48 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
ट्रम्प की ताजपोशी के साथ ‘ट्रम्पवाद’ का दबदबा जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसको लेकर इन दिनों सवाल उठाया जा रहा है कि यह भारत के लिए अच्छा है या बुरा? व्हाइट हाउस में पहुंचते ही उन्होंने यह राग अलापना शुरू कर दिया कि चाहे वह दोस्त रहा हो या दुश्मन, सबने हमें लूटा। और तब से ही वे सबसे पहले अपने दोस्तों को निशाना बना रहे हैं- यूरोप को रणनीतिक तथा रक्षा संबंधी मसलों को लेकर; तो कनाडा, मैक्सिको, और बेशक ‘टैरिफ किंग’ भारत को व्यापारिक मुद्दे पर।
लेकिन मैं अगर कहूं कि भारत के लिए यह अच्छी बात है, तो आप कहेंगे क्या बच्चों जैसी बात है। लेकिन मुझे थोड़ा समय दीजिए ताकि मैं अपनी बात रख सकूं। कोई भी राष्ट्र-राज्य- चाहे वह किसी भी आकार का हो, खासकर लोकतांत्रिक देश हो तो वहां अर्थनीति और राजनीति साथ-साथ चलती है।
सामान्य समय में राजनीतिक नेतृत्व ही देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करता है। भारत में, वह ‘सामान्य’ समय अधिकतर उदासीन किस्म के नतीजे देता रहा है। भारत ने कुछ ठोस सुधार दो मौकों पर किए, तभी जब उसके सिर पर बंदूक तनी हुई थी।
पहला मौका 1991 में तब आया था, जब भुगतान संतुलन का संकट (जिसे अक्सर दिवालिया हो जाना कहा जाता है) पैदा हुआ था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश का दरवाजा खटखटाने की नौबत आई थी। और दूसरा मौका 1998 में आया था, जब पोकरण-2 के बाद तमाम देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे।
तीसरा मौका अब आया है जब ट्रम्प गोली दागने की धमकी दे रहे हैं। अपनी पीठ खुद ठोकने में व्यस्त भारतीय सत्ता-तंत्र को सुर्खियां बनवाने के मोह से छुड़ाने के लिए ऐसी ही धमकी की जरूरत थी। सुर्खियां बनवाने, या तमाम तरह के नारों और दावों से अपने घरेलू समर्थकों लुभाना अलग बात है।
इन नारों और दावों में अक्सर यह कहा जाता है कि हम ‘सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था’ हैं, कि हम ‘पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और जल्द ही तीसरे नंबर पर आने वाले हैं’, कि हम ‘जापान और जर्मनी को पीछे छोड़ रहे हैं’। एक दशक से हमें बताया जा रहा है कि मैनुफैक्चरिंग क्रांति आने वाली है, लेकिन अब तक तो आई नहीं है।
1947 से 1989 तक के दौर को हम आर्थिक दुःस्वप्नमान कर खारिज कर सकते हैं। कुछ इतिहासकार और अर्थशास्त्री कह सकते हैं कि इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी ने नियंत्रणों को ढीला करना शुरू किया था, जिसे राजीव गांधी ने आगे बढ़ाया। लेकिन यह तर्क पुराने कांग्रेस भक्तों के सिवा कोई कबूल नहीं करेगा कि इन नेताओं नेआर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी।
भारत के आर्थिक विकास और उसकी पहली आर्थिक क्रांति में इंदिरा-राजीव दशक का अगर कोई योगदान था तो वह यह था कि उसने भुगतान संतुलन के संकट तक पहुंचा दिया था। चिदंबरम ने वित्त मंत्री के रूप में 1997-98 के गौड़ा-गुजराल दौर में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए।
इनमें से अधिकतर सुधार ऐसे थे, जो राव-मनमोहन के सुधारों के क्रम से जुड़ते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कदम था सरकारी उपक्रमों (पीएसयू) को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की अनुमति देने का, जिसने उस दौर में निजीकरण का रास्ता साफ किया।
लेकिन इसके बाद भारत को फिर जैसे किसी संकट का इंतजार करना पड़ा। यह संकट तब आया जब वाजपेयी सरकार ने 1998 में पोकरण-2 परीक्षण करवाया और इसके बाद तमाम आर्थिक प्रतिबंधों की बाढ़ आ गई, अमेरिका तथा उसके सहयोगियों और यूरोप से लेकर जापान और ऑस्ट्रेलिया तक ने फटकार लगाई।
जसवंत सिंह ने जब अमेरिका के साथ संवाद शुरू किया तो मुख्य जोर इस बात पर था कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति है, जो चीन का जवाब बन सकता है, और क्या अमेरिका आर्थिक सुधार कर रहे भारत के रूप में एक भारी आर्थिक अवसर को गंवाना चाहेगा?
इसके बाद भारत में आर्थिक सुधारों की दूसरी लहर आई, ‘पीएसयू’ का बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ, जिनमें मुनाफा कमा रहे ‘पीएसयू’ भी शामिल थे। आज पीछे मुड़कर देखने से लगता है कि वह हमारी पीढ़ी के जीवन की खुशी का एक छोटा-सा सपना था। उसके बाद से एअर-इंडिया को छोड़ और कुछ नहीं हुआ।
पोकरण के कारण लगे प्रतिबंधों के बाद एफडीआई से लेकर आयातों तक में कई तरह के सुधार हुए, भारतीय व्यवसाय को विदेश में निवेश की अनुमति मिली, और आम नागरिकों को ‘लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम’ (एलआरएस) के तहत हर वित्त वर्ष में विदेश में 2.5 लाख डॉलर तक खर्च या निवेश करने की छूट मिली, और शुल्कों (टैरिफ) में कटौती की गई।
1999 में बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि उन्होंने टैरिफों को लगभग ‘आसियान’ वाले स्तर तक ला दिया है। यूपीए वाले दशक में पीएसयू के निजीकरण पर रोक लगाने के सिवा इनमें से किसी आर्थिक सुधार को वापस नहीं लिया गया। राव-मनमोहन ने जो सुधार लागू किए थे, उनको पहला धक्का कांग्रेस और हमारी पूरी राजनीति पर हावी समाजवादियों के खेमे की ओर से उतना नहीं लगाया गया, जितना भारत के कॉर्पोरेट कप्तानों की ओर से लगा।
राव को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि वे डटे रहे, जबकि वे अल्पमत सरकार चला रहे थे। वे इसलिए भी डटे रहे क्योंकि वे ‘आईएमएफ’ से मिले कर्ज के कारण पैदा हुई मजबूरी का हवाला दे सकते थे कि अगर भारत ने भुगतान में चूक की तो क्या संकट पैदा हो सकता है।
इसका नतीजा कॉर्पोरेट में नाटकीय रचनात्मक तोड़फोड़ के रूप में सामने आया। आज सेंसेक्स की जो 30 कंपनियां या कॉर्पोरेट भारत की जो अग्रणी कंपनियां हैं, उनके बराबर 1991 में जो कंपनियां थीं, उनमें से 12 तो पूरी तरह लुप्त ही हो चुकी हैं, और कई गिनती के लायक भी नहीं रही हैं। जिन्होंने सुधारों को अपनाया वे चमक गईं। यह रचनात्मक तोड़फोड़ ही पूंजीवाद का सार है।
नई चुनौतियों से ही भविष्य के सितारे उभरकर सामने आएंगे भारत को सुधारों की कड़ी खुराक की जरूरत है और ट्रम्प ने हमारे सिर पर बंदूक तान दी है। यह हमें प्रतिस्पर्द्धी बनाएगा। ऐसे में अगर कुछ कंपनियां बंद होती हैं, तो पूंजीवाद की रचनात्मक तोड़फोड़ का जश्न मनाइए। इस मंथन से ही नए सितारे उभरेंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)