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अपनी यात्राओं के दिनों में अकसर जब फोन पर बहन का नाम दिखता तो मैं घबरा जाता और दौड़ कर फोन उठाता था। क्योंकि मेरी यात्राओं के दौरान बहन ही मेरे बीमार पिताजी की देखभाल करती थीं। वो मुम्बई में ही रहती थीं और एक गृहिणी थीं। जब उनका कॉल आता तो वह ऐसी अनियंत्रित लहर जैसा होता, जो पैरों तले जमीन खिसका कर आपको पानी और रेत के भंवर में ले जाए। बुजुर्ग रिश्तेदारों की देखभाल की यही हकीकत है- आर्थिक फैसलों और देखभाल से जुड़ी मुसीबतों की लहर, जो आपको संभलने के लिए संघर्ष करने को मजबूर करती है। मेरे पिताजी अपने सारे काम बखूबी करते थे, लेकिन फिर एक दिन वो नहीं कर पाए। तब हम बेटे-बेटी ने चौबीसों घंटे बारी-बारी से देखभाल की जिम्मेदारी ली। फैमिली केयरगिवर्स किसी भी हेल्थकेयर सिस्टम की रीढ़ होते हैं, खासकर हमारे जैसे देश में। फिर भी यह बिना भुगतान वाली मेहनत अकसर अनदेखी रह जाती है। बहन के हैलो बोलने से पहले ही मेरा सवाल होता कि ‘सब ठीक है न?’ और जब वे सिर्फ ‘हम्म’ कहतीं तो मैं उनकी थकान समझ जाता। मुझे पता है कि बुजुर्गों की देखभाल मुश्किल होती है, क्योंकि मैं माताजी-पिताजी के साथ ससुर जी की भी देखभाल कर चुका हूं, जो दो वर्ष पहले गुजर गए। इस काम में साहस और विनम्रता, दोनों चाहिए। ऐसे भी दिन होते थे, जब चीखने का मन करता, और मैं चीखता भी था। कई बार ऐसे काम करने पड़ते, जो बहुत निजी होते हैं- जैसे पैरेंट्स को नहलाना। आपकी आंखें भीग जाती हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि उन्हें उस बच्चे से ऐसी मदद लेने में शर्म आ रही है, जिसे कभी उन्होंने ही नहलाया और डायपर पहनाया था। मुझे देखभाल करने वाली वही थकान सोमवार को याद आई, जब मैंने किंडल पर बेथ पिंस्कर की किताब ‘माय मदर्स मनी : ए गाइड टु फाइनेंशियल केयरगिविंग’ डाउनलोड की। इसमें उन्होंने बीमार मां की देखभाल की यात्रा बताई है। यह बुजुर्गों की देखभाल में आर्थिक और भावनात्मक जटिलताओं से गुजर रहे वयस्कों के लिए बेहद व्यावहारिक हैंडबुक है। यह बड़ी आसानी से देखभाल के खर्च के अनुमान बताती है, जिसमें दीर्घकालीन खर्चों की बजटिंग के टेम्पलेट भी हैं। इसने मुझे ससुरजी के साथ एक अनुभव याद दिला दिया, जिसमें मैंने उनसे ऐसी बात पूछ ली, जो किसी दामाद के लिए आसान नहीं होती। मैंने कहा, ‘मैं आपके लिए इमरजेंसी किट तैयार करना चाहता हूं, जो जरूरत पड़ने पर आपके काम आ सके। क्या मैं आपके कागज देख सकता हूं, कुछ चीजें इकट्ठी रख सकता हूं, सोसायटी के कागजों में नॉमिनेशन और बैंक खातों से जुड़े दस्तावेज जांच सकता हूं? ताकि आपके बच्चों के बीच स्पष्टता रहे।’ उन्होंने खुशी-खुशी मुझे पासवर्ड और अलमारी की चाबियां दे दीं। तब मैं सबकुछ व्यवस्थित कर पाया। चूंकि मैं उस दौर से गुजर चुका हूं, इसलिए मुझे लगा कि यह किताब अधिक वास्तविक है। अनुपयोगी किताबी तथ्यों के बजाय इसमें बुजुर्गों की देखभाल के ‘जटिल इंसानी अनुभव’ को कवर किया गया है। अगर आप पूछें कि यह किताब किसे पढ़नी चाहिए, तो मैं कहूंगा कि इसे उस ‘सैंडविच जनरेशन’ को पढ़ना चाहिए, जिन्हें अचानक आए स्वास्थ्य संकटों के दौरान पैरेंट्स की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है और जिनके बच्चे विदेश में अध्ययन या काम कर रहे हैं या फिर मेरे बच्चों की तरह वहीं शादी करके सेटल हो चुके। अगर आप 40 या 50 की उम्र में हैं और आपके पैरेंट्स उम्रदराज हो रहे हैं तो यह किताब किसी आपात घटना से पहले सलाह लेने का अनमोल जरिया हो सकती है। किताब की जिस एक लाइन ने मुझे अपने बुढ़ापे के बारे में सोचने पर मजबूर किया, उसमें लेखिका कहती हैं कि उनकी मां के पास 12 नेलकटर थे। मैं सोचने लगा कि अगर मेरे पास 12 रेजर हुए तो मेरी बेटी क्या सोचेगी। फंडा यह है कि यदि आप अपनी रिश्तेदारी या दोस्तों के बीच कोई ऐसा इंसान देखें, जो अपने बुजुर्गों के केयरगिवर के तौर पर दोहरी जिम्मेदारी निभा रहा है तो आप कम से कम उन्हें ऐसी किताबें जरूर दीजिए। ये उन्हें अपने जटिल जीवन को आसानी से पार करने के लिए गाइड करेंगी।
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