![]()
बचपन से हमें सिखाया जाता है कि ‘ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है’। सच बोलो, झूठ मत कहो, और अपनी बात पर अडिग रहो। पर जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, वयस्क रिश्तों की पेचीदगियां हमें एक अलग सबक सिखाती हैं। हमें समझ आता है कि हर सच रिश्ते को मजबूत नहीं करता। कुछ सच, अगर बिना संवेदनशीलता, संदर्भ और परवाह के कहे जाएं, तो वे रिश्ते की नींव हिला देते हैं। आखिरकार, रिश्तों में सबसे असरदार ईमानदारी वही है जो तलवार नहीं, पुल बनाती हो। सच बोलना जरूरी है- लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है, उसे कैसे कहा जाए। जानिए कुछ कारगर उपाय एक्सपर्ट से… जुड़ाव बनाने वाली ईमानदारी अर्कान्सस यूनिवर्सिटी की प्रो. जेनिफर वेल्यू कहती हैं,‘ईमानदारी सिर्फ ‘माइक ड्रॉप’ (दमदारी से बात रखकर चुप होना) बन जाए तो वह जुड़ाव नहीं बनाती, बल्कि एकतरफा लगती है। समस्या तब होती है जब सच्चाई सीधे व कठोर तरीके से कही जाए। जैसे- पत्नी, पति से कहे कि वह उसके बिना ज्यादा खुश रहती है। यह सच हो सकता है, पर चोट दे सकता है, खासकर तब, जब रिश्ता पहले से कमजोर हो। जेनिफर कहती हैं,‘सच को राय की तरह रखें…मेरे हिसाब से…’,‘मेरा मानना है…’-ताकि बात आपकी सोच पर रहे और साथी को असहमति जताने की जगह मिले।’ कितना जरूरी है बताना ऑकलैंड यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री डॉ. टैरी ऑर्बक मानती हैं कि किसी भी रिश्ते की नींव विश्वास है। यह बिना ईमानदारी संभव नहीं। सच बोलते समय अगर हम बिना सोचे-समझे कुछ कह देते हैं तो रिश्ता और कमजोर हो सकता है। पहले सोचें-क्या यह जरूरी है, इसका असर क्या होगा। सच छिपा रहे हैं तो खुद से पूछें-क्या यह छवि बचाने के लिए है या साथी की भलाई के लिए। तरीका सही हो थेरेपिस्ट केट एंगलर के अनुसार जब ईमानदारी ‘बेलगाम अभिव्यक्ति’ बन जाती है और बदले जैसी लगती है तो यह समस्या बन सकती है। इससे बात बिगड़ सकती है। ईमानदारी आत्मचिंतन और संवेदनशीलता के साथ हो। शांत तरीके से साथी से कहें कि आप बात सुनने को तैयार हैं, पर तरीका सही होने पर ही बातचीत करेंगे। संवेदनशीलता अहम जेनिफर कहती हैं, ‘कई रिश्तों में ईमानदारी ‘हथियार’ बन जाती है-सच तो बोला जाता है, पर गैर-जरूरी तरीके से, जैसे ‘तुमने मुझे दुखी किया, मैं भी ऐसा ही करूंगा। इसका नतीजा बुरा ही होता है। समाधान यह है कि सच बोलते समय संवेदनशीलता और सोच जरूरी है। अपनी बात ऐसे रखें कि साथी की भावनाओं पर चोट न हो और बातचीत सुधार की दिशा में जाए। सीधे न कहें एक्सपर्ट कहते हैं कि ईमानदारी बहुत नरम और बिना लाग लपेट के हो तो मुश्किल हो सकती है। जैसे- सीधे किसी को कहना- ‘तुम खराब पैरेंट हो।’ इससे सामने वाला साथी आहत होता है। ईमानदारी को नरम और छिपाकर रखें। पहले कुछ सकारात्मक कहें, अगर साथी सहज हो तो मुद्दे पर आ सकते हैं। यह तरीका कारगर है। साथी की सुरक्षा पर ध्यान एक्सपर्ट कहते हैं, साथी से बैंक अकाउंट छिपाया है, तो यह धोखा माना जाएगा और अविश्वास बढ़ेगा, ऐसा सच बताना जरूरी है। पर किसी पार्टी में कोई और आकर्षक लगे और आप उसे लेकर गंभीर नहीं हैं, तो यह बताना बेवजह चोट पहुंचा सकता है। ऐसी ‘गैर-जरूरी’ बातों को छोड़कर साथी को सुरक्षा दे सकते हैं। ऐसे पहचानें जेनिफर कहती हैं, अगर आपका साथी ईमानदारी के नाम पर कठोरता दिखा रहा है, तो यह जरूरी है कि उस दर्द को उसी समय जाहिर करें। आप बस कोई एक शब्द कह सकते हैं या संकेत दे सकते हैं… जिससे सामने वाले को समझ आए कि उनकी बात चोट पहुंचा रही है। इससे यह भी साफ हो जाएगा कि उन्होंने अनजाने में ऐसा कहा या जानबूझकर आपको दबाने की कोशिश की।
Source link








