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मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल सैन्य ठिकानों या ऊर्जा संसाधनों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवन देने वाला संसाधन पानी भी इस संघर्ष का हिस्सा बनता जा रहा है। ईरान द्वारा खाड़ी देशों की जल सुविधाओं को निशाना बनाने की चेतावनी ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में पानी न केवल एक हथियार बन सकता है, बल्कि निशाना भी। खाड़ी क्षेत्र- जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान- प्राकृतिक रूप से बहुत शुष्क हैं। यहां बारिश बहुत कम होती है और नदियां-झीलें लगभग नहीं के बराबर हैं। ऐसे में इन देशों की सबसे बड़ी जरूरत पूरी करते हैं डिसेलिनेशन प्लांट। डिसेलिनेशन का मतलब है खारे पानी से नमक और अन्य अशुद्धियां हटाकर उसे पीने योग्य बनाना। यह काम मुख्य रूप से दो तरीकों से होता है। पहला है रिवर्स ऑस्मोसिस, जिसमें समुद्री पानी को दबाव के साथ एक खास झिल्ली से गुजारा जाता है, जो नमक को रोक लेती है और साफ पानी को आगे जाने देती है। दूसरा तरीका है पानी को गर्म करके भाप बनाना और फिर उसे ठंडा करके शुद्ध पानी प्राप्त करना। इस तरह ये संयंत्र समुद्र के पानी को मीठे पानी में बदल देते हैं। आज खाड़ी देशों में पानी की स्थिति पूरी तरह कृत्रिम स्रोतों पर निर्भर हो चुकी है। मध्य पूर्व क्षेत्र दुनिया की लगभग 45-50% डिसेलिनेशन क्षमता रखता है और प्रतिदिन लगभग 60-70 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी समुद्र से बनाता है। अनुमानतः खाड़ी देशों में करोड़ों लोग सीधे डिसेलिनैटेड पानी पर निर्भर हैं। इसके बावजूद क्षेत्र में प्रति व्यक्ति प्राकृतिक जल उपलब्धता बहुत कम है- औसतन 480 घन मीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष, जबकि वैश्विक औसत 5500 घन मीटर है। खाड़ी देशों के पास पानी का भंडार बहुत कम होता है- अधिकतर देशों के पास सिर्फ एक हफ्ते का पानी सुरक्षित रहता है। डिसेलिनेशन के पहले यह क्षेत्र दुनिया के सबसे अधिक जल-संकट वाले क्षेत्रों में था। यहां 15 से अधिक देश अत्यधिक जल तनाव (80% से अधिक उपयोग) झेल रहे हैं। डिसेलिनेशन प्लांट्स बनने से पहले खाड़ी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता अत्यंत कम थी और जीवन मुख्यतः सीमित भूजल स्रोतों पर निर्भर था। कई क्षेत्रों में पानी इतना कम था कि बड़े शहरों का विकास संभव ही नहीं था। डिसेलिनेशन ने इस क्षेत्र को बसाने और विकसित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। डिसेलिनेशन प्लांट्स समुद्र किनारे होते हैं और ईरान के काफी पास हैं, इसलिए इन्हें निशाना बनाना आसान है। यदि इन प्लांट्स पर बड़े स्तर पर हमला होता है, तो पूरी शहरी आबादी प्रभावित हो सकती है और इसका असर केवल किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी देशों की लगभग पूरी शहरी आबादी- करीब 10 करोड़ लोग- इससे सीधे प्रभावित होंगे। कुछ ही दिनों में पानी की कमी एक मानवीय संकट का रूप ले सकती है। पीने के पानी की कमी, उद्योग और फैक्ट्रियां बंद होना, बिजली उत्पादन पर असर, अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं में दिक्कत, यानी बिना सीधे लोगों पर हमला किए भी पूरे समाज को प्रभावित किया जा सकता है। डिसेलिनेशन प्लांट्स पर हमला अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर डालेगा। खाड़ी की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ऊर्जा + उद्योग + शहरीकरण पर आधारित है और डिसेलिनेशन और ऊर्जा क्षेत्र आपस में जुड़े हैं। सऊदी अरब अगले वर्षों में 80 अरब डॉलर तक का निवेश करने जा रहा है, लेकिन अगर पानी बंद हुआ तो अरबों डॉलर का निवेश और उत्पादन खतरे में पड़ने से क्षेत्रीय ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। हाल में जब अमेरिका द्वारा ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमले की बात सामने आई, तो ईरान ने जवाब में खाड़ी देशों की जल सुविधाओं को नुकसान पहुंचाने की चेतावनी दी। संघर्ष के दौरान ऐसे संयंत्रों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने भी आई हैं। इससे साफ है कि पानी अब युद्ध की रणनीति का हिस्सा बन रहा है। दुनिया मिलकर तय करे कि पानी को युद्ध से दूर रखा जाए- क्योंकि अगर पानी पर संकट आया, तो जीवन भी संकट में पड़ जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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