैं। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जमात-ए-इस्लामी को वहां मुख्यधारा की राजनीति में आने का मौका मिला है, जो हमेशा से पाकिस्तान समर्थक रही है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में शहबाज शरीफ और तारिक रहमान एकपक्षीय चुनावों में विजयी रहे। लेकिन इन दोनों की सरकारों की वैधता पर सवालिया निशान लगा हुआ है।
बांग्लादेश की रहमान सरकार पर यह निशान कहीं ज्यादा बड़ा है। इस लिहाज से दोनों ‘निर्वाचित’ सरकारें कमजोर हैं और उनमें आत्मविश्वास की कमी है। पाकिस्तान में फौज के दबदबे के कारण सत्ता का जैसा भी हो, एक स्पष्ट ढांचा बना हुआ है। लेकिन बांग्लादेश का मामला अलग है।
रहमान को जमात के कारण बराबर दाएं-बाएं, आगे-पीछे देखकर चलना पड़ता है। यह एक क्रूर विडंबना है। अपने भारी बहुमत के बावजूद वे एक कमजोर प्रधानमंत्री नजर आते हैं। यह कमजोरी भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने और अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी देश का दौरा करने में उनकी हिचक से जाहिर होती है। वे चीन से सबक सीखने को राजी नहीं हैं, जो दलाई लामा के हर बयान पर विरोध तो जाहिर कर सकता है, लेकिन भारत में उनकी मौजूदगी के कारण भारत के साथ 1988 के बाद के अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहता।
दलाई लामा और शेख हसीना की स्थितियों में दो अहम फर्क हैं। दलाई लामा को भारत ने शरण दी है। लेकिन हसीना 2024 में उस समय के शासकों की मदद से बांग्लादेश वायुसेना के हेलिकॉप्टर से भारत आई थीं। रहमान के नजरिए से पूरी तस्वीर को देखें तो उन्हें जमात और ‘सड़कों के माहौल’ से जो खतरा महसूस होता है, वह वास्तविक लगता है।
वे भारत के साथ रिश्ते सामान्य होने की अचानक घोषणा नहीं कर सकते, तब तो बिल्कुल नहीं, जब हसीना उनकी सरकार के खिलाफ बयान दे रही हों और ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही हों। सो, रहमान के पास यह शिकायत करने की वजह है कि भारत की घरेलू सियासत उनकी मदद नहीं कर रही है। असम और बंगाल में चुनाव ‘बांग्लादेश घुसपैठियों’ के खिलाफ मुद्दा बनाकर लड़े गए। दूसरी जगहों पर भी राजनीति का यह केंद्रीय मुद्दा रहता है।
इन सबके ऊपर, भारत के सोशल मीडिया पर सरकार समर्थक प्रभावशाली आवाजें बांग्लादेश को पाकिस्तान जितना बड़ा दुश्मन ही घोषित करती हैं। दोनों के लिए एक ही तरह की भाषा का प्रयोग किया जाता है। पाकिस्तान को ‘भिखारिस्तान’ कहा जाता है, तो बांग्लादेश को ‘कंगलादेश’ कहा जाता है। बेशक यह सब सोशल मीडिया पर चलता रहता है। लेकिन राष्ट्रवादी जनमत में फर्क करने का सब्र नहीं दिखता।
‘मामूली पड़ोसी देश’ जैसे जुमले बांग्लादेश को नाराज करते हैं। यह भी आम धारणा है कि भारत में इन सबको प्रोत्साहित चाहे न किया जाता हो, लेकिन इसे व्यापक राजनीतिक सहमति हासिल है। फिलहाल हम पाकिस्तान की ज्यादा परवाह भले न करें, लेकिन क्या हम बांग्लादेश को भी उसी खांचे में डालना चाहेंगे?
हमारी घरेलू राजनीति की जो मजबूरियां हैं, या हमारे यहां निरंतर होने वाले चुनावों में जिस तरह के प्रचार किए जाते हैं, उन सबका नतीजा यह हुआ है कि बांग्लादेश को पाकिस्तान के साथ जोड़ दिया गया है। ढाका से शेख हसीना के निष्कासन को लेकर लोग और सत्तातंत्र चाहे जितने नाराज हों, सत्ता में उनकी वापसी को रिश्ते सामान्य करने की शर्त नहीं बनाया जा सकता।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भारत के एजेंडे में शामिल नहीं है। सरकार को यह पता है, और यह उसके फैसलों से भी जाहिर होता है। लेकिन जब तक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ भारत की घरेलू राजनीति का मुद्दा बने रहेंगे, बांग्लादेश से संबंध सुधारने की व्यापक रणनीतिक इच्छा का तालमेल कैसे बैठेगा?
इसलिए, भारत थोड़ी उलझन और दुविधा में है। 2015 में, पाकिस्तान की ओर हाथ बढ़ाने की पहली कोशिश में विफलता के बाद से ही पाकिस्तान भाजपा की राजनीति के केंद्र में रहा है। उरी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जनाक्रोश की लहर में 2017 में भाजपा ने यूपी को जीता और पुलवामा हमले के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव जीता।
अब पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर यूपी में अगले साल होने वाले चुनाव पर तो असर डाल ही सकते हैं। बांग्लादेशियों का मुद्दा तो बाद में जुड़ा। यह इस विचार से मेल खाता है कि भारत अपनी पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर मौजूद दो मुस्लिम-बहुल रणनीतिक खतरों की घेराबंदी में फंसा देश है।
लेकिन, इस समीकरण को जरा उलटकर देखें कि इससे किसे फायदा हो रहा है? इस तरह के असुरक्षा-बोध का फायदा उठाना भाजपा के लिए सुविधाजनक है लेकिन इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश को हमारी घरेलू राजनीति में बढ़त मिलने का मौका मिल जाता है।
हमारी आंतरिक राजनीति पर पाकिस्तान का जितना असर है, उतना बांग्लादेश का नहीं है। लेकिन दोनों ने अगर हाथ मिला लिए तो इससे भारत को नुकसान ही होगा। जो भी हो, ये बातें ‘पार्टी पोलिटिक्स’ की नहीं हैं। यह भारत के रणनीतिक हित का मामला है। उसके दोनों तरफ दो बड़े पड़ोसी देश अगर आक्रामक रुख अपना लेते हैं और हाथ मिला लेते हैं तब भारत को क्या हासिल होगा? भारत की कोशिश यह होनी चाहिए कि वे हाथ न मिला पाएं।
हमारी जो ध्रुवीकृत राजनीति है, उसमें पड़ोसी देशों के प्रति हमारी नीति को प्रमुखता देकर हम उनकी अहमियत ही बढ़ा रहे हैं। यह ऐसा खेल है, जिसे खेलना पाकिस्तान को खूब आता है। लेकिन इससे भारत के लिए विकल्प और गुंजाइशें सीमित हो जाती हैं।
यह भारत के रणनीतिक हितों से जुड़ा हुआ मामला है… हमारी आंतरिक राजनीति पर पाकिस्तान का जितना असर है, उतना बांग्लादेश का नहीं है। लेकिन दोनों ने अगर हाथ मिला लिए तो इससे भारत को नुकसान ही होगा। यह भारत के रणनीतिक हित का मामला है। हम अपने दोनों तरफ दो पड़ोसी देशों को आक्रामक रुख नहीं अपनाने दे सकते। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








