शेखर गुप्ता का कॉलम:  वह क्या है, जो ‘ब्रांड इंडिया’ को नुकसान पहुंचा रहा है?
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शेखर गुप्ता का कॉलम: वह क्या है, जो ‘ब्रांड इंडिया’ को नुकसान पहुंचा रहा है?

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वह क्या चीज है, जो ब्रांड इंडिया को नुकसान पहुंचा रही है? तीन दशक पहले आर्थिक सुधारों के बाद भारत विकसित देशों की नजरों में एक पसंदीदा देश बन गया था, लेकिन अब हालात क्यों बदल गए हैं? निवेशक पैसा निकालकर जा रहे हैं और भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या अभी तक वर्ष 2019 के स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि इसकी वजह क्या है, लेकिन हाल ही में दिल्ली के एक अवैध होटल में लगी आग ने मुझे जवाब दे दिया। भारत में कई ऐसी चीजें हैं, जो देश की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन तीन सबसे बड़ी समस्याएं हैं- कूड़ा-कचरा, वायु प्रदूषण और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की असुरक्षा। फिलहाल ये तीनों मिलकर एक और बड़ी समस्या पैदा करती है और वह हैं भारत के शहर। इसके साथ उन खतरों को भी जोड़ लीजिए, जो लोगों की जान के लिए जोखिम बनते हैं। यह शहरों के खराब प्रशासन और अव्यवस्था की कहानी है। मान लीजिए आप किसी दूर-दराज के गांव या छोटे शहर से दिल्ली आते हैं। यहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, बड़े पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता रहते हैं, जिन्हें समाज की अंतरात्मा की आवाज माना जाता है। लेकिन इसी शहर में रात को सोते समय आपको चिंता रहती है कि कहीं आपकी इमारत में आग लग गई तो क्या आप जीवित बचेंगे? सबसे बड़ी बात यह कि लोगों ने इस सबको सामान्य मान लिया है। लेकिन व्यक्तिगत सुरक्षा सबसे जरूरी है, खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास शहरों के अलावा रहने की दूसरी जगह नहीं। 2019 में करोलबाग के एक छह मंजिला होटल में आग लगी और 17 लोगों की मौत हो गई। उसी साल अनाज मंडी में लगी आग में नौ बच्चों सहित 45 लोग मारे गए। यह सिर्फ बड़े हादसे हैं। 2022 में मुंडका की एक चार मंजिला व्यावसायिक इमारत में आग लगने से 27 लोगों की दम घुटने से मौत हो गई। इसके दो साल बाद पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार में एक शिशु क्लिनिक में आग लग गई, जिसमें आठ नवजात बच्चों की जान चली गई। इनमें से अधिकतर हादसे उन जगहों पर हुए, जिन्हें अनधिकृत, अवैध या अनियमित क्षेत्र कहा जाता है। दिल्ली के पुराने गांवों को लाल डोरा क्षेत्र घोषित किया गया है, जहां सामान्य शहरी नियम लागू नहीं होते। मालवीय नगर का आग हादसा और साकेत की इमारत का मामला, दोनों ऐसे ही क्षेत्रों में हुए। मालवीय नगर का होटल हौज रानी में था और साकेत की इमारत महरौली के सैयद-उल-अजायब इलाके में थी। अगर आपको होटल चलाना है तो लाइसेंस लेना पड़ता है, लेकिन किसी लाल डोरा क्षेत्र वाले शहरी गांव में आप लगभग कुछ भी बना सकते हैं। आखिर वह गांव है! दिल्ली की किसी नियमित कॉलोनी- जैसे मालवीय नगर या साकेत- में निर्माण के लिए कई नियम हैं। जैसे आप कितनी ऊंची इमारत बना सकते हैं, लेकिन लाल डोरा क्षेत्रों में आप छोटी-सी जमीन पर ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी कर सकते हैं। यहां तक कि ऐसी इमारतें भी बन सकती हैं, जिनकी मजबूती बहुत कमजोर हो और जो 6 रिक्टर तीव्रता के भूकंप में तुरंत गिर जाएं। हमारे शहरी प्रशासन की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि इन गांवों और अवैध कॉलोनियों में नियमित क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा वोटर रहते हैं। असली समस्या यह है कि राजनीतिक दल इनके जीवन स्तर को सुधारने के बजाय इन्हें खुश रखने में लगे रहते हैं। दिल्ली के लगभग हर चुनाव में सभी राजनीतिक दल अवैध कॉलोनियों को नियमित करने का वादा करते हैं, लेकिन कोई भी बड़े स्तर पर पुनर्विकास, झुग्गी पुनर्वास या सुरक्षित और आधुनिक आवास बनाने की बात नहीं करना चाहता। क्योंकि यह लंबा और कठिन काम है और ऐसा काम एक चुनावी कार्यकाल में पूरा नहीं होता। नतीजा यह हुआ है कि हमारे शहर दो हिस्सों में बंट गए हैं- एक तरफ गेटेड कॉलोनियों में रहने वाले लोग और दूसरी तरफ वे जो लगभग अवैध हालात में रह रहे हैं। इन लोगों के वोट की ताकत है, जिसे मुफ्त सुविधाओं या कॉलोनियों को नियमित करने के वादों के जरिए हासिल किया जाता है। इस तरह शहरी आबादी का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है। हमारी राजनीति ने योजनाबद्ध शहरीकरण से हमेशा दूरी बनाए रखी है। जबकि आज भारत की लगभग 35% आबादी शहरों में रहती है। नए शहर ऐसे होने चाहिए, जहां आने वाले लोगों को रहने और आने-जाने की तमाम सुविधाएं मिलें। तभी वे धीरे-धीरे आर्थिक रूप से आगे बढ़ पाएंगे और वैल्यू चेन में ऊपर जा सकेंगे। पर अब तक जो मॉडल चलता आया है, उससे तो इस दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा सकता। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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