3 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
ट्रम्प जहां यूक्रेन को टी-90 टैंक के नीचे दबा देने पर आमादा हैं, डेनमार्क से ग्रीनलैंड छीन लेने की धमकी दे रहे हैं और यूरोपीय लोगों को यह कहकर रोने पर मजबूर कर रहे हैं कि उन्हें बेलगाम पुतिन का अपने ही बूते सामना करना पड़ेगा, तब यह कुछ सवाल उठाने का वक्त है। पहला सवाल वह है, जो हमने इस कॉलम में यूक्रेन-युद्ध शुरू होने पर उठाया था।
यूक्रेन ने रूस, यूरोप और अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी मिलने के बाद 1994 में परमाणु हथियारों के अपने भंडार को त्याग दिया था। आज वह पछता रहा होगा। रूस ने उस पर हमला कर दिया, यूरोप बचने का ठिकाना खोजने लगा और अमेरिका बेबस देखता रहा। यह कहानी अब आगे बढ़ चुकी है।
अमेरिका अब चाहता है कि यूक्रेन या तो अपनी आधी खनिज संपदा उसे देने का सौदा करे, या अपनी जमीन का पांचवां भाग छोड़ दे, वहीं ‘नाटो’ का सदस्य बनने या किसी दूसरी तरह की सुरक्षा गारंटी हासिल करने की बात तो भूल ही जाए। अपनी क्रूरता में यह किसी माफिया की ओर से रखी गई शर्त जैसी लगती है।
ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में केवल अपने सहयोगियों को निशाना बनाया है, जबकि प्रतिद्वंद्वियों को राहत दी है। इस नई ट्रम्पवादी विश्वदृष्टि का सिद्धांत यह है कि हर किसी को अपने भरोसे रहना होगा। इसका मतलब है : जिसकी लाठी, उसकी भैंस। ट्रम्प के उस वीडियो को देखिए, जिसमें वे यूरोप/नाटो को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि उनकी सुरक्षा अमेरिका का सिरदर्द नहीं क्योंकि “हम दोनों को एक सुंदर महासागर अलग कर रहा है।’
जिस भी देश का भू-राजनीति में और खासकर यूरोप तथा चीन के इर्दगिर्द कुछ भी दांव पर लगा है, वह इस सब को चिंता भरी नजर से देख रहा है। इन देशों में भारत भी शामिल है। अब यह नई दुनिया किस तरह काम करेगी? थॉमस फ्रीडमैन लिखते हैं कि ट्रम्प ग्रीनलैंड ले जाएंगे, शी जिनपिंग ताइवान ले उड़ेंगे और पुतिन बाल्टिक्स का कुछ हिस्सा दबोच लेंगे।
यूरोप के अलावा जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका के सभी मित्र देश उससे मिल रही सुरक्षा गारंटियों की समीक्षा करेंगे। क्या होगा जब ट्रम्प जापान से कहेंगे कि मुझे ओकिनावा दे दो, या ऑस्ट्रेलिया से कहें कि अमेरिका से सुरक्षा गारंटी की कीमत के रूप में अपने खनिज संसाधन का पांचवां हिस्सा हमें दे दो?
अब सवाल यह नहीं है कि ट्रम्प इन धमकियों पर अमल करेंगे या नहीं। सवाल यह है कि संप्रभुता-संपन्न देश इन धमकियों को महज लफ्फाजी कहकर खारिज नहीं कर सकते। भरोसा तोड़ा गया है। अगर ट्रम्प ‘सुरक्षा शुल्क’ या जमीन की मांग कर सकते हैं तो आगे यह भी मांग की जा सकती है कि हमारे गुलाम बन जाओ या चीन या रूस के रहम पर रहो। इससे एक अहम सवाल उठ खड़ा होता है।
मैं परमाणु हथियारों पर बहस में उस पक्ष का हूं, जिसका भारतीय शांतिवादियों ने वैचारिक या नैतिक आधार पर विरोध किया था। परमाणु अप्रसार की पक्षधर अमेरिकी लॉबी भारत पर दबाव बना रही थी कि वह परमाणु हथियार न बनाए।
1987-97 वाले दशक में उन्हें भारत में आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक कमजोरी दिखी, जिसका वे फायदा उठा सकते थे। उस दौरान भारत में कमजोर और अस्थिर सरकारें सत्ता में आईं। इस मजबूत लॉबी को यकीन हो गया था कि पंजाब-कश्मीर में उग्रवाद से जूझ रहे भारत पर दबाव बनाया जा सकता है कि वह परमाणु शक्ति बनने का सपना भूल जाए। इस लॉबी के तर्क परमाणु शक्तियों के अहंकार से उपजे थे।
वह दौर ऐसा भी था, जब भारत-पाकिस्तान युद्ध के आसार पैदा हो गए थे और हमें चेतावनी दी जाती थी कि जरा सोचो, तुम दोनों के पास परमाणु हथियार होंगे तो क्या होगा! तब हमारी जिंदगी में ‘सीटीबीटी’ (व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि) नामक एक और मुहावरा दाखिल कराया गया था।
अमेरिका से कई उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भारत आए, यह समझाने के लिए कि वह इस संधि पर दस्तखत कर दे। तब भारतीय नेताओं ने अडिग रहने की सलाहियत दिखाई। यह सिलसिला नेहरू से लेकर तब तक चला, जब तक कि इंदिरा गांधी ने 1974 में परमाणु परीक्षण करके और इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण-2 करके इसे खत्म नहीं कर दिया।
हमारे ये नेता चाहे जितने ताकतवर रहे हों, हम सब तथा हमारी भावी पीढ़ी उनके प्रति सदा आभारी रहेगी। उनमें यह दूरदर्शिता थी कि एक दिन ऐसा आएगा जब सुरक्षा की कोई गारंटी काम नहीं आएगी। वे मजबूत और भविष्यदर्शी थे।
उत्तरी कोरिया के किम जोंग उन आज यूक्रेन और यूरोप की हालत पर हंस रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि अगर उन्होंने अमेरिकी अतिक्रमण के जवाब में दक्षिण कोरिया या जापान पर परमाणु हमला करने की चेतावनी न दी होती तो क्या अमेरिका उन्हें सलामत रहने देता? ईरान इस सब पर नजर रखे हुए है।
अगर इराक के पास सच में ही जनसंहार के हथियार होते तो क्या बुश सीनियर या जूनियर ने उस पर हमला किया होता? उसकी मिसाइलों को तो अमेरिका तक पहुंचने की जरूरत भी नहीं थी, इजराइल या सऊदी के लिए खतरा पेश करना ही काफी होता।
ट्रम्प ने परमाणु अप्रसार के विचार की हत्या करके उसे दफन कर दिया है। परमाणु हथियार फिर से युद्ध-प्रतिरोधक बन गए हैं। मध्य-पूर्व में ईरान, सऊदी अरब और क्या पता अजरबैजान और मिस्र भी आज इनके बारे में सोच रहे हों और दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये भी।
अगर आप टोक्यो, कैनबरा, जकार्ता, मनीला में नेतृत्व संभाल रहे होते तब क्या सोचते? परमाणु हथियार आज ‘लो-टेक’ विकल्प और काफी सस्ते युद्ध-प्रतिरोधक बन गए हैं। अगर पाकिस्तान उन्हें बना सकता है तो कोई भी बना सकता है।
हमारे नेता दूरदर्शी थे, वो अमेरिकी दबाव में डिगे नहीं… हमारे नेता चाहे जितने ताकतवर रहे हों, हम सब तथा हमारी भावी पीढ़ी उनके प्रति सदा आभारी रहेगी। उनमें यह दूरदर्शिता थी कि एक दिन ऐसा आएगा जब सुरक्षा की कोई गारंटी काम नहीं आएगी। वे मजबूत और भविष्यदर्शी थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)








