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9 घंटे पहले
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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार
जन्म-मृत्यु पंजीकरण कानून, 1969 के लागू होने के पांच दशक से अधिक समय बाद एनडीए सरकार ने इसमें संशोधन किया है। संशोधन के जरिए जन्म और मृत्यु की रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को अधिक सख्त बनाया गया है। संशोधित कानून का उद्देश्य देश में दशकों से व्याप्त गलत या देरी से की गई एंट्री की समस्या को दूर करना है।
जन्म और मृत्यु का समय पर रजिस्ट्रेशन अहम है, क्योंकि यह सरकार और नागरिकों के बीच संस्थागत संपर्क बनाता है। यह जनसांख्यिकीय योजनाएं बनाने में मददगार है। इसके अलावा, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी इनका इस्तेमाल होता है।
इस कानून में यह पहला संशोधन नहीं है। 2023 में भी इसमें संशोधन किया गया था, जिसके जरिए बर्थ सर्टिफिकेट को भारतीयों के लगभग हर पहचान दस्तावेज से जोड़ दिया गया था। इसके अलावा यह जनसंख्या रजिस्टर और मतदाता सूचियां बनाने में भी मददगार रहा।
अब जन्म और मृत्यु के डेटाबेस की मदद से सरकार किसी व्यक्ति के मतदान योग्य होने या पंजीकृत मतदाता की मृत्यु होने पर मतदाता सूची अपडेट कर सकती है। 1969 से पहले सरकार को किसी व्यक्ति के अस्तित्व की जानकारी अलग-अलग प्रशासनिक रिकॉर्डों के माध्यम से मिलती थी, क्योंकि जन्म को दर्ज करने के लिए कोई एक समान नेशनल लीगल फ्रैमवर्क नहीं था। जन्म-मृत्यु पंजीकरण अधिनियम लागू होने के बाद ऐसा फ्रैमवर्क लागू किया गया और हर जन्म का पंजीकरण अनिवार्य किया गया।
अब जबकि जन्म प्रमाणपत्र काफी अहम हो गया है तो सरकार ने हालिया संशोधन के जरिए देरी से होने वाले जन्म के रजिस्ट्रेशन के लिए अधिक कड़ी जांच की व्यवस्था कर दी है। इसके तहत कई स्तर की जांच के प्रावधान किए गए हैं।
जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन समय से कराया तो सामान्य प्रशासनिक जांच होगी। 21 दिन के बाद और एक वर्ष तक की देरी से कराया तो अधिक कड़ी प्रशासनिक जांच होगी। और कहीं दो साल से अधिक देरी हुई तो रजिस्ट्रेशन कराने के लिए न्यायिक जांच से गुजरना होगा।
हालांकि ये सुधार राज्य मशीनरी की क्षमता बढ़ाने को किए गए हैं, लेकिन इसके कारण उन नागरिकों की पहुंच की क्षमता को लेकर सवाल भी उठते हैं, जो पहले ही कई संस्थागत बाधाओं का सामना कर रहे हैं। सरकार का तर्क है कि फर्जी रजिस्ट्रेशन रोकने और अधिक विश्वसनीय डेटाबेस बनाने के लिए कड़ी जांच जरूरी है।
लेकिन इससे उन लोगों की समस्याएं बढ़ने का खतरा भी है, जिनका जन्म अस्पताल में नहीं हुआ, जो दूरदराज के गांवों में रहते हैं, जिन्हें रजिस्ट्रेशन के बारे में जानकारी नहीं है, जो आर्थिक या सामाजिक रूप से हाशिये पर हैं या जो पलायन करते रहे हैं।
यह इसलिए भी बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि जिन लोगों के बारे में अधिक संभावना यह है कि उनका बर्थ रजिस्टर में रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ होगा या देरी से रजिस्ट्रेशन हुआ होगा, उन्हीं के बारे में सर्वाधिक आशंका यह भी है कि वे कड़ी जांच प्रक्रिया से बाहर निकलने में सबसे कम सक्षम होंगे।
जन्म के रजिस्ट्रेशन का कानून एक प्रकार से प्रशासनिक संघवाद की व्यवस्था मुहैया कराता है, जिसमें केंद्र सरकार एक नेशनल लीगल फ्रैमवर्क तैयार करती है और राज्य सरकारें अपने नियम बनाकर इसे लागू करती हैं। राज्यों के ये नियम रजिस्ट्रेशन फॉर्म, शुल्क आदि को लेकर हो सकते हैं।
राज्य सरकारें राज्य को अलग-अलग रजिस्ट्रेशन डिवीजन में बांट कर उनके अलग-अलग नियम भी रख सकती हैं। इससे एक ही राज्य में अलग-अलग नियम होने की गुंजाइश भी बनी रहती है। इसका असर इस बात पर भी पड़ सकता है कि कितने जन्म और मृत्यु आधिकारिक तौर पर सफलतापूर्वक दर्ज हुए।
अब जन्म और मृत्यु के डेटाबेस की मदद से सरकार किसी व्यक्ति के मतदान योग्य होने या पंजीकृत मतदाता की मृत्यु होने पर मतदाता सूची अपडेट कर सकती है। पहले सरकार को किसी व्यक्ति के अस्तित्व की जानकारी अलग-अलग प्रशासनिक रिकॉर्डों से मिलती थी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








