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6 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
पिछले हफ्ते जामनगर अखबारों और चैनलों की सुर्खियों में छाया रहा था। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और राजदूत सर्जियो गोर के रिलायंस की रिफाइनरी टाउनशिप के दौरे के कारण यह शहर राजनीति की रडार स्क्रीन पर छाकर चर्चाओं का विषय बन गया। अम्बानी परिवार ने जब इन मेहमानों की मेजबानी की तो यह भी चर्चा का मुद्दा बना। सवाल उभरने लगे कि अमेरिका भारत की इस रिफाइनरी में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है?
वे अम्बानी को वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए क्यों कह रहे हैं? वे भारत को रिफाइनिंग का ‘सुपर पावर’ क्यों कह रहे हैं और हमें इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए क्यों कह रहे हैं? कुल मिलाकर यह कि रुबियो और गोर अन्य विदेशी मेहमानों की तरह दिल्ली या बेंगलुरु तक सीमित न रहकर जामनगर में क्यों हैं?
यूपीए वाले दौर को याद कीजिए। उस दौरान पश्चिमी देशों के शासक जब इंफोसिस या दूसरी टेक कंपनियों के दौरे कर रहे थे, तब कोई विवाद नहीं उठा था। तब सबने इसे राष्ट्रीय गौरव माना था। और सभी राजनीतिक हलकों की भी यही राय थी। यहां तक कि वाम दलों ने भी कॉर्पोरेट विरोधी अपने तेवर को परे कर दिया था। तो अब इतना संदेह, संशय और उन्माद क्यों?
कहा जा रहा है कि जब रूस इतना करीब है, तब अम्बानी (या भारत) पर वेनेजुएला जैसे दूर देश से तेल खरीदने का दबाव क्यों डाला जा रहा है? जरूर यह पुतिन को सकते में डालने के मकसद से हमें रूस से अलग करने और अमेरिकी नियंत्रण वाले वेनेजुएला का तेल खरीदने को मजबूर करने की चाल है। लेकिन तथ्यों की सरसरी जांच में ये बातें टिकती नहीं हैं।
रूस से भारत जितना तेल खरीदता है, उसकी मात्रा में कोई नाटकीय कमी नहीं आई है और न आने की संभावना है। भारत को अगर रिफाइनिंग का सुपर पावर कहा जा रहा है तो यह न केवल एक बड़ी प्रशंसा है, बल्कि यह हमें हमारी राष्ट्रीय शक्ति के एक नए तत्व की भी याद दिलाती है।
भारत जैसे विशाल देश के पास अगर हाइड्रोकार्बन न के बराबर हो, तब वह क्या करे? दूसरे देश अपनी धरती या समुद्र के अंदर से जो कच्चा तेल निकालते हैं, उसकी रिफाइनिंग की वैश्विक स्तर वाली क्षमता वह विकसित करे। बिना रिफाइनिंग के कच्चा तेल किसी काम का नहीं होता। एनर्जी का उपभोग जिस तरह बढ़ रहा है, उसे तमाम देशों की तेल शोधन क्षमता पूरा नहीं कर पा रही है।
भारत ने इस कमी को पूरा किया। अम्बानी की दूरदर्शिता यह भी है कि उन्होंने वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल की रिफाइनिंग की चुनौती को कबूल किया और इसमें छिपे अवसर को पहचाना। अगर इसने भारत को रिफाइनिंग का सुपर पावर बना दिया, तो क्या इस पर हमें वैसा ही गर्व नहीं होना चाहिए, जैसा हमें हमारी टेक कंपनियों और बेंगलुरु से आउटसोर्सिंग पर होता है?
आइए, हम कुछ हकीकतों को पहचान लें। आज अमेरिका को खासकर वेनेजुएला के वैक्स की अधिकता वाले कच्चे तेल की ग्लोबल रिफाइनिंग क्षमता की जो जरूरत आन पड़ी है, उसका रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्व है। रणनीतिक इसलिए कि अमेरिका ने वेनेजुएला में कुछ समय पूर्व जबरन सत्ता परिवर्तन करवाया था।
वेनेजुएला के पास दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा भंडार है। वे जब दुनिया के पश्चिमी भाग को अपने हितों के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रहे हैं, तब उन्हें अपनी सफलता को व्यापारिक दृष्टि से भी मुकम्मल करने की जरूरत महसूस हो रही है। इस रस्साकशी में भारत का कुछ भी दांव पर नहीं लगा है।
राजनीतिक पहलू यह है कि ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की बहुतायत होगी तो कीमतें घटेंगी। ईरान में हालात सामान्य नहीं दिख रहे हैं। अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान में हालात और बिगड़ सकते हैं। और जहां तक आर्थिक पहलू की बात है, वेनेजुएला जो तेल बेचेगा।
उसमें अमेरिका को भी ‘हिस्सा’ मिलेगा। दुनिया के बाजारों में रिफाइंड प्रोडक्ट की जितनी बहुतायत होगी, अमेरिका में ईंधन की कीमतें उतनी ही गिरेंगी। कहा जा सकता है कि अमेरिका में मध्यावधि चुनाव देर से हो रहे हैं। लेकिन अमेरिकी सिस्टम में, अगले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी मध्यावधि चुनाव के बाद से ही शुरू हो जाती है, खासकर तब जब मौजूदा राष्ट्रपति अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहा हो।
इस समय ट्रम्प की पार्टी का सितारा बुलंद नहीं है, इसलिए वह चाहती है कि महंगाई और गैसोलीन की कीमतों में कमी आए। इसके लिए ज्यादा कच्चा तेल चाहिए और ज्यादा रिफाइनिंग चाहिए। अमेरिका वेनेजुएला के तेल के सबसे बड़े आयातकों में शामिल है।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में भारी कच्चे तेल की उसकी कई रिफाइनरियां बंद हो गईं, क्योंकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था संसाधन पर निर्भर क्षेत्रों पर कम और अधिक ‘सॉफ्ट’ तथा धनी क्षेत्रों की ओर ज्यादा मुड़ गई है- जैसे टेक, वित्त, रॉकेट विज्ञान और अब एआई। मोटे तौर पर आप कह सकते हैं कि टेक्सस, डेट्राइट तथा इस्पात व वाहन आदि का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों ने सिलिकन वैली, सिएटल, और न्यूयॉर्क आदि के लिए जगह खाली कर दी है।
ऐसी स्थिति में भारत के सिवा भला कौन देश दुनिया के लिए रिफाइनर की भूमिका निभा सकता है? यूरोप में रिफाइनिंग की न्यूनतम क्षमता रह गई है। पश्चिम एशिया विस्तार करने की सोच नहीं सकता, क्योंकि ईरान के लड़ाके क्षेत्र में मिसाइलों और ड्रोनों के साथ घूम रहे हैं।
अकसर कहा जाता है कि बेंगलुरु में कोई अनहोनी घट गई या इंटरनेट बंद हो गया तो दुनिया ठहर जाएगी। रिफाइनिंग को भी ऐसा तत्व क्यों न बनाया जाए? भारत को तो और ज्यादा रिफाइनरी बनानी चाहिए, वह भी कम लागत से। रिलायंस को एक और जामनगर बनाना चाहिए, खासतौर से पूर्वी समुद्री क्षेत्र के पास। कुछ को तो स्माल मॉडुलर रिएक्टरों के साथ बनाया जा सकता है।
आशंकाएं हर तरफ से जाहिर की जा रही हैं। वाम पक्ष से तो इसकी उम्मीद की ही जा सकती है, लेकिन दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी पक्ष भी आशंकाएं जाहिर कर रहे हैं। आज की कांग्रेस का झुकाव फिलहाल वामपंथी है। दक्षिणपंथी खेमा भी भ्रमित दिख रहा है। अमेरिका ही क्यों? और अम्बानी क्यों? वास्तव में अमेरिका-विरोध भारत की पुरानी, गहरी और स्वाभाविक मुद्रा रही है। यह सभी राजनीतिक पक्षों में व्याप्त है और भाजपा अथवा उसके समर्थक भी इससे मुक्त नहीं हैं।
ऐसे और समूहों की दरकार भारत में अम्बानी, टाटा, अदाणी, बिरला, जिंदल, भारती जैसे समूह हैं। हमें ऐसे और समूह चाहिए। वे दुनियाभर के लिए और ज्यादा रिफाइनरियां, स्टील प्लांट, स्मेल्ट कॉपर तैयार करें; सॉफ्टवेयर बनाएं, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का गठन करें, बिजली संयंत्र लगाएं। भारत को अपने उद्यमियों का सम्मान करना सीखना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








